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ध्यान में आगे बढ़ने के लिय महत्वपूर्ण टिप्स

FAITH/ श्रद्धा
 
श्रद्धा किंसे कहते हैं। श्रद्धा (श्रत+धा) सच्चाई के धारण करने का नाम है। सच्चाई का ज्ञान तर्क से हुआ करता है ओर ज्ञान होने पर उसे हृदय में धारण कर लेना, श्रद्धा कहलाता है। ह्रदय में धारण कर लेने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य उसके विपरीत आचरण न कर सके श्रद्धा रखते हुए सबसे पहले यमों के हृदय में धारण करंने का,
अभ्यास करना चाहिये अभ्यास किस प्रकार हो ? यमों में से एक अहिंसा को लेकर, वह प्रकार बतलाया जाता है…
 
  1. सबसे पहलें अहिंसा के ग्रहण ओर धारण करने की प्रबल इच्छा मनुष्य के ह्रदय में होनी चाहिये।                                                                                                                 
  2. उसे ऐसे ‘ग्रन्थ’ का अधयन करते रहना चाहिय जिसमें अहिंसा की श्रेष्ठता बतलाते हुए, हिंसा के दोष दिखलाये गये हों।                                                                                                                                                                                             
  3. अभ्यासी जंहा रहता हो वंहा मोटे अक्षरों में “में आज हिंसा नही करूंगा” एसा या और दुसरे अक्सर लिख कर अपने कमरे में चारों तरफ टांग देने चाहिय। जिससे बिना इच्छा के अनायास, अभ्यासी की दृष्टि, उस पर पडती रहे।                                                                                                                                                                               
  4. प्रात: काल उठते ही, बिस्तर छोड़ने से पहले, उसे अहिंसा पालन रूप व्रत को धारण करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिये कि उसका प्रयत्न सफल हो। उसे उच्च स्वर से तीन वार यह उच्चारण करना चाहिये कि “मैंने ‘अहिंसा पालने का व्रत लिया है, मैं कदापि कोई ॰कार्य इस व्रत के विपरीत न करू’गा ।” ओर समयों में भी इस व्रत का स्मरण करते रहने चाहिये।                                                                                                                                               
  5. रात्रि में सोते समय फिर उपयुक्त वाक्य को उसके एक-एक शब्दको, भली प्रकार ध्यान में रखते हुए, उच्च स्वर से, उच्चारण करके, ईश्वर से उसकी पूर्ति की प्रार्थना करते हुए, सो जाना चाहिये, इस प्रकार किं सोते समय के अन्तिम विचार, यही हों।
 
कम से कम एक मास तक इस क्रिया को इसी प्रकार का’म में लाना चाहिये। इसके बाद अहिंसा के साथ सत्य को शामिल करके पूरे दूसरे मास में अहिंसा ओर सत्य दोनों के, सम्मिलित व्रत के ग्रहण करने की चेष्टा करंनी चाहिए। जो अहिंसापरक वाक्य कमरे में चारों ओर लगाये गये थे अब उसके स्थान मे यमपरक पूरे सूत्र को जिसमें पांचों यमों का वर्णन है’ लगा लेना चाहिये । इस बात का पूरा-पूरां ध्यान रखना चाहिये कि कोई काम व्रत के विपरीत न हो । यदि कभी भूल से विपरित कार्य हो जाय तो उसका उसी दिन प्रायश्चित कर देना चाहिये। दो मास बीतने पऱ अब पांचों यमों को अपने व्रत में सम्मिलित करके उन सब का उपर्युक्त भांति अभ्यास करे यह (सम्पूर्ण) तीसरे मास तक जारी रखना चाहिये यह यमों का प्राररिभक अभ्यास है।
 

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महर्षि दयानन्द नें “गायत्री- मन्त्र को ‘महामन्त्र’ का नाम’ दिया है।

Gayatri mantra
 
गायत्री वेदों का सार-
वेदों के लगभग बीस हजार मन्त्रों में शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति का ही व्याख्यान है। परन्तु यह एक अकाट्य सत्य है कि जहाँ वेदों के सारे ही मन्त्र कोई-न’-कोई विशेषता रखते हैं, वहाँ वेदों का गायत्री-मन्त्र विशेष विशेषता से भी बढ़ गया है, क्योंकि इसके अन्दर ज्ञान, कर्म, उपासना तीनों ही तथ्य विघमान हैं।
 
इसीलिए महर्षि दयानन्द नें “गायत्री- मन्त्र को ‘महामन्त्र’ का नाम’ दिया है। महा योगी योगेश्वर शिव ने गायत्री का नाम ‘कामधेनु’ रखा है, ओर समस्त यौगिक साधनों का मूलाधार भी गायत्री ही को बतलाया है। यही नहीं, शिवजी महाराज ने “गायत्री-मंजरी’ में यह भी आदेश दिया है। कि ‘कलियुग में गायत्री मन्त्र के द्वारा ही सर्वश्रेष्ठ सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। श्रंगी ऋषि ने गायत्री को “मोक्ष का मूल कारण’ काहा है।
 

वेदों के लगभग बीस हजार मन्त्रों में शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति का ही व्याख्यान है। इसके अन्दर ज्ञान, कर्म, उपासना तीनों ही तथ्य विघमान हैं। इसीलिए महर्षि दयानन्द नें “गायत्री- मन्त्र को ‘महामन्त्र’ का नाम’ दिया है।

