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yagya therapy hindi me यज्ञ चिकित्सा विज्ञान

Yagya Therapy A Powerful Natural Cancer Treatment

Yagya Therapy A Powerful pollution Treatment
yagya therapy अग्निहोत्र से होने वाले लाभों की सूची अनन्त है। वायु शुद्धि, आरोग्य, दीर्घायु, वर्षा, दूध, अत्र, धन, बल, ऐश्वर्य, सन्तान, पुष्टि, निष्पापत्व, सच्चरित्रत्ता, यश, तेजस्विता, suvichar सदविचार , सत्कर्म, आनन्द तथा  मोक्ष की प्राप्ति में यह अग्निहोत्र बहुत ही सहायक होता है।
yagya therapy से कुछ लाभ सुगन्धित और रोगनाशक ओषधियों की आहुति देने से प्रत्यक्ष दीखते हैं और कुछ परमात्मा के गुणों का चिन्तन करने से प्राप्त होते हैं।
स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने अपने वेदभाष्यों में अग्निहोत्र yagya therapy के महत्व पर बहुत प्रकाश डाला है।
  • ”जब अग्नि में सुगनिघत पदार्थों का हवन होता है, तभी यह यज्ञ वायु आदि पदार्थों को शुद्ध करके तथा शरीर और ओषधि आदि पदार्थों की रक्षा करके अनेक प्रकार के रसों को उत्पन्न करता है। उन शुद्ध पदार्थों के भोग से प्राणियों के विद्या, ज्ञान और बल की विर्धि होती है।”
  • yagya therapy में जो यज्ञ के धूम से शुद्ध हुए पवन हैं, वे अच्छे राज्य के कराने वाले होकर रोग आदि दोषों का नाश करते हैं और जो अशुद्ध अर्थात् दुर्गन्ध आदि दोषों से भरे हुए हैं वें सुखों का नाश करते हैं। इससे मनुष्यों को चाहिए कि अग्नि में होम द्वारा वायु की शुद्धि से अनेक प्रकार के सुखों को सिद्ध करें।
  • मनुष्यों को योग्य है कि yagya therapy यज्ञविधि से सब पदार्थों का अच्छे प्रकार शोधन करके, सबका सेवन कर और रोगों का निवारण करके सदैव सुखी रहैं।
  • ”यदि यजमान और यज्ञ करने वाले विदवान हों और सुशोभित द्रव्यों को अग्नि में होंम करें, तो क्या क्या सुख प्राप्त न हों”
  • “मनुष्यों को चाहिए कि वे विद्वानों के संग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि करने वाले यज्ञ का विस्तार करें।”
  • “जो यज्ञ yagya therapy से शुद्ध किये हुए अत्र, जल और पवन आदि पदार्थ हैं वे सबकी शुद्धि, बल, पराक्रम और दीर्घ आयु के लिए समर्थ होते हैं। इससे सब मनुष्यों को यज्ञकर्म का अनुष्ठान नित्य करना चाहिए।”
  • yagya therapy के द्वारा “मनुष्य अग्नि में जो आहुति देते हैँ, वह वायु के साथ बादलो में जाकर सूर्य से आकर्षित जल को शुद्ध करती है! फिर वहाँ से वह जल पृथ्वी पर आकर औषधियों को पुष्ट करता है। (yagya therapy) यज्ञ में आहुति सदेव मन्त्रों के साथ ही देनी चाहिए जिससे उसके फल-ज्ञान होने पर नित्य श्रद्धा उत्पन्न हो।”
  • जिस यज्ञ (yagya therapy) से सब सुख हौते हैं, उसका अनुष्ठान सब मनुष्यों को क्यो न करना चाहिए?”
  • “जो मनुष्य अग्निहोत्र आदि यज्ञों को प्रतिदिन करते हैं, वे समस्त संसार के सुखों को बढाते हैं, पुरे संसार का भला करते हैं यह जानना चाहिए।”
  • “होम-नामक यज्ञ वह है, जिसमें मांस, क्षार, अम्ल, तिक्त आदि गुणों से रहित, किन्तु सुगन्धित, पुष्ठ, मिष्ट, रोगनाशक आदि गुणों से युक्त हो।”
  • “जो मनुष्य यज्ञ (yagya therapy) से शुद्ध किये जल, औषधि, पवन, अत्र, पत्र, पुष्प, फल, रस, कन्द अर्थात् अरबी, आलू, कमेरू, रतालू, शकरकन्द आदि पदार्थों का भोजन करते हैं वे नीरोग होकर बुद्धि, बल, आरोग्य और दीर्घायु वाले होते हैं।”
  • “मनुष्य नित्य सुगन्धियुक्त पदार्थों को अग्नि में छोड़ हवन करे , पवन और सूर्य की किरणों द्वारा वनस्पति, ओषधि, मूल, शाखा, पुष्प, और फलादिकों में प्रवेश कराके सब पदार्थों की शुद्धि कर आरोग्य की सिद्धि करें।”
  • “मनुष्यों को चाहिए कि जीवनपर्यंत शरीर, प्राण, अन्त:करण, दशों इन्द्रियाँ और जो सबसे उत्तम सामग्री हो उसको यज्ञ के लिए समर्पित करें , जिससे पापरहित कृतकृत्य होकर परमात्मा को प्राप्त होकर इस जन्म और द्वितीय जन्म में सुख को प्राप्त होवें।”
  • “हे मनुष्यों! सब यज्ञों मैं अग्नि आदि को ही पशु जानो। प्राणी इन यज्ञों में मारने योग्य नहीं न होम के योग्य हैं। जो यज्ञ में पशुओं की बली देते हैं वो व्येक्ती माहापाप के भागी हैं, जो ऐसा जानकर सुगन्धित द्रव्यों को अग्नि में होम करते हैं, और जो वायु शुद्ध हुई सुगन्धित हुई वो सूर्यं को प्राप्त होकर वर्षा द्वारा वहाँ से लोटकर औषधि, प्राण, शरीर और बुद्धि आदि को बल देते हैं।
इस यज्ञ (yagya therapy) के अनेकों लाभ होने के कारण वेदों में इसका बारम्बार उल्लेख आता है। चारों वेदों में यह “यज्ञ” शब्द 11184 बार आया है। ऋग्वेद के 10/11/2 मन्त्र- “ओउम् मृत्यो: पदं योपयन्तो यज्ञियांस “ यही बतलाता है कि यदि आप मृत्यु से बचकर स्वस्थ दीर्घायु चाहते हैं, धन, समृद्धि एवं सुसन्तान वाला होना चाहते हैं तो आप लोग यज्ञ करें एवं अपने जीवन को पवित्र करें।
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महर्षि दयानन्द नें “गायत्री- मन्त्र को ‘महामन्त्र’ का नाम’ दिया है।

