Category Archives: भारत का इतिहास

भारतीय प्रभाग को 80 फीट का विशाल नर कंकाल मिला है। क्या ये घटोत्कच का कंकाल हे

दोस्तों ये पूरा लेख मेने इस ब्लॉग से लिया हे http://hitchintak.blogspot.in/2007/09/blog-post_229.html

क्या अब भी कोरी कल्पना ही है हमारे धर्म ग्रंथों में

लेखक-अमृतांशु कुमार मिश्र

भारत का इतिहास अति प्राचीन है। हमारा इतिहास उस समय से है जब धरती पर लोग पढ़ना लिखना नहीं जानते थे। गाथाओं के माध्यम से हमने अपने इतिहास को जीवित रखा। बाद में रामायण और महाभारत के माध्यम से इतिहास को लिखित साक्ष्य प्रदान करने की कोशिश की गई। लेकिन वर्तमान परिदृष्य में सरकार देश के उस प्राचीन इतिहास को मानने को ही तैयार नहीं है। अजीब संयोग है कि जिस देश में राम और कृष्ण हुए उसी देश में उनके अस्तित्व को नकारा जा रहा है। लेकिन महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने कहा था कि जब भी धर्म की हानि होगी मैं प्रकट होऊंगा। अगर कहा जाए तो भगवान ने साक्ष्यों के रूप में प्रकट भी होना शुरू कर दिया है।

श्री राम सेतु के बारे में सरकार के हलफनामे में सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि राम थे ही नहीं। राम सेतु को नकारने का सबसे अच्छा माध्यम तो यही हो सकता था कि जिसने इसका निर्माण किया उसी के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगा दिया जाए । न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। सरकार ने यही किया। कौन सा राम? कौन सा इतिहास? राम तो पैदा ही नहीं हुए। कोई प्रमाण ही नहीं है। यह वैसा ही तर्क है जैसा कि धरती गोल है पर हम नहीं मानते। दिखाओ तो जानें। अब कोई किसी को एक पूरी पृथ्वी तो दिखा ही नहीं सकता। जो नहीं मानना चाहें उनके लिए तो पृथ्वी चपटी ही होगी।

पिछले कुछ दशकों से जहां एक ओर राम जन्मभूमि बाबरी ढाँचा के बाद श्री राम के अस्तित्व को स्वीकारने वाले भक्तों की संख्या में वृध्दि हुई है वहीं श्री राम के अस्तित्व को नकारने वाले भी अधिक सक्रिय हुए हैं। किसी न किसी प्रकार से उसके अस्तित्व को नकारने की भरपूर कोशिश की जा रही है। लेकिन भगवान ने स्पष्ट कर दिया है कि धर्म की हानि होने पर मैं अवश्य प्रकट होऊंगा। इसलिए जब राम के अस्तित्व को नकारा जाने लगा तो नासा के माध्यम से राम सेतु रूपी साक्ष्य प्रकट हुआ। अब भगवान श्री राम को नहीं मानने वालों के लिए भारी समस्या उत्पन्न हो गई है। अगर कहें कि श्री राम सेतु मानव निर्मित है तो हमारे धर्म ग्रन्थ स्पष्ट करते हैं कि राम सेतु का निर्माण भगवान श्री राम ने किया था। अगर भगवान श्री राम ने इसका निर्माण किया था तो उन्होंने अवश्य ही जन्म लिया था और अगर जन्म लिया था तो कोई जन्मस्थली भी होगी। इन सभी पचड़ों में पड़ने से अच्छा है कि भगवान श्री राम के अस्तित्व को ही क्यों न नकार दिया जाय और इसी रणनीति के तहत राम विरोधी तत्व अपना काम कर रहे हैं। एक बार राम के अस्तित्व को नकार दिया तो फिर आधी विजय तो हो ही गई। राम ही नहीं तो राम जन्म भूमि कैसी?

इसी प्रकार भगवान कृष्ण को भी नकारा जाता रहा है। हालांकि महाभारत में वर्णित स्थानों के नाम अभी भी विद्यमान हैं इसलिए कहा जाता है कि कुछ तो सच है लेकिन अधिक कल्पना ही है। अब हमारे धर्म शास्त्रों में वर्णित राक्षसों के भी प्रमाण प्राप्त होने लगे हैं। भारत के उत्तरी क्षेत्र में खुदाई के समय नेशनल ज्योग्राफिक (भारतीय प्रभाग) को 80 फीट का विशाल नर कंकाल मिला है। यह कोरी कल्पना नहीं है। कंकाल की खोपड़ी 10 फीट से भी बड़ी है। उत्तर के रेगिस्तानी इलाके में एम्प्टी क्षेत्र के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र सेना के नियन्त्रण में है।

खास बात यह है कि इतने बड़े मनुष्य के होने का कहीं कोई प्रमाण अभी तक प्राप्त नहीं हो सका था। इसलिए हमारे धर्म ग्रंथों में वर्णित राक्षसों को हम मात्र कोरी कल्पना ही मानते थे। लेकिन अब इन राक्षसों के भी प्रमाण मिलने लगे हैं जिससे देवताओं के कई बार संघर्ष होने की चर्चा हमारे धर्म ग्रंथों में है। उल्लेखनीय है कि 80 फीट के नरकंकाल के पास से ब्रह्म लिपि में एक शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। इसमें लिखा है कि ब्रह्मा ने मनुष्यों में शान्ति स्थापित करने के लिए विशेष आकार के मनुष्यों की रचना की थी। विशेष आकार के मनुष्यों की रचना एक ही बार हुई थी। ये लोग काफी शक्तिशाली होते थे और पेड़ तक को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकते थे। लेकिन इन लोगों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने के बाद देवताओं को ही चुनौती देने लगे। अन्त में भगवान शिव ने सभी को मार डाला और उसके बाद ऐसे लोगों की रचना फिर नहीं की गई।

महाभारत में भी भीम बकासुर जैसे इसी प्रकार के एक राक्षस से लड़ा था और उसे पराजित भी किया था। पाण्डु पुत्र भीम ने एक राक्षसी हिडिम्बा से विवाह किया था और उससे एक पुत्र घटोत्कच प्राप्त हुआ था। महाभारत के युध्द में उसने भी हिस्सा लिया था और कर्ण के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुआ था। मरते समय उसने अपना आकार बढ़ाया था और शत्रु सेना यानी कौरव सेना पर गिरा था। उसका आकार इतना बड़ा था कि उसके गिरने से भी कई सैनिक मारे गए थे। इन तथ्यों को कभी भी स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि कहीं भी विशालकाय मानव के अस्तित्व का साक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ था। लेकिन अब इस 80 फीट के नरकंकाल ने सिध्द कर दिया है कि भारत में राक्षसों का अस्तित्व था। हालांकि इस क्षेत्र में अभी किसी को जाने नहीं दिया जा रहा और आर्कलाजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया का कहना है कि सरकार से अनुमति प्राप्त होने के बाद ही इसपर कुछ कहा जाएगा। अब देखना है कि सरकार इस मुद्दे पर कौन सी रण्‍ानीति अपनाती है और इस 80 फीट के नर कंकाल को क्या कह कर तथ्यों को छिपाने की कोशिश करती है।

पहले श्री राम सेतु तथा अब मिले 80 फीट के नरकंकाल के बाद अब हमें अपने धार्मिक ग्रंथों को कोरी कल्पना नहीं मानकर उसकी गम्भीरता से पड़ताल करनी चाहिए। तथ्य को स्वीकार करना ही होगा। लेकिन तथ्य को वही स्वीकार करेगा जिसे धार्मिक ग्रंथों पर आस्था हो। जो राम के अस्तित्व को ही नहीं मानते वे रामसेतु को क्या मानेंगे। कहीं ऐसा न हो कि राम सेतु के बाद राम जन्म भूमि और उसके बाद दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों पर ही प्रतिबन्ध लग जाए। जब राम ही नहीं हुए तो कैसी विजया दशमी। श्री राम सेतु ही नहीं तो न राम रावण युध्द हुआ और न ही किसी को विजयश्री प्राप्त हुई। श्री राम लंका गए ही नहीं तो फिर उनके आने पर दिवाली कैसी? श्री राम जन्मे ही नहीं तो राम नवमी क्यों? फिर तो होली और जन्माष्टमी जैसे पर्व भी भारत के इतिहास से खरोच दिए जाएंगे। त्योहारों के इस देश की स्थिति की फिर तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

education (शिक्षा) के क्षेत्र मे Bharat और India का अंतर:

