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Swami Dyanand Srswati, “प्रभु जिसका कोई नही हे, उसके तुम तो हो,

Swami Dyanand Srswati (महर्षि दयानन्द सरस्वती) जी के उपदेशों नें करोड़ों लोगों को नवजीवन, नवचेतना और नया दृष्टीकोण प्रदान किया हे दयानंद जी के जीवन से जुडी सत्ये घटना यंहा लिख रहा हूँ 

चाडोद में रहने के समय में केवल जल मिश्रित दूध पिलेता था, और रात को थोड़े फल खा लेता था, इसके अतिरिक्त और कुछ नही लेता था, हम सब आश्रम वाशियों के लिए अगल बगल के गाँव वाले लोग दूध भेज देते थे, दोनों गुरुओं के चले जाने के बाद ग्राम्वाशियों ने समझा की आश्रम में कोई नही हे इसलिए दूध लाना बंद कर दिया पहले दिन तो जल पीकर और फल खा कर ही मेने दिन काट दिया था,

दुसरे दिन एक दुग्धव्ती गाएं कंही से भाग कर मेरी कुटिया के सामने आकर खड़ी हो गयी और रम्भाने लगी, पीछे से वंहा गाएं के स्वामी दो भाई भी पहोंच गये, गाएं के स्वामियों ने कहा की इस गाएं का दूध रोज आश्रमवाशियों के लिए भेजते थे, 

हम लोगों ने सुना था की आप सब लोग कंही चले गये हें, इसीलिए कल दूध नही भेजा गया था आज सवेरे ही गाएं भाग गयी, हम गाएं को धूंडते हुए यंहा तक पहोंच गये हें अब कल से हमं यंहा पर दूध भेजदिया करेंगे, लेकिन गाएं आश्रम को छोड़ कर जाने को तयार नही थी, हम सब ने समझलिया था की हमने कल दूध नही पिया था इसलिए आज गाएं हमको दूध पिलाकर ही घर जाएगी, बछड़ा वंहा लाया गया दूध दुहा गया मुझे दूध पिलाकर ही गाएं वंहा से अपने मालिकों के साथ अपने घर को गयी,

जब तक में आश्रम में रहा तब तक प्रतिदिन मेरे लिए दूध का प्रबन्ध हो गया था, मुझको याद आया “प्रभु जिसका कोई नही हे, उसके तुम तो हो,

Note :- दोस्तों ये लेख योगी का आत्मचरित्र पुस्तक पेज नंबर – 115 से लिया गया हे,  

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