Gayatri mantra
 
गायत्री वेदों का सार-
वेदों के लगभग बीस हजार मन्त्रों में शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति का ही व्याख्यान है। परन्तु यह एक अकाट्य सत्य है कि जहाँ वेदों के सारे ही मन्त्र कोई-न’-कोई विशेषता रखते हैं, वहाँ वेदों का गायत्री-मन्त्र विशेष विशेषता से भी बढ़ गया है, क्योंकि इसके अन्दर ज्ञान, कर्म, उपासना तीनों ही तथ्य विघमान हैं।
 
इसीलिए महर्षि दयानन्द नें “गायत्री- मन्त्र को ‘महामन्त्र’ का नाम’ दिया है। महा योगी योगेश्वर शिव ने गायत्री का नाम ‘कामधेनु’ रखा है, ओर समस्त यौगिक साधनों का मूलाधार भी गायत्री ही को बतलाया है। यही नहीं, शिवजी महाराज ने “गायत्री-मंजरी’ में यह भी आदेश दिया है। कि ‘कलियुग में गायत्री मन्त्र के द्वारा ही सर्वश्रेष्ठ सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। श्रंगी ऋषि ने गायत्री को “मोक्ष का मूल कारण’ काहा है।
 

वेदों के लगभग बीस हजार मन्त्रों में शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति का ही व्याख्यान है। इसके अन्दर ज्ञान, कर्म, उपासना तीनों ही तथ्य विघमान हैं। इसीलिए महर्षि दयानन्द नें “गायत्री- मन्त्र को ‘महामन्त्र’ का नाम’ दिया है।

व्यास मुनि “गायत्री तथा ब्रहा’ में कोई भिन्नता नहीं समझते भगवान् मनु ने गायत्री को ब्रहा का मुख (द्वार) लिखा है । प्रजापति ने गायत्री के पहले ही पाद से तीनों लोकों का वैभव प्राप्त कर लेने की घोषणा की है । श्री शंकराचार्य जी ने गायत्री को जगत् की माता कहा है। विदेह जनक महाराज ने बुडिल को बतलाया कि गायत्रीविद बहुत-सा पाप भी यदि करता रहा हो तो वह उस पाप को जलाकर शुद्ध-पवित्र हो जाता है। 
 
भीष्म पितामह ने ‘महाभारत’ के अनुशासन’- पर्व में कहा है…”जहाँ गायत्री-जप होता है, वहाँ बालक मरते नहीं; वहाँ अग्नि हानि नहीं पहुँचाती ; वहाँ गौएँ दूध अधिक देती हैं। गायत्री सर्वभूतों का ह्रदय है। यह सर्वश्रेष्ट श्रुति है। चन्द्रवंशीय सूर्यवंशीय तथा कुरुवंशीय, सब-के-सब, प्राणियों की गति परम पवित्र इसी’सावित्री (गायत्री) का ही पाठ करते हैं ।’ इसी गायत्री-मन्त्र का जप नित्य-प्रति योगिराज श्री कृष्णा शुद्ध-पवित्र होकर मौन रहकर किया करते थे । देवी-भागवत में गायत्री-जप को ही सनातन बतलाया है । और स्वयं परमात्मा ने अथर्ववेद में यह आदेश किया है कि गायत्री “वेदमाता है वरों को देने वाली है आयु, स्वास्थ्य, सन्तान, धन, अन्न, पशु, वैभव, यश देनेवाली है और परमात्मा के दर्शन करानेवाली है।
 
यही कारण है कि इसे गुरुमन्त्र कहकर शेष सारे मन्त्रों से विशेषता दे दी गई है। चाहते हैं सुख, मिलता है दु:ख ! आज की दुनिया हो या पहले युगों की दुनिया, हर काल हर स्थान और हर समय का मानव चाहता है कि उसको इस जीवन में कोई दुःख न हो, और यदि दुसरा ज़न्म मिलनेवाला है, तो उसमें भी वह सुखी ही रहे। सारी दुनिया सुख और शान्ति की खोज में दुखित ओर अशान्त हो रही है परन्तु सुख-प्राप्ति के जितने अधिक यत्न होते हैं, दुनिया उतनी अधिक” दुखी होती चली जा रही है। 
 
जब पूरे यत्न, पूरी बुद्धिमता से किसी`रोगी का इलाज़ हो रहा हो, ओर वह रोग कम होने की अपेक्षा बढता चला जा रहा हो, तो यही कहना पडेगा कि इलाज ठीक नहीं हो रहा है। जब यह प्रत्यक्ष है कि आधूनिक काल की रोगी दुनिया को नाना योजनाओं, नाना सम्मेलनों, नाना प्रयत्नों द्वारा भी नीरोग नहीं बनाया जा सका तो सर्वसाधारण यही कहेंगे कि ये सारे यत्न सर्वथा उलटे परिणाम उत्पन्न करनेवाले हैं।
 
ऐसा कहना सर्वथा इतिहास को झुठलाना है कि ‘जितनी भौतिक उन्नति आज दुनिया के लोगों ने की है, पहले इतनी कभी नहीं हुई भारतीय इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि प्राचीन काल में जितने सुंदर अदभुत आविष्कार हो चूके हैं, उनका 1 प्रतिशत भाग भी आज दुनिया को अभी प्राप्त नहीं हुआ; परन्तु प्राचीन काल में जितनी भौतिक उन्नति हुई उसका प्रयोग केवल मानव-शरीर को सुखी बनाने या नाश करने के लिए नहीं हुआ, अपितु आत्मा और ज्ञान के लिए हुआ, इसीलिए प्राचीन काल की भौतिक उन्नति ने उन लोगों को दुखी नहीं किया । पर आज की दुनिया के आविषकारों ने मानव को अधिक दुखी कर दिया है
 