शिक्षा के क्षेत्र मे भारत और इंडिया का अंतर: @[466243806766675:274:राजीव दीक्षित Rajiv Dixit]---------------------------------------------------------------------------------भारत मे: प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित था, प्रत्येक गाँव मे पाठशाला थी, पड़ने वाले और पड़ाने वालों मे 50% से अधिक शुद्र थे, सेर्जेरी की शिक्षा नाइ जाती के लिए, आर्किटेक्चर की शिक्षा कुम्हार के लिए, इस्पात लकड़ी, उद्योग की शिक्षा लुहार और सुथार जाती, एवं वस्त्र उद्योग की शिक्षा जुलाहा जाती को दी जाती थी|इंडिया मे (मेकोले की शिक्षा नीति): पड़े लिखे कम है, पड़े लिखों मे भी शिक्षित तो बहुत हि कम है, आरक्षण के नाम पर नेता शिक्षा के अन्दर घुसपैठ कर उसका सत्यानाश कर रहे है|--------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: विश्वभर से विद्यार्थी भारत के गुरुकुल मे पड़ने को अपने जीवन का सौभाग्य मानते थे और यहाँ पड़ने के लिए लालायित रहते थे|इंडिया मे: विद्यार्थी विदेश मे पड़ कर गर्व महसूस कर रहे है, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशो मे मार खाकर भी स्वाभिमान शून्य एक भी विद्यार्थी वापस अपने राष्ट्र नहीं लौटा और ना हि वहिष्कार करते है विदेशी शिक्षा का|-------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: गुरु गुरुकुल चलाते थे समाज का सबसे प्रबुद्ध वर्ग उन्हें शिक्षा देता था|इंडिया मे: स्कूलों मे नौकर रखें जाते हैं, जो टीचर का कार्य करते है, नौकर किसी को मालिक बनने का ज्ञान कैसे दे सकता है ? इसलिए यहाँ पड़ा लिखा व्यक्ति मानसिक रूप से गुलाम है नौकरी को हि श्रेष्ट समझता है|---------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: प्रधानमंत्री के पद से भी आचार्य का पड़ अधिक महत्व का माना जाता था (उदः आचार्य चाणक्य) जब आवश्यकता होती थी तो आचार्यो से प्रधानमंत्री बनने के लिए निबेदन होता था|इंडिया मे: शिक्षक अब टीचर हो गए है और पद भी मामूली, एक शिक्षक राष्ट्रपति बन जाता है तो उसे शिक्षक दिवस के रूप मे याद किया जाता है|--------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: पात्रता के आधार पर शिक्षा दी जाती थी, यह पात्रता सत्य-रज-तम और बात-पित्त-कफ के आधार पर तय होती थी और भारत का शिक्षक बिकाऊ नही होता था|इंडिया मे: शिक्षा पात्र-कुपात्र मे भेद के बिना, इंडिया का शिक्षित बिकाऊ है, अमिताभ, शाहरुख़ खान, आमिर खान, दारासिंह जैसे इंडिया के प्रिय भांड धन के लिए उनके चाहने वालों को जहर बेचने से भी नही हिचकते है कोई कोला बेच रहा है तो कोई अंडे खाने का प्रचार कर रहा है तो कोई मांस खाने के फायदे गिना रहा है|-------------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: शिक्षा के बदले मे गुरुदक्षिना दी जाती थी, यहाँ गुरु शिष्य संबंध प्रमुख था, धन गौण होता था|इंडिया मे: पैसे के बदले मे शिक्षा दी जाती है, रोज के ७०-८० करोड़ रूपए के विज्ञापन कमाई करने के लिए छपते है, गुरु शिष्य संबंध गौण है|--------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: समाज की प्रगति के लिए शिक्षा दी जाती है|इंडिया मे: कंपनियों के प्रगति के लिए शिक्षा दी जाती है, शेक्षिक काल खत्म होते हि कंपनियाँ इन पड़े लिखे पशुओं को खरीदने पोहुँच जाती है, और बोली लगाती है|----------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: गुरुकुल में सदाचार सम्पन्न आचार्यों से ब्रह्मचर्य धारण कर शिक्षा ग्रहण करते है|इंडिया मे: घर के भोगमय बातावरण, या हॉस्टल के कमरे की दीवारें भांडो की तस्वीरों से ढकी रहती है या शाम को फिल्म और मजे करना, यही मूल उदेश्य है|----------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: प्राकृतिक वातावरण मे ज्ञान की साधना होती है|इंडिया मे: अप्राकृतिक वातावरण में नर्सरी, किंडर गार्डन खोले जाते है, किताबों से गाय, बकरी, फुल, फल, सूर्य, चद्रमा समझाए जाते है इस ‘सेकंड-हैण्ड’ जानकारी को ज्ञान कहते है, और पेड़ के निचे बैठकर शिक्षा को सुविधाओं का और पिछड़ेपन का प्रतिक माना जाता है|----------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: गुरु केन्द्रित के साथ हि शिष्य केन्द्रित शिक्षा पद्धति थी|indiaइंडिया मे: केवल विषय केन्द्रित शिक्षा पद्धति|-----------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: पुरुषो को समाज की प्रगति की और स्त्रियों को प्रगति को स्थिरता प्रदान करने की शिक्षा दी जाती थी जैसे चलते समय एक पैर स्थिर रहता है|indiइंडिया मे: दोनों को एक सी शिक्षा दी जाती है जैसे दोनों पैर एक साथ बढाने पर जो दुर्गति होती है वैसे हि गति हो रही है|----------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: भारत मे शिक्षा आधारित परीक्षा होती थी|indiaइंडिया मे: यहाँ परीक्षा आधारित शिक्षा होती है|--------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: भारतीय शिक्षा का मनोविज्ञान त्रिगुण (सत्व-रज-तम) और प्रकृति (वात-पित्त-कफ) पर आधारित था – सत्य गुण का विकास, रजोगुण का नियंत्रण और तमोगुण का दमन शिक्षा के द्वारा साधा जाता था|इंडिया मे: इंडिया की शिक्षा का मनोविज्ञान व्यवहार पर आधारित है|-------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: प्रारम्भिक स्तर पर अपने आसपास की प्रकृति को समझने की शिक्षा दी जाती है|इंडिया मे: प्रारम्भिक स्तर पर देशी विदेशी पृथ्वी आकाश पाताल सबका भूगोल पड़ाया जाता है लेकिन दैनिक जीवन मे सर्वाधिक उपयोगी गाँव व जिले का भूगोल नहीं पड़ाया जाता है|--------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: आज की तरह इतिहास की शिक्षा नहीं होती, लेकिन लोगों को अपने पूर्वजों के बारे मे ज्ञान था|इंडिया मे: अंग्रेजो द्वारा भारत के स्वाभिमान को भंग करने के लिए लिखा गया मनघडन्त इतिहास पड़ाया जा रहा है, अंग्रेजो के सुधार कार्य (?) और बलात्कारी बादशाहों की लोरियां हि इतिहास मे मिलती है|------------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: मातृभाषा और अधिकतर राष्ट्रभाषा संस्कृत मे हि शिक्षा दी जाती थी, भाषा केवल व्यक्ति की अभिव्यक्ति का साधन हि नही यह संस्कृति व परंपरा के संरक्षण का भी साधन है|इंडिया मे: विदेशी भाषा अंग्रेजी मे शिक्षा दी जाती है हमारी संस्कृति के हजारो शब्द है जिनका अनुवाद अंग्रेजी नहीं कर सकती जैसे प्राण, प्रजा, यज्ञ, सती, सत्य-रज-तम, गलत अनुवाद धर्म – रिलिजन, विवाह-मेरिज, कृषि- एग्रीकल्चर, मक्खन-बटर, दर्शन- फिलोसोफी, तत्व-एलिमेंट, रसायन-केमिकल आदि ने बहुत नुकसान पहुँचाया इससे लोग ऋषि संस्कृति से कटकर आसुरी संस्कृति के प्रभाव मे फंस गया|-------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: प्रगति का विज्ञानं पड़ाया जाता है| इंडिया मे: दुर्गति का विज्ञानं पड़ाया जाता है|--------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: अर्थशास्त्र पड़ाया जाता है|इंडिया मे: अनर्थशात्र पड़ाया जाता है, अर्थ शास्त्र पड़कर भी कितने हि छात्र उनकी बराबरी नही कर सकते जो कड़ी धुप मे मेहनत से बड़ा व्यापार खड़ा कर देते है जो कम पड़े लिखे होते है एमबीए धरी कम पड़े लिखों के निचे एडियाँ रगड़ते है|-------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: हमारे समाज की मूल्यों की शिक्षा दी जाती है|इंडिया मे: भारत के मूल्यों की खिल्ली दी जाने वाली राष्ट्रद्रोही, बामपंथियों से भरी सोच और शिक्षा दी जाती है|-----------------------------------------------------------------------------------भारत मे: काम शिक्षा का उदेश्य था – काम उर्जा को ऊपर उठाकर पुस्तकीय ज्ञान से श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति, विवेक से काम के आवेश से मुक्त होना, संभव न हो तो गृहस्थ आश्रम मे प्रवेश कर काम सुख को भोग, उसकी क्षण भंगुरता का अनुभव कर शाश्वत सुख (प्रेम, भक्ति, ध्यान, समाधि की और बढना); श्रेष्ट संतान की प्राप्ति|इंडिया मे: यौन शिक्षा का उदेश्य है इंडिया की पश्चिम की तरह व्यभिचारी देश बनाना, ब्रह्मचर्य भंग करने, सुरक्षित यौन करने, यौन संबंधो के व्यावहारिक अनुभवों के लिए प्ररित करने वाली शिक्षा दी जाती है; क्या आपने कभी ‘नोट’ किया कभी मीडिया ने यह विषय उठाया या सरकार ने कही इन्टरनेट पर अश्लील सामग्री, विडियो पर प्रतिबंध लगे ? नहीं ! मेकोले यही चाहता था|


education (शिक्षा) के क्षेत्र मे Bharat और India का अंतर: राजीव दीक्षित Rajiv Dixit
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भारत मे: प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित था, प्रत्येक गाँव मे School थे , पड़ने वाले और पड़ाने वालों मे 50% से अधिक शुद्र थे, सेर्जेरी की शिक्षा नाइ जाती के लिए, आर्किटेक्चर की शिक्षा कुम्हार के लिए, इस्पात लकड़ी, उद्योग की शिक्षा लुहार और सुथार जाती, एवं वस्त्र उद्योग की शिक्षा जुलाहा जाती को दी जाती थी|
इंडिया मे (मेकोले की शिक्षा नीति): पड़े लिखे कम है, पड़े लिखों मे भी शिक्षित तो बहुत हि कम है, आरक्षण के नाम पर नेता शिक्षा के अन्दर घुसपैठ कर उसका सत्यानाश कर रहे है|
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भारत मे: विश्वभर से विद्यार्थी भारत के गुरुकुल मे पड़ने को अपने जीवन का सौभाग्य मानते थे और यहाँ पड़ने के लिए लालायित रहते थे|
इंडिया मे: विद्यार्थी विदेश मे पड़ कर गर्व महसूस कर रहे है, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशो मे मार खाकर भी स्वाभिमान शून्य एक भी विद्यार्थी वापस अपने राष्ट्र नहीं लौटा और ना हि वहिष्कार करते है विदेशी शिक्षा का|
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भारत मे: गुरु गुरुकुल चलाते थे समाज का सबसे प्रबुद्ध वर्ग उन्हें शिक्षा देता था|
इंडिया मे: स्कूलों मे नौकर रखें जाते हैं, जो टीचर का कार्य करते है, नौकर किसी को मालिक बनने का ज्ञान कैसे दे सकता है ? इसलिए यहाँ पड़ा लिखा व्यक्ति मानसिक रूप से गुलाम है नौकरी को हि श्रेष्ट समझता है|
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भारत मे: प्रधानमंत्री के पद से भी आचार्य का पड़ अधिक महत्व का माना जाता था (उदः आचार्य चाणक्य) जब आवश्यकता होती थी तो आचार्यो से प्रधानमंत्री बनने के लिए निबेदन होता था|
इंडिया मे: शिक्षक अब टीचर हो गए है और पद भी मामूली, एक शिक्षक राष्ट्रपति बन जाता है तो उसे शिक्षक दिवस के रूप मे याद किया जाता है|
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भारत मे: पात्रता के आधार पर शिक्षा दी जाती थी, यह पात्रता सत्य-रज-तम और बात-पित्त-कफ के आधार पर तय होती थी और भारत का शिक्षक बिकाऊ नही होता था|
इंडिया मे: शिक्षा पात्र-कुपात्र मे भेद के बिना, इंडिया का शिक्षित बिकाऊ है, अमिताभ, शाहरुख़ खान, आमिर खान, दारासिंह जैसे इंडिया के प्रिय भांड धन के लिए उनके चाहने वालों को जहर बेचने से भी नही हिचकते है कोई कोला बेच रहा है तो कोई अंडे खाने का प्रचार कर रहा है तो कोई मांस खाने के फायदे गिना रहा है|
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भारत मे: शिक्षा के बदले मे गुरुदक्षिना दी जाती थी, यहाँ गुरु शिष्य संबंध प्रमुख था, धन गौण होता था|
इंडिया मे: पैसे के बदले मे शिक्षा दी जाती है, रोज के ७०-८० करोड़ रूपए के विज्ञापन कमाई करने के लिए छपते है, गुरु शिष्य संबंध गौण है|
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भारत मे: समाज की प्रगति के लिए शिक्षा दी जाती है|
इंडिया मे: कंपनियों के प्रगति के लिए शिक्षा दी जाती है, शेक्षिक काल खत्म होते हि कंपनियाँ इन पड़े लिखे पशुओं को खरीदने पोहुँच जाती है, और बोली लगाती है|
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भारत मे: गुरुकुल में सदाचार सम्पन्न आचार्यों से ब्रह्मचर्य धारण कर शिक्षा ग्रहण करते है|
इंडिया मे: घर के भोगमय बातावरण, या हॉस्टल के कमरे की दीवारें भांडो की तस्वीरों से ढकी रहती है या शाम को फिल्म और मजे करना, यही मूल उदेश्य है|
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भारत मे: प्राकृतिक वातावरण मे ज्ञान की साधना होती है|
इंडिया मे: अप्राकृतिक वातावरण में नर्सरी, किंडर गार्डन खोले जाते है, किताबों से गाय, बकरी, फुल, फल, सूर्य, चद्रमा समझाए जाते है इस ‘सेकंड-हैण्ड’ जानकारी को ज्ञान कहते है, और पेड़ के निचे बैठकर शिक्षा को सुविधाओं का और पिछड़ेपन का प्रतिक माना जाता है|
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भारत मे: गुरु केन्द्रित के साथ हि शिष्य केन्द्रित शिक्षा पद्धति थी|
indiaइंडिया मे: केवल विषय केन्द्रित शिक्षा पद्धति|
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भारत मे: पुरुषो को समाज की प्रगति की और स्त्रियों को प्रगति को स्थिरता प्रदान करने की शिक्षा दी जाती थी जैसे चलते समय एक पैर स्थिर रहता है|
indiइंडिया मे: दोनों को एक सी शिक्षा दी जाती है जैसे दोनों पैर एक साथ बढाने पर जो दुर्गति होती है वैसे हि गति हो रही है|
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भारत मे: भारत मे शिक्षा आधारित परीक्षा होती थी|
indiaइंडिया मे: यहाँ परीक्षा आधारित शिक्षा होती है|
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भारत मे: भारतीय शिक्षा का मनोविज्ञान त्रिगुण (सत्व-रज-तम) और प्रकृति (वात-पित्त-कफ) पर आधारित था – सत्य गुण का विकास, रजोगुण का नियंत्रण और तमोगुण का दमन शिक्षा के द्वारा साधा जाता था|
इंडिया मे: इंडिया की शिक्षा का मनोविज्ञान व्यवहार पर आधारित है|
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भारत मे: प्रारम्भिक स्तर पर अपने आसपास की प्रकृति को समझने की शिक्षा दी जाती है|
इंडिया मे: प्रारम्भिक स्तर पर देशी विदेशी पृथ्वी आकाश पाताल सबका भूगोल पड़ाया जाता है लेकिन दैनिक जीवन मे सर्वाधिक उपयोगी गाँव व जिले का भूगोल नहीं पड़ाया जाता है|
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भारत मे: आज की तरह इतिहास की शिक्षा नहीं होती, लेकिन लोगों को अपने पूर्वजों के बारे मे ज्ञान था|
इंडिया मे: अंग्रेजो द्वारा भारत के स्वाभिमान को भंग करने के लिए लिखा गया मनघडन्त इतिहास पड़ाया जा रहा है, अंग्रेजो के सुधार कार्य (?) और बलात्कारी बादशाहों की लोरियां हि इतिहास मे मिलती है|
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भारत मे: मातृभाषा और अधिकतर राष्ट्रभाषा संस्कृत मे हि शिक्षा दी जाती थी, भाषा केवल व्यक्ति की अभिव्यक्ति का साधन हि नही यह संस्कृति व परंपरा के संरक्षण का भी साधन है|
इंडिया मे: विदेशी भाषा अंग्रेजी मे शिक्षा दी जाती है हमारी संस्कृति के हजारो शब्द है जिनका अनुवाद अंग्रेजी नहीं कर सकती जैसे प्राण, प्रजा, यज्ञ, सती, सत्य-रज-तम, गलत अनुवाद धर्म – रिलिजन, विवाह-मेरिज, कृषि- एग्रीकल्चर, मक्खन-बटर, दर्शन- फिलोसोफी, तत्व-एलिमेंट, रसायन-केमिकल आदि ने बहुत नुकसान पहुँचाया इससे लोग ऋषि संस्कृति से कटकर आसुरी संस्कृति के प्रभाव मे फंस गया|
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भारत मे: प्रगति का विज्ञानं पड़ाया जाता है|
इंडिया मे: दुर्गति का विज्ञानं पड़ाया जाता है|
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भारत मे: अर्थशास्त्र पड़ाया जाता है|
इंडिया मे: अनर्थशात्र पड़ाया जाता है, अर्थ शास्त्र पड़कर भी कितने हि छात्र उनकी बराबरी नही कर सकते जो कड़ी धुप मे मेहनत से बड़ा व्यापार खड़ा कर देते है जो कम पड़े लिखे होते है एमबीए धरी कम पड़े लिखों के निचे एडियाँ रगड़ते है|
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भारत मे: हमारे समाज की मूल्यों की शिक्षा दी जाती है|
इंडिया मे: भारत के मूल्यों की खिल्ली दी जाने वाली राष्ट्रद्रोही, बामपंथियों से भरी सोच और शिक्षा दी जाती है|
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भारत मे: काम शिक्षा का उदेश्य था – काम उर्जा को ऊपर उठाकर पुस्तकीय ज्ञान से श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति, विवेक से काम के आवेश से मुक्त होना, संभव न हो तो गृहस्थ आश्रम मे प्रवेश कर काम सुख को भोग, उसकी क्षण भंगुरता का अनुभव कर शाश्वत सुख (प्रेम, भक्ति, ध्यान, समाधि की और बढना); श्रेष्ट संतान की प्राप्ति|
इंडिया मे: यौन शिक्षा का उदेश्य है इंडिया की पश्चिम की तरह व्यभिचारी देश बनाना, ब्रह्मचर्य भंग करने, सुरक्षित यौन करने, यौन संबंधो के व्यावहारिक अनुभवों के लिए प्ररित करने वाली शिक्षा दी जाती है; क्या आपने कभी ‘नोट’ किया कभी मीडिया ने यह विषय उठाया या सरकार ने कही इन्टरनेट पर अश्लील सामग्री, विडियो पर प्रतिबंध लगे ? नहीं ! मेकोले यही चाहता था|