हमारे पूर्वजों को वेद द्वारा यह ज्ञान प्राप्त था कि वह कौन-सा साधन है जिसके द्वारा इस लोक के सारे वैभवों का मनुष्य आनंद ले सकता है ओर साथ ही आत्मा को’ मोक्ष का आनन्द भी प्राप्त करा सकता है । यही नहीं, इसी मानव जीवन में… प्रकृति के सारे रूपों, सारे स्वादों और सारे आविष्कारों से लाभ उठाते हुए भी मन तथा चित्त शान्ति से भरपूर, सन्तोष ओर प्रसन्नता के रंग में रंगा रह सकता है। यह हुनर, यह अदृभुत ज्ञान वैदिक काल के मनुष्यों ही के पास था। आज का मानव इसे अभी तक जान नहीं पाया। यही कारण है कि आज भू-लोक के किसी भी देश या प्रदेश में वास्तविक शान्ति, संतोष ओर प्रसन्नता दिखाई नहीं देती। इसके विपरीत हाहाकार, रुदन, अशान्ति ओर तडप ही देखी जा रही है।

क्या मोक्ष होने के पश्चात पुनर्जन्म में जीव नहीं आता

प्रशन- उपनिषद, वेदान्त, गीता आदि में यह लिखा है कि मोक्ष होने के पश्चात पुनर्जन्म में जीव नहीं ‘आता-
 
उत्तर- ‘न च पुनरावर्त्तते’ इत्यादि वचनों का यह अभिप्राय है कि जब तक मुक्ति की अवधि है अर्थात् 31 नील, 10 खरब, 40 अरब वर्ष तक मध्यकाल में जन्म में नहीं आना पड़ता। जब मुक्ति की अवधि समाप्त हो जाती है तो जन्म-मरण में आना पड़ता है क्योंकि शुद्ध ज्ञान-कर्मोंपासना से मुक्ति मिलती है और वे ज्ञान कर्मोपासना जीव ने सीमित रूप में किये हैँ । 
 
उनका फल भी सीमित होना चाहिए, असीमित नहीं। यदि सीमित ज्ञान…कर्मोंपासना का फल परमात्मा अनन्त दे देवे तो, अन्याय हो जाए।  जो जितना अच्छा या बुरा कर्म करता है, उसको उतना ही सुख व दुख फल देना न्याय कहाता है । जो पशु, पक्षी आदि योनियाँ है, उनमें जो जीव रहते हैं, वे बहुत दुखी हैँ । यदि बिना कर्म के उसको परमात्मा पशु आदि योनियों में भेज देवे तो वह दोषी हो जाए। इसलिए मुक्ति और बन्धन कर्मों के कारण ईश्वर देता है और कर्मों के सिमित होने से उनका फल भी सिमित होना उचित है , न कि सिमित कर्मों का असीमित फल । 
 
अत: मोक्ष के पश्चात जिव पुनह: ज़न्म-मरण में आता है । यदि मोक्ष से जीव पुन: संसार में जन्म न लेवे तो यह भी दोष आता है कि यह संसार समाप्त हो जाये। क्योंकि जो…जो जिव मोक्ष में जाते रहेंगे वो पुनह संसार में न आयेंगे और जीवों की संख्या निषिचत्त है, वे नये उत्पन नही होते, तो यह संसार समाप्त हो जाना चाहिए था अत्त: मोक्ष को प्राप्त होकर पुन: संसार में जीव का जन्म मानना ही ठीक है।

ब्रहाचर्य रक्षा और इसके फल

१. जिस देश, जाति और वंशके लोग चाहते हों कि हमारी संतान-परम्परामें ब्रह्मचारी उत्पन्न हों, ब्रहाचार्ये (Brahmacharya ) तथा ब्रह्मचारी का विशेष आदर करना चाहिये और स्वयं शाश्त्रोक्त आश्रमोचित ब्रहाचर्यके (brahmacharya) नियमोंका यथा विधि पालन काना चाहिये । वंशपरम्परा और माता- पिताके भावका ब्रहाचर्यपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है अनैतिक रीतिसे उत्पन्न संतानसे ब्रह्मचर्यकी आशा रखना उपहासासप्द है । यदि माता-पिताका संयोग केवल भोगलालसाकी तृप्तिके लिये ही होता है तो भावी संतान वासना पूर्ति परायण हो जाय, इसमें क्या आश्चर्य है? भावी शिशुके शरीरगत सारे ही उपादान माता-पिताके मन और धातुओंसे ही संघटित होते हैं
यदि मूलमें ही दोष रहा तो कार्य निर्दोष केसे हो सकता है? इसलिये माता-पिता को धर्मब्रुद्धिसे ऋतुकाल में शाश्त्ररोक्त रीतिसे संयोग करके सन्तानोत्पादन करना चाहिये । माता-पिताके मनमें आदर्श ब्रह्मचारी संतान उत्पन करनेका संकल्प होना चाहिये । जबतक शिशु गर्भमें रहे, माता-पिता को वासनारहित जीवन व्यतीत करना चाहिये। माता-पिताके ‘भाव-बिज ही संतानमें अंकुरित, पुष्पित, एंव फलित होते हें,
२. जबतक शिशु माँ का दूध पीता है, तब तक माताके शरीर से और भावसे भी कामकी वृत्तिका स्पर्श नं होना ही श्रेयस्कर है; क्योंकि मनमें कामावेश होने पर शरीरके प्रत्येक अवयव एवं परमाणुमें उसकी व्याप्ति हो जाती है । इससे बच्चोंके मनमें भोगसम्बन्धी संस्कार तो पड़ते ही हैं, स्नायुओं मैं उत्तेजना भी होने लगती है छोटे-छोटे बच्चोंके मस्तिष्क और शरीरके अवयव बहुत ही कोमल एवं स्निगध होते हैं । शैशवमें ही उन पर जैसी छाप पड़ जाती है, वही जीवनभर प्रकाशित होती रहती है । जो लोग अपनी संतानको ब्रह्मचारी बनाना
चाहते हैं, उनके लिये यह आवश्यक है कि जब तक वह दूध पीता रहे, तब तक अपनी वासनाको शान्त रखें.
३. माता-पिताको शिशुके सम्मुख एसी कोई चेष्टा कभी नहीं करनी चाहिये, जिसको देखकर उसके जीवनमें भी बुरी आदतें (Bad Habits) उतर आयें । खट्टा, चाट, मिठाई न तो स्वयं खाना चाहिये और न बच्चोकों ही खिलाना चाहिये । शरीर की चरम धातु (वीर्यं) रगरगमें रहती हे । बचपनमें भी उत्तेजक पदार्थोंके सेवनसे उसका प्रथककर्ण होने लगता हे इसीसे छोटे छोटे बच्चोंको भी प्रमेह, धातुक्षय हो जाते हें, बचपन से ही आहार – शुद्धी ब्र्हचार्ये के लिए अत्यन्त आवश्यक हे, आहार शुद्धी के सम्बन्ध में यें बातें ध्यान में रखनी चाहिए
(1) आहार स्वभावसे ही उत्तेजक न हो । मांस, शराब, प्याज, लहसुन आदि जन्मसे ही उत्तेजक हैं
(2) भोज्य पदार्थमें कोई ऐसी वस्तु न मिली हो, जिससे यह विर्यंक्षरणका हेतु बन जाय-जैसे
अमचूर, राई, गरम मसाले, लाल मिर्च इत्यादि । धूम्रपान ब्रहाचर्य का महा शत्रु है