bharat के 11 आश्चर्य जनक सत्य


1 :- pentiyam  chip  का अविष्कार ” विनोद धाम ” ने किया था (अब दुनिया में 90 % कंप्यूटर इसी से   चलते हें)
2 :- श्री सबीर भाटिया ने hotmail  बनाई (hotmail  दुनिया का no1 प्रोग्राम हे )
3 :- अमेरिका में 38 % डॉक्टर भारतीय हें
4 :- अमेरिका में 12 % वैज्ञानिक भारतीय हें
5 :- नासा में 36 % वैज्ञानिक भारतीय हें
6 :- मैक्रोसोफ्ट के 34 % कर्मचारी भारतीय हें
7 :- IBN के 28 % कर्मचारी भारतीय हें
8 :- INTEL के 17% वैज्ञानिक भारतीय हें
9 :- JIRKS के 13 % कर्मचारी भारतीय हें
10 :- प्रसिद्ध खेल Shatranj की खोज भारत में हुई
11 :- दुनिया के पहले Airplane  की खोज भारत के वैज्ञानिक शिवकर बापूजी तलपडे ने की  यदि यकीं नही होता तो इस लिंक को देखें http://www.bharatyogi.net/2013/04/write-brothers.html

जो लोग भारत देश को कम आकते हें उन्हें यह सोचना चाहिए


Plastic Surgery इसका अविष्कार भारत मे हुआ है|


अगर आप पूरी पोस्ट नही पड़ सकते तो यहाँ Click करें: राजीव दीक्षित Rajiv Dixit
http://www.youtube.com/watch?v=ZO-bpE9NYUA

Plastic Surgery जो आज की Surgery की दुनिया मे आधुनिकतम विद्या है इसका अविष्कार भारत मे हुअ है| सर्जरी का अविष्कार तो हुआ ही  है Plastic Surgery का अविष्कार भी यहाँ हि हुआ है| प्लास्टिक सर्जरी मे कहीं की त्वचा  को काट के कहीं लगा देना और उसको इस तरह से लगा देना की पता हि न चले यह विद्या सबसे पहले दुनिया को भारत ने दी है|

1780 मे दक्षिण भारत के कर्णाटक राज्य के एक बड़े भू भाग का राजा था हयदर अली| 1780-84 के बीच मे अंग्रेजों ने हयदर अली के ऊपर कई बार हमले किये और एक हमले का जिक्र एक अंग्रेज की डायरी मे से मिला है| एक अंग्रेज का नाम था कोर्नेल कूट उसने हयदर अली पर हमला किया पर युद्ध मे अंग्रेज परास्त हो गए और हयदर अली ने कोर्नेल कूट की नाक काट दी|

कोर्नेल कूट अपनी डायरी मे लिखता है के “मैं पराजित हो गया, सैनिको ने मुझे बन्दी बना लिया, फिर मुझे हयदर अली के पास ले गए और उन्होंने मेरा नाक काट दिया|” फिर कोर्नेल कूट लिखता है के “मुझे घोडा दे दिया भागने के लिए नाक काट के हात मे दे दिया और कहा के भाग जाओ तो मैं घोड़े पे बैठ के भागा| भागते भागते मैं बेलगाँव मे आ गया, बेलगाँव मे एक वैद्य ने मुझे देखा और पूछा मेरी नाक कहाँ कट गयी? तो मैं झूट बोला के किसीने पत्थर मार दिया, तो वैद्य ने बोला के यह पत्थर मारी हुई नाक नही है यह तलवार से काटी हुई नाक है, मैं वैद्य हूँ मैं जानता हूँ| तो मैंने वैद्य से सच बोला के मेरी नाक काटी गयी है| वैद्य ने पूछा किसने काटी? मैंने बोला तुम्हारी राजा ने काटी| वैद्य ने पूछा क्यों काटी तो मैंने बोला के उनपर हमला किया इसलिए काटी| फिर वैद्य बोला के तुम यह काटी हुई नाक लेके क्या करोगे? इंग्लैंड जाओगे? तो मैंने बोला इच्छा तो नही है फिर भी जाना हि पड़ेगा|”