क्या यही महादेव हें यही शंकर सच्चा शिव हैं?

shivling and rat

Rishi Dayanand ऋषि दयानन्द की उस समय आयु थी 14 वर्ष की। माता – पिता का इकलौता पुत्र …प्यार से पला हुआ, धर्मं-पूजा पाठ वेद- अध्ययन में रहता था। शिवरात्रि का व्रत ले रखा था। शिव-मन्दिर रात्रि के समय जब पूजा करते-करते लोग थक गये तो यह चौदह बर्ष का बालक जाग रहा था। उसकी आंखो मैं नीद न थी। वे भगबान् शंकर के दर्शनों के लिए खुली उसी का मार्ग जोह रही थी । किन्तु यह क्या ? क्या यही महादेव हें, यही शंकर सच्चा शिव हैं? पिता जी ने तो उनके और ही प्रकार के गुण का वर्णन किया था ।

बालक ने पिता जी को जगाया, और शिवमूर्ति तथा चूहों की और संकेत करते हुए पूछा ‘यह क्या हे’ जिस महादेव की प्रसान्त पवित्र मूर्ति की कथा जिस महादेव के प्रचंड पाशुपतास्त्र की कथा और जिस महादेव की विशाल वर्षारोहण की कथा गत दिवस व्रत के व्रतांत में सुनी थी, क्या वे महादेव वास्तव में ये ही हें?
इस प्रशन को सुनकर पिता बोले …” पुत्र इस कलिकाल मैं महादेव (SHIVA) के साक्षात् दर्शन नही’ होते । यह तो केवल देवता की मूर्ति (Statue of god) है, साक्षात् देवता नहीं।
बालक इस उतर से संतुष्ट नही हो सका, और वह मन्दिर (temple) से निराश होकर घर लोट आया और भोजन किया और सो गया प्रात काल पिता मन्दिर से लोटे और बालक के व्रत भंग की बात सुनकर क्रोध से बोले- तुमने बहुत बुरा काम किया पुत्र ने उतर में कहा पिताजी जब ग्रन्थ – कथित महादेव मन्दिर में थे ही नही तो में एक कल्पित बात के लिय व्रतोपवास का कष्ट क्यूँ सहन करता ?
ऋषि दयानन्द (Rishi Dayanand) के जीवन की ये पहली उलेखनीय घटना हे

ऋषि दयानन्द और सच्चे महादेव की खोज

dayanand saraswatiसंसार में दो ही प्रसिद्ध स्थान हें जहाँ योगीज़न निवास करते हैं। एक-नर्मदा का तट, और दूसरा-उत्तराखण्ड महाराज न इन दोनों स्थानों को खोज डाला। नर्मदा नदी के तट पर की कुटियों में रहने वालों को देखा उतराखणड की कौनसी गुफा हैं, जिसमे’ महाराज नहीं पहुँचे ? कौनसा मठ हे , जहाँ जाकर योगियों का अनुसंधान उन्होंने नहीं किया? और अन्त में जिस प्रियतम की खोज में वे घर से निकले थे, जिस महादेव को पाने के लिए उन्होंने माता-पिता के प्यार को छोडा था, उसे योग-विद्या दवारा पा ही लिया। अब क्या बाकी रह गया था, जिसके लिए वे जीवित रहते?
ऋषि (Rishi Dayanand) कहते हैं-” ‘एक बार मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि इसी हिंमराशि में पड़े पड़े ही अपने प्राणा का अन्त कर दू। किन्तु थोडी ही देर मैं ज्ञान-लालसा इतनी प्रबल हो उठी कि मैने वह विचार छोड़ दिया’
तब ऋषि दयानन्द विशेष ज्ञान-विर्धी के लिए मथुरा पहुँचे। और स्वामी बिरजानन्द जी के पास तीन बर्ष रहकर ज्ञान के कोष  में अधिक वृद्धि की।
जब विदा होने का समय आया. और गुरु दक्षिणा की बात चली  तो गुरु ने कहा…”सौम्य” मैं तुम से किसी प्रकार के धन की दक्षिणा नहीं चाहता। तुम प्रतिज्ञा करो कि जितने दिन रहोगे, उतने दिन आर्यावर्त में आर्ष-ग्रंथो की महिमा स्थापित करोगे, अनार्ष-ग्रन्धों का खंडन करोगे. और भारत में वैदिक धर्म की स्थापना के निमित्त अपने प्राण तक अर्पण कर दोगे
और फिर ऋषि दयानन्द ने कहा की श्री महाराज देखेंगे की उनका प्रिय शिष्य उनके आदेश का किस प्रकार पालन करता हे
ऋषि को इतनी छोटी आयु में वैराग्य उत्पन हुआ और सच्चे शिव की खोज में निकलना एक सच्चे योगी के जीवन का चमत्कार ही हे इसी लग्न में ऋषि दयानन्द ने घने जंगलों भीषण पर्वत शिखाओं में अनेक योगियों से योग्विधा सिख कर संसार को जीने का सच्चा मार्ग दिखाया

योगश्चितवृत्तिनिरोधः चित की वर्तियों को सब बुराइयों से हटा के, सुभ गुणों में स्थिर करके, परमेश्वर के समीप में मोक्ष को प्राप्त करने को योग कहते हें, और वियोग उसको कहते हें की परमेश्वर और उसकी आज्ञा से विरुद्ध बुराइयों में फँस के उससे दूर हो जाना

save mother cows समस्त जीवों की हत्या बंद हो

ओउम नमो नम: सर्वशक्तिमते जगदीश्वराय:
gau mataवे धर्मात्मा विद्वान लोग धनी हें, जो ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव, अभिप्राय, सृष्टि-कर्म, प्रत्याक्षादि प्रमाण और आप्तों के आचार से अविरुद्ध चलके सब संसार को सुख पहुंचाते है और शोक है उन पर जो की इनसे विरुद्ध स्वार्थी दयाहीन होकर जगत में हानि करने के लिए वर्तमान है। पूजनीय जन वे है जो अपनी हानि होती हो तो भी सबका हित करने में अपना तन, मन, धन लगाते है, और तिरस्करणीय वे है जो अपने ही लाभ में संतुष्ट रहकर सबके सुखों का नाश करते है। save mother cows
सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर ने इस सृष्टि में जो-जो पदार्थ बनाये है, वे निष्प्रयोजन नहीं, किन्तु एक-एक वस्तु अनेक-अनेक प्रयोजन के लिए रची है I इसलिये उन से वे ही प्रयोजन लेना न्याय अन्यथा अन्याय है । देखिये जिस लिये यह नेत्र बनाया है, इससे वही काम लेना सब को उचित होता है, न कि उससे पूर्ण प्रयोजन न लेकर बीच ही में वह नष्ट कर दिया जावे I क्या जिन-जिन प्रयोजनों के लिए परमात्मा ने जो-जो पदार्थ बनाये है, उन-उन से वे-वे प्रयोजन न लेकर उनको प्रथम ही नष्ट कर देना सत्पुरुषों के विचार में बुरा कर्म नहीं है ? पक्षपात छोड़ कर देखिये, गाय आदि पशु और कृषि आदि कर्मों से सब संसार को असंख्य सुख होते हैं वा नहीं ?
इसीलिये यजुर्वेद के प्रथम ही मन्त्र में परामात्मा की आज्ञा है ” अघन्या: यजमानस्य पशून् पाहि’ हे पुरुष ! तू इन पशुओं को कभी मत मार, और यजमान अर्थात् सब के सुख देनेवाले जनों के सम्बन्धी पशुओं की रक्षा कर, जिनसे तेरी भी पूरी रक्षा होवे । और इसीलिये ब्रह्मा से लेके आज़ पर्यन्त आर्य लोग पशुओं की हिंसा मैं पाप ओर अधर्म समझते थे , ओर अब भी समझते हैं । और इन की रक्षा से अन्न भी महंगा नहीं होता, क्योंकि दुध आदि के अधिक होने से दरिद्रो को भी खान पान में मिलने पर बहुत ही कम अन्न खाया जाता है, ओर अन्न के कम खाने से मल भी कम होता है । मल के कम होने से दुर्गन्ध भी कम होता है, दुर्गन्ध के कम होने से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि भी विशेष होती है, उससे रोगों की न्यूनता होने से सबको सुख बढ़ता है।
इसलिए यह कहना भी उचित होगा कि गो (save mother cows) आदि पशुओं के नाश होने से राजा ओर प्रजा का भी नाश हो जाता है, क्योंकि जब पशु न्यून होते है, तब दूध आदि पदार्थ और खेती आदि कार्यों की भी घटती होती है । देखो, इसी से जितने मूल्य से जितना दूध और घी आदि पदार्थ तथा बैल आदि पशु 700 सातसौ वर्ष के पूर्व मिलते थे, उतना दूध (milk) घी और बैल आदि पशु इस समय दशगुणे मूल्य से भी नहीं मिल सकते। क्योंकि ७०० सातसौ वर्ष के पीछे इस देश में गवादि पशुओं को मारनेवाले मांसाहारी विदेशो मनुष्य बहुत आ बसे है l वे उन परोपकारी पशुओं के हाड़-मांस तक भी नहीं छोड़ते, तो ‘नष्टे मूले नैव फलं न पुष्पम्’ जब कारण का नाश कर दे तो कार्य नष्ट क्यों न हो जावे। अरे दुष्टों! क्या तुम लोग जब कुछ काल के पश्चात् पशु न मिलेंगे, तब मनुष्यों का मांस भी छोडोगें वा नहीं ? हे परमेश्वर ! तू क्यों न इन पशुओं पर, जो कि बिना अपराध मारे जाते हैं, दया नहीं करता ? क्या उन पर तेरी प्रीति नहीं है ? क्या इनके लिये तेरी न्याय-सभा बंद हो गईहै ? क्यों उनकी पीडा छुडाने पर ध्यान नहीं देता, और उनकी पुकार नही सुनता ? क्यों इन मांसाहारियों के आत्माओं में दया प्रकाश कर निष्ठुरता, कठोरता, स्वार्थपन ओर मूर्खता आदि दोषों को दूर नहीं करता जिससे ये इन बुरे कामों से बचें?
हिंसक-रक्षक संवाद :-
हिंसक- ईश्वर ने सब पशु आदि सृष्टि मनुष्य के लिये रची है, और मनुष्य अपनी भक्ति के लिये । इसलिये मांस खाने में दोष नहीं हो सकता I
रक्षक – भाई ! सुनो, तुम्हारे शरीर को जिस ईश्वर ने बनाया है, क्या उसी ने पशु आदि के शरीर नहीं बनाये है ? जो तुम कहो कि पशु आदि हमारे खाने को बनाये हैं, तो हम कह सकते है कि हिंसक पशुओं के लिये तुमको उसने रचा है, क्योंकि
जैसे तुम्हारा चित्त उनके मांस पर चलता है, वैसे ही सिंह, गृघ्र आदि का चित् भी तुम्हारे मांस, खाने पर चलता है, तो उन के लिये तुम क्यों नहीं ?
हिंसक – देखो, ईश्वर ने पुरुषों के दांत कैसे पैने मांसाहारी पशुओं के समान बनाये हैं । इससे हम जानते हैं कि मनुष्यों को माँस खाना उचित है।
रक्षक – जिन व्यघ्रादि पशुओं के दांत के दृष्टान्त से अपना पक्ष सिद्ध करना चाहते हो, क्या तुम भी उनके तुल्य ही हो ? देखो, तुम्हारी मनुष्य जाति उनकी पशु-जाति, तुम्हारे दौ पग और उनके चार,  तुम विद्या पढ़ कर सत्यासत्य का विवेक कर सकते हो वे नहीं । और यह तुम्हारा दृष्टान्त भी युक्त नहीं, क्योंकि जो दांत का दृष्टान्त
लेते हो तो बन्दर के दांतों का दृष्टान्त क्यों नहीं लेते ? देखों बंदरों के दांत सिंह, मौर व बिल्ली आदि के समान है ओर वे मांस नहीं खाते । मनुष्य और बंदर की आकृति के भी है । इसलिये परमेश्वर ने मनुष्यों को दृष्टान्त से उपदेश किया है कि जैसे बंदर मांस कभी नहीं खाते और फलादि खाकर निर्वाह करते है, वैसे तुम भी किया करो I जैसा बंदरों का दृष्टान्त सांगोपांग मनुष्यों के साथ घटता है, वैसा अन्य किसी का नहीं । इसलिये मनुष्यों को उचित है कि मांस सर्वथा छोड़ देवें।
हिंसक – तुम लोग शाकाहारी-शाकाहारी कहते हो क्या वृक्षादि में जीवन नहीं ?
रक्षक – बिलकुल जीवन है। परन्तु जैसा तुम मानते हो वैसा नहीं। वृक्षादि सुषुप्त अवस्था में रहते है अत: उनमें सुख-दुःख की अनुभूति नाम-मात्र ही है। वेदों में उनका भी आवश्यकता अनुसार उचित मात्रा में उपयोग करने की आज्ञा है। देखो ! जब हम पशु आदि को मरते है तो वे कितना रोदन आदि विलाप करते है जबकि वृक्षादि में वैसा नहीं।