यह सब सुनके वो दयालु वैद्य कहता है के मैं तुम्हारी नाक जोड़ सकता हूँ, कोर्नेल कूट को पहले विस्वास नही हुआ, फिर बोला ठीक  है जोड़ दो तो वैद्य बोला तुम मेरे घर चलो| फिर वैद्य ने कोर्नेल को ले गया और उसका ऑपरेशन किया और इस ऑपरेशन का तिस पन्ने मे वर्णन है| ऑपरेशन सफलता पूर्वक संपन्न हो गया नाक उसकी जुड़ गयी, वैद्य जी ने उसको एक लेप दे दिया बनाके और कहा की यह लेप ले जाओ और रोज सुबह शाम लगाते रहना| वो लेप लेके चला गया और 15-17 दिन के बाद बिलकुल नाक उसकी जुड़ गयी और वो जहाज मे बैठ कर लन्दन चला गया|

फिर तिन महीने बाद ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे खड़ा हो कोर्नेल कूट भाषण दे रहा है और सबसे पहला सवाल पूछता है सबसे के आपको लगता है के मेरी नाक कटी हुई है? तो सब अंग्रेज हैरान होक कहते है अरे नही नही तुम्हारी नाक तो कटी हुई बिलकुल नही दिखती| फिर वो कहानी सुना रहा है ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे के मैंने हयदर अली पे हमला किया था मैं उसमे हार गया उसने मेरी नाक काटी फिर भारत के एक वैद्य ने मेरी नाक जोड़ी और भारत की वैद्यों के पास इतनी बड़ी हुनर है इतना बड़ा ज्ञान है की वो काटी हुई नाक को जोड़ सकते है|

फिर उस वैद्य जी की खोंज खबर ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे ली गयी, फिर अंग्रेजो का एक दल आया और बेलगाँव की उस वैद्य को मिला, तो उस वैद्य ने अंग्रेजो को बताया के यह काम तो भारत के लगभग हर गाँव मे होता है; मैं एकला नहीं हूँ ऐसा करने वाले हजारो लाखों लोग है| तो अंग्रेजों को हैरानी हुई के कोन सिखाता है आपको ? तो वैद्य जी कहने लगे के हमारे इसके गुरुकुल चलते है और गुरुकुलों मे सिखाया जाता है|

फिर अंग्रेजो ने उस गुरुकुलों मे गए उहाँ उन्होंने एडमिशन लिया, विद्यार्थी के रूप मे भारती हुए और सिखा, फिर सिखने के बाद इंग्लॅण्ड मे जाके उन्होंने प्लास्टिक सर्जरी शुरू की| और जिन जिन अंग्रेजों ने भारत से प्लास्टिक सर्जरी सीखी है उनकी डायरियां हैं| एक अंग्रेज अपने डायरी मे लिखता है के ‘जब मैंने पहली बार प्लास्टिक सर्जरी सीखी, जिस गुरु से सीखी वो भारत का विशेष आदमी था और वो नाइ था जाती का| मने जाती का नाइ, जाती का चर्मकार या कोई और हमारे यहाँ ज्ञान और हुनर के बड़े पंडित थे| नाइ है, चर्मकार है इस आधार पर किसी गुरुकुल मे उनका प्रवेश वर्जित नही था, जाती के आधार पर हमारे गुरुकुलों मे प्रवेश नही हुआ है, और जाती के आधार पर हमारे यहाँ शिक्षा की भी व्यवस्था नही था| वर्ण व्यवस्था के आधार पर हमारे यहाँ सबकुछ चलता रहा| तो नाइ भी सर्जन है चर्मकार भी सर्जन है| और वो अंग्रेज लिखता है के चर्मकार जादा अच्छा  सर्जन इसलिए हो सकता है की उसको चमड़ा सिलना सबसे अच्छे तरीके से आता है|

एक अंग्रेज लिख रहा है के ‘मैंने जिस गुरु से सर्जरी सीखी वो जात का नाइ था और सिखाने के बाद उन्होंने मुझसे एक ऑपरेशन करवाया और उस ऑपरेशन की वर्णन है| 1792 की बात है एक मराठा सैनिक की दोनों हात युद्ध मे कट गए है और वो उस वैद्य गुरु के पास कटे हुए हात लेके आया है जोड़ने के लिए| तो गुरु ने वो ऑपरेशन उस अंग्रेज से करवाया जो सिख रहा था, और वो ऑपरेशन उस अंग्रेज ने गुरु के साथ मिलके बहुत सफलता के साथ पूरा किया| और वो अंग्रेज जिसका नाम डॉ थॉमस क्रूसो था अपनी डायरी मे कह रहा है के “मैंने मेरे जीवन मे इतना बड़ा ज्ञान किसी गुरु से सिखा और इस गुरु ने मुझसे एक पैसा नही लिया यह मैं बिलकुल अचम्भा मानता हूँ आश्चर्य मानता हूँ|” और थॉमस क्रूसो यह सिख के गया है और फिर उसने प्लास्टिक सेर्जेरी का स्कूल खोला, और उस स्कूल मे फिर अंग्रेज सीखे है, और दुनिया मे फैलाया है| दुर्भाग्य इस बात का है के सारी दुनिया मे Plastic Surgery का उस स्कूल का तो वर्णन है लेकिन इन वैद्यो का वर्णन अभी तक नही आया विश्व ग्रन्थ मे जिन्होंने अंग्रेजो को प्लास्टिक सेर्जेरी सिखाई थी|

आपने पूरी पोस्ट पढ़ी  इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद्
वन्देमातरम
भारत माता की जय