Haridwar हरिद्वार के कुम्भ में धर्मप्रचार

27 फरवरी 1879 से 11 अप्रैल 1879 तक

kumbh melaऋषि दयानन्द रूडकी से ज्वालापुर आए जहॉ मुख्यत: हरिद्वार (Haridwar) के पण्डे रहते हैं। यहॉ सात दिन तक ठहरे और 27 फरवरी 1879 को हरिद्वार (Haridwar) आकर श्रवणनाथ के बाग तथा निर्मले साधुओं (Sadhus) की छावनी के निकट मूला मिस्त्री के खेत में डेरा डाला। जो आर्य लोग हरिद्वार आए थे, वे भी स्वामीजी के समीप आ गए। आते ही समस्त मार्गों, घाटों, पुलों तथा मन्दिरों पर एक विज्ञापन (advertisement) लगवा दिया जिसमें स्वामीजी ने अपने आने की सूचना तो दी ही, अपने मन्तव्य भी लिख दिए तथा लोगों को धर्मंचर्चा हेतु आमत्रित किया।
इस विज्ञापन का अंतिम भाग 
इसलिए आर्यों के इस महासमुदाय में वेद-मन्त्रों द्वारा सब सज्जन मनुष्यों के हित के लिए ईंश्वराज्ञा का प्रकाश संक्षेप से किया जाता हैं। फिर इसके नीचे ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 71 मन्त्र 5, 6 व ।0 को लिखकर उनकी व्याख्या की और ऐतरेय, तैत्तिरीय, आरण्यक (उपनिषद) का एक-एक वाक्य लिखकर उनके अर्थ भी लिख दिए और समाप्ति में यह प्रार्थना की -की                                                                                                                                                                  “यह बड़े आश्चर्य की बात है कि पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र, वर्षा और ऋतु मास, पक्ष, दिन, रात्रि, प्रहर, मुहूर्त, घडी, पल, क्षण, आँख, नाक आदि शरीर, औषध, वनस्पति, खाना-पीना आदि व्यवहार ज्यों के त्यों हैं (अर्थात् जैसै ब्रहा कै समय से लेकर जेमिनी मुनि के समय तक इस देश में थे ) फिर हम आर्यों की दशा क्यों पलट गई है आप अत्यन्त विचारपूवंक देखो कि जिसका फल दुःख वह धर्म और जिसका फल सुख वह अधर्म कभी हो सकता है? अपनी दशा अन्यथा होने का यही कारण है जो ऊपर लिख आए  हैं अर्थात वेद-विरुद्ध चलना या फिर उस प्राचीन अवस्था की प्राप्ति (रीति) वेदानुकूल आचार पर चलना है, और वह आचार यह (aryavart) आर्यावर्त-निवासी आर्य, आर्यसमाजों के सभासद करना और कराना चाहते हैं कि संस्कृत-विद्या के जाननेवाले स्वदेशीय मनुष्यों की वृद्धि के अभिलाषी परोपकारक निष्कपट होकर सब को सत्यविद्या देने की इच्छा-युवत धार्मिक विद्वानों की उपदेशक-मण्डली और वेदादि स्त्शाश्त्रों को पढने के लिए नियत किया चाहते हैं इसमें जिस किसी की योग्यता हो वो इस परोपकारी मोहतम कार्य में परवर्त हो “जिससे मनुष्य मात्र की शीघ्र उन्ती हो सकती हे ” आदि ।
इस अन्तिम अपील में स्वामीजी ने प्रकट किया कि वे दो विषयों को सुधार का मुख्य कारण समझते हैँ…प्रथम, उपदेशक-मण्डली ऐसै मनुष्यों की हो जो संस्कृतवेत्ता, स्वदेशीय मनुष्यउन्ती के अभिलाशी, परोपकारी, निष्कपट, सबको सत्य विद्या देने की इच्छावाले, धार्मिक विद्वान् हों और दूसरा, वेदादि  सत्यशाश्त्रों के पढने के लिए पाठशाला स्थापित होनी चाहिए ।
इस बार कुम्भ (Kumbh) में बडी भीड़ थी। स्वामीजी ने अपने 12 अप्रैल के पत्र में लिखा कि अब तक दो लाख आदमी मेले में आ चुके हैं। अभी पर्व समाप्त
होने में 15 दिन बाकी हैं। पर्व के मुख्य दिन तो बहुत बडी संख्या में लोग आए। 1924 वि० के कुंम्भ से दुगुनी भीड़ थी। गंगा के किनारे आठ-दस कोस तक यात्री ही यात्री नजर आते थे। स्वामीजी ने  इस पौराणिक दल में अपनी ध्वजा फहराकर वैदिक धर्मं का डंका बजाया’ मूर्तिपूजादि पौराणिक सिद्धान्तो का प्रत्यक्ष खण्डन किया। अनेक ब्राह्मण, संयासी, बैरागी और निर्मंले साधु विचार के लिए आते और स्वामीजी के स्पष्ट खण्डन से रुष्ट होकर चले जाते। कईं तो यहॉ तक कह जाते कि इच्छा तो होती है तुम्हें मार डालूँ क्योकि तुमने हमारी जीविका छीन ली है। परन्तु उनका बस नहीं चलता। काशी के स्वामी विशुद्धानन्द भी आए थे। एक अन्य सतुआ स्वामी भी आए थे जो अच्छे विद्वान् माने जाते थे और कनखल में ठहरे थे। सुखदेव गिरि और जीवन गिरि नामक दो साधु भी पपिडत गिने जाते थे । स्वामीजी ने विचार-विमर्श के लिए सबको पत्र भेजे, परन्तु कोई सामने नहीं आया।

ब्रहाचारी मुलशंकर

dayanand saraswatiBrahmachari Mulshankar (ऋषि दयानन्द) घर से निकलकर आठ मील की दूरी के एक ग्राम में उन्होंने वह रात्री काटी और एक पहर रात रहने पर वहां से चलकर उसी दिन एक गॉव के हनुमान मंदिर (Hanuman Temple) में रात्रि व्यतीत की। यह मार्ग उन्होंने निश्चित राजमार्ग (Hi way) पर चलकर तय नहीं किया, अपितु पगडंडियों और टेढे- मेढ़े रास्तों से होकर चले ताकि रास्ते में आता-जाता कोई पहचान न ले । यह सावधानी आवश्यक थी, क्योंकि गृहत्याग के तीसरे दिन उन्होंने एक राजकर्मचारी (government employee) से सुना किं मूलशंकर (Mulshankar) नामक एक युवक को सिपाही तलाश कर रहे हैं। यहाँ से जब वे आगे चले तो उन्हें साधुओं के वेश में कुछ ठग मिले जिन्होने उनके शरीर पर धारण किये आभूषण (Jewelery), अँगूठी तथा कुछ अन्य द्रव्य यह कहकर ले लिए कि जब तक वे इनका त्याग नहीं करेंगे, उन्हें पूर्ण वैराग्य कैसे मिलेगा। इन ठगों के पास कोई देव मूर्ति थी जिसके आगे उन्होंने वें वस्तुएँ ‘भेट-रूप में रखवा लीं।
यहाँ से चलकर मूंलशंकर सायला नामक ग्राम में पहुचे जहाँ उन दिनों लाला भक्त नामक एक वैष्णव साधु रहते थे जो योगी लाला भक्त के नाम से विख्यात थे । यहाँ आने पर मूलशंकर ने एक अन्य ब्रह्मचारी से नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली । अब उनका नाम ब्रह्मचारी (Brahmachari) शुद्ध चेतन्य हो गया उन्हें पात्र रूप में एक कमंडल दिया गया और वें योग साधना में तत्पर हुए । एक रात्री जब वें एक वृक्ष के निचे योगाभ्याश पूर्वक ध्यान (meditation) में बेठे थे, उन्हें पेड़ पर बेठे पक्षियों का रव सुनाई पड़ा ।वे भयभीत हो गए। भूत-प्रेतादि संस्कारों से अभी उन्हें मुक्ति नहीं मिली थी , अत: एकान्त त्यागकर साधुओं की मण्डली में आगए।
यहाँ से चलकर ब्रह्मचारी शुद्ध चैतन्य कोट काँगड़ा नामक स्थान पर आए। यह स्थान अहमदाबाद के निकट हे। यहाँ पर उन्होंने बहुत से वेरागियों को देखा। किसी राज्य की एक रानी भी उनके फ़न्दे में फेंसी उनके समीप ही थी। उन वैरागिओं ने अकारण ही शुद्ध चैतन्य का उपहास किया और उन्हे’ अपनी मण्डली में प्रवेश करने के लिए कहा। इस पर शुद्ध चैतन्य ने घर से पहने रेशमी वस्त्रों को त्याग दिया और सादे वस्त्र पहन लिए। यहाँ पर वे तीन मास तक रहे। यहाँ पर रहते हुए ही उन्हें ज्ञात हुआ कि सरस्वती नदी के तट पर बसे सिद्धपुर में कार्तिक मास में प्रतिवर्ष मेला लगता है जहाँ हजारो’ साधु, महात्मा तथा योगी जन आते हैं। यह सोचकर कि वहाँ कोई उच्च कोटि का योगी अवश्य मिलेगा, शुद्ध चैत्तन्य सिद्धपुर की ओर चल पडे। रास्ते में उन्हे’ एक साधु मिला जो उनके परिवार का परिचित था। इनसे भेंट कर एक बार तो ब्रह्मचारी शुद्ध चैतन्य को रोना आ गया। अभी वैराग्य मैं द्रडता भी नहीं आई थी । उन्होंने इस ‘परिचित वैरागी से अपना हाल कहा। पहले तो उसने मूलशंकर को घर छोड़ने के लिए बुरा… भला कहा, किन्तु शुद्ध चैतन्य को अपने संकल्प से विचलित नहीं कर सका।
 अन्तत: ब्रह्मचारी शुद्ध चैतन्य सिद्धपुर आए और नीलकंठ महादेव के मंदिर में डेरा किया जहाँ पहले से ही अनेक साधुगण ठहरे थे। मेले मेँ जिस किसी विद्वान् योगी की चर्चा सुनते, वे, उसके निकट अवश्य जाते और सत्संग का लाभ उठाते। सिद्धपुर आते हुए मार्ग में जो वैरागी मिला था, उसने मूलशंकर का सारा हाल उनकै पिता को लिख भेजा और उनके वर्तमान में सिद्धपुर में होने की सूचना भी दे दी। यह समाचार पाते ही मूलशंकर के पिता चार सिपाहियों को साथ लेकर वहाँ आ गए और नीलकंठ के मंदिर में उन्हें जा पकड़ा। जब उन्होंने पुत्र को साधू वेश में ‘देखा तो क्रोध में आकर अनेक कठोर वाक्य कहकर उनकी भर्त्सना की। यहाँ तक कहा कि तुमने हमारे परिवार पर कलंक लगाया है। तेरी माता तेरे वियोग में मरणोन्मुख है। पिता के इस क्रोध ने उन्हें भयभीत कर दिया। डर के मारे वे पिता के चरणों में गिर पड़े और कह दिया कि लोगों के बहकाने में आकर वे घर से निकल पड़े हैं। आप क्रोध न करें। मुझे क्षमा कर दें। यह भी कह दिया कि मैं आप के साथ घर लौटने के लिए तैयार हूँ। इन बातों से भी पिता का क्रोध शान्त नहीं हुआ और उन्होंने आवेश में आकर पुत्र के साधुओं वाले वस्त्र फाड़ डाले। उनका तूम्बा भी तीड़ दिया और कहा कि तू मातृहन्ता है। उन्होंने पुत्र को नवीन वस्त्र दिए तथा अपने डेरे पर ले आए। मूलशंकर के घर लौट चलने के कथन का भी उन्हें विश्वास नहीं हुआ रात्रि को भी मूलशंकर पहरे में रहे। वे यद्यपि प्रकट रूप में तो पिता से कह चुके थे कि घर लौटने में उन्हे’ आपत्ति नहीं है, किंन्तु अपने मन में वे दृढ़ थे और अपने निर्धारित वैराग्य-पथ पर ही बढ़नै की प्रबल भावना लिए थे। दैववश रात के तीसरे पहर में प्रहरियों को भी नींद आ गईं और शुद्ध चैतन्य ने यह अवसर भाग निकलने के लिए उपयुक्त माना।
वै चटपट वहाँ से चल पड़े और एक वृक्ष के सहारे निकट के एक मंदिर की छत पर जा बैठे। उनके हाथ में एक जल-पात्र अवश्य था। यदि कोई पूछता तो यह कहने का बहाना था कि शौच के लिए निकले हैं। जब वे उस एकान्त में चुपचाप छिपे बैठे थे, उन्होंने देखा कि वही पहरे वाले  सिपाही उनकी तलाश में उधर आए और आसपास के लोगों से पता कर रहे हैं। इस प्रकार शुद्ध चैतन्य को वह सारा दिन मंदिर की छत पर बैठे ही व्यतीत करना पड़।। जब दिन छिप गया तो वे उतरे और मुख्य मार्ग को छोड़कर दो कोस दूर एक गॉव तक आ गए। सवेरा होने पर फिर वहाँ से चल पड़े। अपने पिता से उनकी यही अन्तिम भेंट थी। अब वे अहमदाबाद होते हुए वडोदरा पहुँचे। यहाँ उन्हें जिन संन्यासियों का सानिध्य मिला, वे शंकर मत को माननेवाले वेदान्ती थे। उनर्क सम्पर्क में आकर शुद्ध चैतन्य ने भी नवीन वेदान्त को स्वीकार किया। यहाँ पता चला कि नर्मदा के तटवर्ती क्षेत्र में साधुओं की एक बृहत् गोष्ठी होने बाली है। उसमें भाग लेने के लिए चले। यहाँ उन्हें नाना शास्वी के ज्ञाता स्वामी सच्चिदानंद नामक एक सन्यासी मिले जिनसे उनका विस्तृत वार्तालाप हुआ। अन्तत: वे अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचे और स्वामी परमानन्द परमहंस के निकट ‘वेदान्त-सार’ तथा ‘वेदान्त परिभाषा’ आदि शाङ्कर मत र्क ग्रन्धों का अध्ययन करने लगे।