विज्ञानं के क्षेत्र में भारत और India का अंतर: राजीव दीक्षित

 विज्ञानं के क्षेत्र में भारत और India का अंतर:@[466243806766675:274:राजीव दीक्षित Rajiv Dixit] भारत में : किसीको वैज्ञानिक बनने से पहले उसका ऋषि होना आवशक होता था। इंडिया में: वैज्ञानिक बनने के लिए पुस्तकों का ज्ञान और कुछ जड़ का प्रयोग करने की क्षमता काफी है। ---------------------------------------------------------------- भारत में: भारतीय वैज्ञानिक जानते थे की मनुष्य प्राकृतिक वातावरण में ही स्वस्थ रहता है उन्नति करता है इसलिए यहाँ प्रकृति को पुष्ट कर उससे अधिक से अधिक लाभ उठाने का विज्ञानं विकसित हुआ, भारत का विज्ञानं समृद्धि का विज्ञानं था।  इंडिया में: इंडिया ने प्रकृति को उजड़ा लोगोंको प्रकृति से दूर कर दिया, इससे जो अभाव और विकृतिया पैदा हुई उसकी पूर्ति करने के लिए विज्ञानं का विकास किया, इसलिए इंडिया का विज्ञानं अभाव एवं दुर्गति का विज्ञानं है। ------------------------------------------------------------------ भारत में: प्रकृति से जुड़े होने के कारन भारत में स्वस्य्थ जीवन का विज्ञानं विकसित हुआ। इंडिया में: प्रकृति विरोधी होने के कारन रोग बड़े तो इंडिया ने पश्चिम की चिकित्सा पद्धति अपनाया। -------------------------------------------------------------------- भारत में: यही विज्ञानं का विकास हुआ सभी बड़े आविष्कार यहाँ हुए। इंडिया में: हमारे वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार पर आविष्कार करने वाले अंग्रेजो को ही मूल आविष्कार मानना, पश्चिम के इसी विज्ञानं की नक़ल और उसपर आधारित तकनीक का विकास हो रहा हैं।  --------------------------------------------------------------------- भारत में: भारत के हर गाँव और शहर बहुत ही समृद्ध थे, गाँव में ही रोजगार उपलब्ध थे, बेरोजगारी नामक शब्द तक नही था समाज में, कभी व्यापारी, तीर्थयात्री, विद्यान दूर दूर तक आते थे, यात्रियों को कोई कष्ट न हो इसलिए अतिथि सत्कार की परंपरा विकसित हुई, भारत निर्यात में बहुत आगे था, इसलिए यहाँ नौका विज्ञानं अति समृद्ध था, वास्कोडिगामा ने भारत की खोंज नही की थी वह अफ्रीका के नाविकों और व्यापारियों के साथ यहाँ पहुंचा था।  इंडिया में: शहरों को बसने के लिए गाँव को उजाड़ा। गाँव से शहर, शहर से महानगर, दूरियों के कारन यातायात के लिए नेशनल हाईवे, ट्रक, रेल, विमान इसी तरह शहरों में भीड़ बड़ी तो शहरों में ऊँची इमारतों आदि मजबूरी का विज्ञानं विकसित हो रहा हैं। 5 लाख से अधिक जनसँख्या होने के बाद शहर विकृत होने लगते हैं, उस विकृति को दूर करने के लिए जिस विज्ञानं की आवश्यकता होती हैं वह प्रकृति के विरुद्ध होने से विकृति का विज्ञानं हैं।   -------------------------------------------------------------------- भारत में: प्रकृति से जुडाव होने के कारण हर व्यक्ति की सोच वैज्ञानिक थी। इंडिया में: प्रकृति से कटा व्यक्ति भेद चाल चल रहा है, सुनामी यहाँ एक भी वनवासी या खुला पशु नही मरा, पड़े लिखे समाज के लाखों लोग मरे। होटलों, आधुनिक अनुष्ठानो का अधिक से अधिक क्षति हुआ। पशु जितना सामान्य ज्ञान न होने के बाद भी यह अहंकार की हम वैज्ञानिक युग में जी रहें है, व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ने की वजाय, आपदा की सुचना के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों पर अरबों खरबों खर्च किया जाता हैं। -------------------------------------------------------------------- भारत में: समाज की प्रगति के लिए विज्ञानं की तकनीकों का विकास होता था। इंडिया में: तकनिकी प्रगति के अनुरूप समाज को ढलने का प्रयत्न किया जाता हैं। ------------------------------------------------------------------ भारत में: भारत के ऋषि जानते थे की शक्ति का आधार आहार नही है उसमे निहित प्राण हैं। अतः प्राण विज्ञानं आधारित बैल से कृषि का विकास हुआ। इंडिया में: इंडिया का वैज्ञानिक जानते ही नही के क्या है प्राण। सारा आहार प्राणहीन ही नही प्राणनाशक होता जा रहा हैं।  ------------------------------------------------------------------ भारत में: गेहूं पिसने की घट्टी, तेल निकलने की घाणी, घी निकालने की बिलोना पद्धति, रोटी बनाने वाली आदि तकनीकों का विकास प्राण विज्ञानं के आधार पर हुआ, विज्ञानं में पिछड़ेपन का कारण नही। इंडिया में: आता चक्की, तेल मिल, डेयरी घी यह अज्ञान की दें हैं विज्ञानं की नही, ब्रेड बनाने में गेहूं के 23 पौष्टिक गुण नष्ट हो जाते हैं फिर उसमे 8 कृत्तिम और सुगन्धित गुण डालकर कंपनी कहती है 'एनरिच्ड ब्रेड' 'हमारा आटा बिना मिलावट वाला' और पड़ी लिखी महिलाये उसे खरीद कर गौरान्वित होती हैं। ----------------------------------------------------------------- भारत में: प्रकृति आधारित आयुर्वेद के मानदंडो पर खरा उतरने पर ही किसी विद्या को स्वस्थ विज्ञानं का प्रमाण पत्र मिलता हैं।  इंडिया में: अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के मानदंडो पर खरा उतरने पर ही किसी विद्या को स्वस्थ विज्ञानं का प्रमाण मिलता हैं। ---------------------------------------------------------------- भारत में: स्वस्थ अर्थात स्व में स्थित। इंडिया में: स्वस्थ अर्थात रोग मुक्त। -------------------------------------------------------------- भारत में: वैज्ञानिक भाषा संस्कृत का विकास हुआ। इंडिया में: सभी भाषाएँ अवैज्ञानिक भाषा अंग्रेजी के अधीन हैं।
विज्ञानं के क्षेत्र में भारत और India का अंतर:राजीव दीक्षित Rajiv Dixit
भारत में : किसीको वैज्ञानिक बनने से पहले उसका ऋषि होना आवशक होता था।
इंडिया में: वैज्ञानिक बनने के लिए पुस्तकों का ज्ञान और कुछ जड़ का प्रयोग करने की क्षमता काफी है।
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भारत में: भारतीय वैज्ञानिक जानते थे की मनुष्य प्राकृतिक वातावरण में ही स्वस्थ रहता है उन्नति करता है इसलिए यहाँ प्रकृति को पुष्ट कर उससे अधिक से अधिक लाभ उठाने का विज्ञानं विकसित हुआ, भारत का विज्ञानं समृद्धि का विज्ञानं था।
इंडिया में: इंडिया ने प्रकृति को उजड़ा लोगोंको प्रकृति से दूर कर दिया, इससे जो अभाव और विकृतिया पैदा हुई उसकी पूर्ति करने के लिए विज्ञानं का विकास किया, इसलिए इंडिया का विज्ञानं अभाव एवं दुर्गति का विज्ञानं है।
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भारत में: प्रकृति से जुड़े होने के कारन भारत में स्वस्य्थ जीवन का विज्ञानं विकसित हुआ।
इंडिया में: प्रकृति विरोधी होने के कारन रोग बड़े तो इंडिया ने पश्चिम की चिकित्सा पद्धति अपनाया।
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भारत में: यही विज्ञानं का विकास हुआ सभी बड़े आविष्कार यहाँ हुए।
इंडिया में: हमारे वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार पर आविष्कार करने वाले अंग्रेजो को ही मूल आविष्कार मानना, पश्चिम के इसी विज्ञानं की नक़ल और उसपर आधारित तकनीक का विकास हो रहा हैं।
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भारत में: भारत के हर गाँव और शहर बहुत ही समृद्ध थे, गाँव में ही रोजगार उपलब्ध थे, बेरोजगारी नामक शब्द तक नही था समाज में, कभी व्यापारी, तीर्थयात्री, विद्यान दूर दूर तक आते थे, यात्रियों को कोई कष्ट न हो इसलिए अतिथि सत्कार की परंपरा विकसित हुई, भारत निर्यात में बहुत आगे था, इसलिए यहाँ नौका विज्ञानं अति समृद्ध था, वास्कोडिगामा ने भारत की खोंज नही की थी वह अफ्रीका के नाविकों और व्यापारियों के साथ यहाँ पहुंचा था।
इंडिया में: शहरों को बसने के लिए गाँव को उजाड़ा। गाँव से शहर, शहर से महानगर, दूरियों के कारन यातायात के लिए नेशनल हाईवे, ट्रक, रेल, विमान इसी तरह शहरों में भीड़ बड़ी तो शहरों में ऊँची इमारतों आदि मजबूरी का विज्ञानं विकसित हो रहा हैं। 5 लाख से अधिक जनसँख्या होने के बाद शहर विकृत होने लगते हैं, उस विकृति को दूर करने के लिए जिस विज्ञानं की आवश्यकता होती हैं वह प्रकृति के विरुद्ध होने से विकृति का विज्ञानं हैं।
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भारत में: प्रकृति से जुडाव होने के कारण हर व्यक्ति की सोच वैज्ञानिक थी।
इंडिया में: प्रकृति से कटा व्यक्ति भेद चाल चल रहा है, सुनामी यहाँ एक भी वनवासी या खुला पशु नही मरा, पड़े लिखे समाज के लाखों लोग मरे। होटलों, आधुनिक अनुष्ठानो का अधिक से अधिक क्षति हुआ। पशु जितना सामान्य ज्ञान न होने के बाद भी यह अहंकार की हम वैज्ञानिक युग में जी रहें है, व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ने की वजाय, आपदा की सुचना के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों पर अरबों खरबों खर्च किया जाता हैं।
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भारत में: समाज की प्रगति के लिए विज्ञानं की तकनीकों का विकास होता था।
इंडिया में: तकनिकी प्रगति के अनुरूप समाज को ढलने का प्रयत्न किया जाता हैं।
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भारत में: भारत के ऋषि जानते थे की शक्ति का आधार आहार नही है उसमे निहित प्राण हैं। अतः प्राण विज्ञानं आधारित बैल से कृषि का विकास हुआ।
इंडिया में: इंडिया का वैज्ञानिक जानते ही नही के क्या है प्राण। सारा आहार प्राणहीन ही नही प्राणनाशक होता जा रहा हैं।
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भारत में: गेहूं पिसने की घट्टी, तेल निकलने की घाणी, घी निकालने की बिलोना पद्धति, रोटी बनाने वाली आदि तकनीकों का विकास प्राण विज्ञानं के आधार पर हुआ, विज्ञानं में पिछड़ेपन का कारण नही।
इंडिया में: आता चक्की, तेल मिल, डेयरी घी यह अज्ञान की दें हैं विज्ञानं की नही, ब्रेड बनाने में गेहूं के 23 पौष्टिक गुण नष्ट हो जाते हैं फिर उसमे 8 कृत्तिम और सुगन्धित गुण डालकर कंपनी कहती है ‘एनरिच्ड ब्रेड’ ‘हमारा आटा बिना मिलावट वाला’ और पड़ी लिखी महिलाये उसे खरीद कर गौरान्वित होती हैं।
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भारत में: प्रकृति आधारित आयुर्वेद के मानदंडो पर खरा उतरने पर ही किसी विद्या को स्वस्थ विज्ञानं का प्रमाण पत्र मिलता हैं।
इंडिया में: अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के मानदंडो पर खरा उतरने पर ही किसी विद्या को स्वस्थ विज्ञानं का प्रमाण मिलता हैं।
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भारत में: स्वस्थ अर्थात स्व में स्थित।
इंडिया में: स्वस्थ अर्थात रोग मुक्त।
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भारत में: वैज्ञानिक भाषा संस्कृत का विकास हुआ।
इंडिया में: सभी भाषाएँ अवैज्ञानिक भाषा अंग्रेजी के अधीन हैं।