swami dayanand saraswati, जी के प्रति महान लोगों के विचार

1:- swami dayanand saraswati महर्षि दयानन्द जी के उपदेशों ने करोड़ों लोगों को नवजीवन, नवचेतना और नया दृष्टीकोण प्रदान किया हे,

Dr. Rajendra Prasad ( डा राजेन्द्र प्रसाद ( प्रथम राष्ट्रपति)


2:- महर्षि दयानन्द जी स्वाधीनता संग्राम के सर्वप्रथम योद्धा और जाती के रक्षक थे, उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज ने राष्ट्र की महान सेवा की हे और कर रहा हे,

Vir Savarkar (वीर सावरकर)


3:- सन्गठन कार्य, द्रिड़ता , उत्साह और स्मन्व्यात्म्कता की दृष्टी से आर्य समाज की समता कोई नही कर सकता

Netaji Subhas Chandra Bose (नेता जी सुभाषचन्द्र बोस)


4:- स्वामी दयानन्द जी मेरे गुरु हें, मेने संसार में केवल उन्ही को गुरु माना हे, वे मेरे धर्म के पिता हें, और आर्य समाज मेरी धर्म की माता हे,

Punjab Kesari Lala Lajpat Rai (पंजाब केसरी लाला लाजपतराय)


5:- स्वामी दयानन्द एसे प्रकाश के स्तम्भ हें, जिन्होंने असंख्य मनुष्यों को सत्ये का मार्ग दिखलाया हे, में अपने को उनका अनुयाई कहलाने में गर्व अनुभव करता हूँ,

DEVTA SVRUP BHAI PRMANAND (देवता स्वरूप भाई परमानन्द (एम.ए)


6:- में ऋषि दयानन्द जी को अपना राजनितिक गुरु मानता हूँ, मेरी दृष्टी में तो वें महान विप्लववादी नेता और राष्ट्र विधायक थे,

Vitthalbhai Patel (विठ्ठल भाई पटेल)


7:- गाँधी जी राष्ट्र के पिता थे तो महर्षि दयानन्द सरस्वती राष्ट्र के पितामह हें,

अनन्तरशयनम अय्यंगर


8:- दयानन्द! Yoga (योग) विधा शिक्षा के लिए ही तुमने पितृग्रेह को छोड़ा हे, यह तो वेराग्ये का परिचय हे, लेकिन केवल केवल वेराग्ये से ही योग विद्या का लाभ नही होता हे, इसके लिए अभ्याश भी चाहिए, अभ्याश और वेराग्ये के जरिये ही, योग अर्थात चितव्रती का निरोध होता हे,

Swami Shivananda Giri (स्वामी शिवानन्द गिरी, दयानन्द जी के राजयोग के गुरु)


9:- योगेश्वर महर्षि दयानन्द जी अत्यन्त विरक्त थे, तथा उच्कोटी के योगाभ्यासी भी थे, राजयोग पर उनका पूर्ण विश्वाश था,

आचार्य भद्र्काम वर्णी

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