हिन्दी मे पढ़े क्या लिखा अंग्रेज़ macaulay ने 1835 मे अंग्रेज़ो की संसद को !!!

हिन्दी मे पढ़े क्या लिखा अंग्रेज़ macaulay ने 1835 मे अंग्रेज़ो की संसद को !!! _________________________________________ मैं भारत के कोने कोने मे घूमा हूँ मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो भिखारी हो चोर हो !  इस देश में मैंने इतनी धन दोलत देखी है इतने ऊंचे चारित्रिक आदर्श गुणवान मनुष्य देखे हैं की मैं नहीं समझता हम इस देश को जीत पाएंगे , जब तक इसकी रीड की हड्डी को नहीं तोड़ देते !  जो है इसकी आध्यात्मिक संस्कृति और इसकी विरासत !  इस लिए मैं प्रस्ताव रखता हूँ ! की हम पुरातन शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति को बादल डाले !  क्यूंकि यदि भारतीय सोचने लगे की जो भी विदेशी है और अँग्रेजी है वही अच्छा है और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है तो वे अपने आत्म गौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे !! और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते है ! एक पूरी तरह से दमित देश !!  ______________________________________________________________  और बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है की macaulay अपने इस मकसद मे कामयाब हुआ !! और जैसा उसने कहा था की मैं भारत की शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बना दूंगा की इस मे पढ़ के निकलने वाला व्यक्ति सिर्फ शक्ल से भारतीय होगा ! और अकल से पूरा अंग्रेज़ होगा !!  और यही आज हमारे सामने है दोस्तो ! आज हम देखते है देश के युवा पूरी तरह काले अंग्रेज़ बनते जा रहे है !!  उनकी अँग्रेजी भाषा बोलने पर गर्व होता है !! अपनी भाषा बोलने मे शर्म आती है !!  madam बोलने मे कोई शर्म नहीं आती ! श्री मती बोलने मे शर्म आती है !!  अँग्रेजी गाने सुनने मे गर्व होता है !! मोबाइल मे अँग्रेजी tone लगाने मे गर्व होता है !!  विदेशी समान प्रयोग करने मे गर्व होता है ! विदेशी कपड़े विदेशी जूते विदेशी hair style बड़े गर्व से कहते है मेरी ये चीज इस देश की है उस देश की है !ये made in uk है ये made इन america है !!  अपने बच्चो को convent school पढ़ाने मे गर्व होता है !! बच्चा ज्यादा अच्छी अँग्रेजी बोलने लगे तो बहुत गर्व ! हिन्दी मे बात करे तो अनपद ! विदेशी खेल क्रिकेट से प्रेम कुशती से नफरत !!!  विदेशी कंपनियो pizza hut macdonald kfc पर जाकर कुछ खाना तो गर्व करना !! और गरीब रेहड़ी वाले भाई से कुछ खाना तो शर्म !!  अपने देश धर्म संस्कृति को गालिया देने मे सबसे आगे !! सारे साधू संत इनको चोर ठग नजर आते है !!  लेकिन कोई ईसाई मिशनरी अँग्रेजी मे बोलता देखे तो जैसे बहुत समझदार लगता है !!  करोड़ो वर्ष पुराने आयुर्वेद को गालिया ! और अँग्रेजी ऐलोपैथी को तालिया !!!  विदेशी त्योहार वैलंटाइन मनाने पर गर्व !! स्वामी विवेकानद का जन्मदिन याद नहीं !!!!  दोस्तो macaulay अपनी चाल मे कामयाब हुआ !! और ये सब उसने कैसे किया !!  ये जानने के लिए आप सिर्फ एक बार नीचे दिये गए link पर click करे !!! जरूर जरूर click करे ! https://www.youtube.com/watch?v=jwPuWgVuVwU   वन्देमातरम वन्देमातरम वन्देमातरम वन्देमातरम !!!
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मैं भारत के कोने कोने मे घूमा हूँ मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो भिखारी हो चोर हो !

इस देश में मैंने इतनी धन दोलत देखी है इतने ऊंचे चारित्रिक आदर्श गुणवान मनुष्य देखे हैं की मैं नहीं समझता हम इस देश को जीत पाएंगे , जब तक इसकी रीड की हड्डी को नहीं तोड़ देते !

जो है इसकी आध्यात्मिक संस्कृति और इसकी विरासत !

इस लिए मैं प्रस्ताव रखता हूँ ! की हम पुरातन शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति को बादल डाले !

क्यूंकि यदि भारतीय सोचने लगे की जो भी विदेशी है और अँग्रेजी है वही अच्छा है और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है तो वे अपने आत्म गौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे !! और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते है ! एक पूरी तरह से दमित देश !!

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और बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है की macaulay अपने इस मकसद मे कामयाब हुआ !!
और जैसा उसने कहा था की मैं भारत की शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बना दूंगा की इस मे पढ़ के निकलने वाला व्यक्ति सिर्फ शक्ल से भारतीय होगा ! और अकल से पूरा अंग्रेज़ होगा !!

और यही आज हमारे सामने है दोस्तो ! आज हम देखते है देश के युवा पूरी तरह काले अंग्रेज़ बनते जा रहे है !!

उनकी अँग्रेजी भाषा बोलने पर गर्व होता है !!
अपनी भाषा बोलने मे शर्म आती है !!

madam बोलने मे कोई शर्म नहीं आती !
श्री मती बोलने मे शर्म आती है !!

अँग्रेजी गाने सुनने मे गर्व होता है !!
मोबाइल मे अँग्रेजी tone लगाने मे गर्व होता है !!

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अपने बच्चो को convent school पढ़ाने मे गर्व होता है !!
बच्चा ज्यादा अच्छी अँग्रेजी बोलने लगे तो बहुत गर्व ! हिन्दी मे बात करे तो अनपद !
विदेशी खेल क्रिकेट से प्रेम कुशती से नफरत !!!

विदेशी कंपनियो pizza hut macdonald kfc पर जाकर कुछ खाना तो गर्व करना !!
और गरीब रेहड़ी वाले भाई से कुछ खाना तो शर्म !!

अपने देश धर्म संस्कृति को गालिया देने मे सबसे आगे !! सारे साधू संत इनको चोर ठग नजर आते है !!

लेकिन कोई ईसाई मिशनरी अँग्रेजी मे बोलता देखे तो जैसे बहुत समझदार लगता है !!

करोड़ो वर्ष पुराने आयुर्वेद को गालिया ! और अँग्रेजी ऐलोपैथी को तालिया !!!

विदेशी त्योहार वैलंटाइन मनाने पर गर्व !! स्वामी विवेकानद का जन्मदिन याद नहीं !!!!

दोस्तो macaulay अपनी चाल मे कामयाब हुआ !! और ये सब उसने कैसे किया !!

ये जानने के लिए आप सिर्फ एक बार नीचे दिये गए link पर click करे !!! जरूर जरूर click करे !
https://www.youtube.com/watch?v=jwPuWgVuVwU

वन्देमातरम वन्देमातरम वन्देमातरम वन्देमातरम !!!

Bharat देश में चल रहे गुप्त षड्यंत्र को समझने के लिए कृपया पांच मिनट हमें दीजिए !

Bharat देश में चल रहे गुप्त षड्यंत्र को समझने के लिए कृपया पांच मिनट हमें दीजिए !
लेख से पहले आपको एक सच्ची कहानी सुनाना चाहता हूँ।

हमारे देश में एक महान scientist हुए हैं प्रो. श्री जगदीश चन्द्र बोस। भारत
को और हम भारत वासियों को उन पर बहुत गर्व है। इन्होने सबसे पहले

अपने शोध से यह निष्कर्ष निकाला कि मानव की तरह पेड़ पौधों में भी भावनाएं
होती हैं। वे भी हमारी तरह हँसते खिलखिलाते और रोते हैं। उन्हें भी

सुख दुःख का अनुभव होता है। और श्री बोस के इस अनुसंधान की तरह इसकी कहानी भी
बड़ी दिलचस्प है।

श्री बोस ने शोध के लिये कुछ गमले खरीदे और उनमे कुछ पौधे लगाए। अब इन्होने
गमलों को दो भागों में बांटकर आधे घर के एक कोने में तथा शेष

को किसी अन्य कोने में रख दिया। दोनों को नियमित रूप से पानी दिया, खाद डाली।
किन्तु एक भाग को श्री बोस रोज़ गालियाँ देते कि तुम बेकार हो,

निकम्मे हो, बदसूरत हो, किसी काम के नहीं हो, तुम धरती पर बोझ हो, तुम्हे तो
मर जाना चाहिए आदि आदि। और दूसरे भाग को रोज़ प्यार से

पुचकारते, उनकी तारीफ़ करते, उनके सम्मान में गाना गाते। मित्रों देखने से यह
घटना साधारण सी लगती है। किन्तु इसका प्रभाव यह हुआ कि जिन

पौधों को श्री बोस ने गालियाँ दी वे मुरझा गए और जिनकी तारीफ़ की वे खिले खिले
रहे, पुष्प भी अच्छे दिए।

तो मित्रों इस साधारण सी घटना से बोस ने यह सिद्ध कर दिया कि किस प्रकार से
गालियाँ खाने के बाद पेड़ पौधे नष्ट हो गए। अर्थात उनमे भी भावनाएं हैं।

मित्रों जब निर्जीव से दिखने वाले सजीव पेड़ पौधों पर अपमान का इतना
दुष्प्रभाव पड़ता है तो मनुष्य सजीव सदेह का क्या होता होगा?

वही होता है जो आज हमारे भारत देश का हो रहा है।

500 -700 वर्षों से हमें यही सिखाया पढाया जा रहा है कि तुम बेकार हो, खराब
हो, तुम जंगली हो, तुम तो हमेशा लड़ते रहते हो, तुम्हारे अन्दर सभ्यता

नहीं है, तुम्हारी कोई संस्कृती नहीं है, तुम्हारा कोई दर्शन नहीं है,
तुम्हारे पास कोई गौरवशाली इतिहास नहीं है, तुम्हारे पास कोई ज्ञान विज्ञान
नहीं है

आदि आदि। मित्रों अंग्रेजों के एक एक अधिकारी भारत आते गए और भारत व भारत
वासियों को कोसते गए। अंग्रजों से पहले ये गालियाँ हमें फ्रांसीसी

 देते थे, और फ्रांसीसियों से पहले ये गालियाँ हमें पुर्तगालियों ने दीं। इसी
क्रम में लॉर्ड मैकॉले का भी भारत में आगमन हुआ। किन्तु मैकॉले की नीति

कुछ अलग थी। उसका विचार था कि एक एक अंग्रेज़ अधिकारी भारत वासियों को कब तक
कोसता रहेगा?

कुछ ऐसी परमानेंट व्यवस्था करनी होगी

कि हमेशा भारत वासी खुद को नीचा ही देखें और हीन भावना से ग्रसित रहें।

इसलिए उसने जो व्यवस्था दी उसका नाम रखा Education System. सारा सिस्टम उसने
ऐसा रचा कि भारत वासियों को केवल वह सब कुछ पढ़ाया

जाए जिससे वे हमेशा गुलाम ही रहें। और उन्हें अपने धर्म संस्कृती से घृणा हो जाए।
 
इस शिक्षा में हमें यहाँ तक पढ़ाया कि भारत वासी सदियों से

गौमांस का भक्षण कर रहे हैं। ( जबकि गोमांस भक्षण योग में खेचरी मुद्रा को कहतें हें )
अब आप ही सोचे यदि भारत वासी सदियों से गाय का
मांस खाते थे तो आज के हिन्दू ऐसा क्यों नहीं करते?

और इनके द्वारा दी गयी सबसे गंदी गाली यह है कि हम भारत वासी आर्य बाहर से आये थे।
आर्यों ने भारत के मूल द्रविड़ों पर आक्रमण करके उन्हें दक्षिण तक

खदेड़ दिया और सम्पूर्ण भारत पर अपना कब्ज़ा ज़मा लिया। और हमारे देश के
वामपंथी चिन्तक आज भी इसे सच साबित करने के प्रयास में लगे हैं।

इतिहास में हमें यही पढ़ाया गया कि कैसे एक राजा ने दूसरे राजा पर आक्रमण
किया। इतिहास में केवल राजा ही राजा हैं प्रजा नदारद है, हमारे ऋषि

मुनि नदारद हैं। और राजाओं की भी बुराइयां ही हैं अच्छाइयां गायब हैं। आप जरा
सोचे कि अगर इतिहास में केवल युद्ध ही हुए तो भारत तो हज़ार साल

पहले ही ख़त्म हो गया होता।

और राजा भी कौन कौन से गजनी, तुगलक, ऐबक, लोदी,
तैमूर, बाबर, अकबर, सिकंदर जो कि भारतीय थे ही नहीं। ( सब के सब लुटेरे थे )

राजा विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान गायब हैं। इनका
ज़िक्र तो इनके आक्रान्ता के सम्बन्ध में आता है। जैसे सिकंदर की कहानी

में चन्द्रगुप्त का नाम है। चन्द्रगुप्त का कोई इतिहास नहीं पढ़ाया गया। और यह
सब आज तक हमारे पाठ्यक्रमों में है।

इसी प्रकार अर्थशास्त्र का विषय है। आज भी अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाले
बड़े बड़े विद्वान् विदेशी अर्थशास्त्रियों को ही पढ़ते हैं।

भारत का सबसे  बड़ा अर्थशास्त्री Chanakya तो कही है ही नहीं।
उनका एक भी सूत्र किसी स्कूल में भी बच्चों को नहीं पढ़ाया जाता।
जबकि उनसे बड़ा अर्थशास्त्री तो पूरी दुनिया
में कोई नहीं हुआ।