व्यास मुनि “गायत्री तथा ब्रहा’ में कोई भिन्नता नहीं समझते भगवान् मनु ने गायत्री को ब्रहा का मुख (द्वार) लिखा है । प्रजापति ने गायत्री के पहले ही पाद से तीनों लोकों का वैभव प्राप्त कर लेने की घोषणा की है । श्री शंकराचार्य जी ने गायत्री को जगत् की माता कहा है। विदेह जनक महाराज ने बुडिल को बतलाया कि गायत्रीविद बहुत-सा पाप भी यदि करता रहा हो तो वह उस पाप को जलाकर शुद्ध-पवित्र हो जाता है। 
 
भीष्म पितामह ने ‘महाभारत’ के अनुशासन’- पर्व में कहा है…”जहाँ गायत्री-जप होता है, वहाँ बालक मरते नहीं; वहाँ अग्नि हानि नहीं पहुँचाती ; वहाँ गौएँ दूध अधिक देती हैं। गायत्री सर्वभूतों का ह्रदय है। यह सर्वश्रेष्ट श्रुति है। चन्द्रवंशीय सूर्यवंशीय तथा कुरुवंशीय, सब-के-सब, प्राणियों की गति परम पवित्र इसी’सावित्री (गायत्री) का ही पाठ करते हैं ।’ इसी गायत्री-मन्त्र का जप नित्य-प्रति योगिराज श्री कृष्णा शुद्ध-पवित्र होकर मौन रहकर किया करते थे । देवी-भागवत में गायत्री-जप को ही सनातन बतलाया है । और स्वयं परमात्मा ने अथर्ववेद में यह आदेश किया है कि गायत्री “वेदमाता है वरों को देने वाली है आयु, स्वास्थ्य, सन्तान, धन, अन्न, पशु, वैभव, यश देनेवाली है और परमात्मा के दर्शन करानेवाली है।
 
यही कारण है कि इसे गुरुमन्त्र कहकर शेष सारे मन्त्रों से विशेषता दे दी गई है। चाहते हैं सुख, मिलता है दु:ख ! आज की दुनिया हो या पहले युगों की दुनिया, हर काल हर स्थान और हर समय का मानव चाहता है कि उसको इस जीवन में कोई दुःख न हो, और यदि दुसरा ज़न्म मिलनेवाला है, तो उसमें भी वह सुखी ही रहे। सारी दुनिया सुख और शान्ति की खोज में दुखित ओर अशान्त हो रही है परन्तु सुख-प्राप्ति के जितने अधिक यत्न होते हैं, दुनिया उतनी अधिक” दुखी होती चली जा रही है। 
 
जब पूरे यत्न, पूरी बुद्धिमता से किसी`रोगी का इलाज़ हो रहा हो, ओर वह रोग कम होने की अपेक्षा बढता चला जा रहा हो, तो यही कहना पडेगा कि इलाज ठीक नहीं हो रहा है। जब यह प्रत्यक्ष है कि आधूनिक काल की रोगी दुनिया को नाना योजनाओं, नाना सम्मेलनों, नाना प्रयत्नों द्वारा भी नीरोग नहीं बनाया जा सका तो सर्वसाधारण यही कहेंगे कि ये सारे यत्न सर्वथा उलटे परिणाम उत्पन्न करनेवाले हैं।
 
ऐसा कहना सर्वथा इतिहास को झुठलाना है कि ‘जितनी भौतिक उन्नति आज दुनिया के लोगों ने की है, पहले इतनी कभी नहीं हुई भारतीय इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि प्राचीन काल में जितने सुंदर अदभुत आविष्कार हो चूके हैं, उनका 1 प्रतिशत भाग भी आज दुनिया को अभी प्राप्त नहीं हुआ; परन्तु प्राचीन काल में जितनी भौतिक उन्नति हुई उसका प्रयोग केवल मानव-शरीर को सुखी बनाने या नाश करने के लिए नहीं हुआ, अपितु आत्मा और ज्ञान के लिए हुआ, इसीलिए प्राचीन काल की भौतिक उन्नति ने उन लोगों को दुखी नहीं किया । पर आज की दुनिया के आविषकारों ने मानव को अधिक दुखी कर दिया है
 
हमारे पूर्वजों को वेद द्वारा यह ज्ञान प्राप्त था कि वह कौन-सा साधन है जिसके द्वारा इस लोक के सारे वैभवों का मनुष्य आनंद ले सकता है ओर साथ ही आत्मा को’ मोक्ष का आनन्द भी प्राप्त करा सकता है । यही नहीं, इसी मानव जीवन में… प्रकृति के सारे रूपों, सारे स्वादों और सारे आविष्कारों से लाभ उठाते हुए भी मन तथा चित्त शान्ति से भरपूर, सन्तोष ओर प्रसन्नता के रंग में रंगा रह सकता है। यह हुनर, यह अदृभुत ज्ञान वैदिक काल के मनुष्यों ही के पास था। आज का मानव इसे अभी तक जान नहीं पाया। यही कारण है कि आज भू-लोक के किसी भी देश या प्रदेश में वास्तविक शान्ति, संतोष ओर प्रसन्नता दिखाई नहीं देती। इसके विपरीत हाहाकार, रुदन, अशान्ति ओर तडप ही देखी जा रही है।

क्या मोक्ष होने के पश्चात पुनर्जन्म में जीव नहीं आता

प्रशन- उपनिषद, वेदान्त, गीता आदि में यह लिखा है कि मोक्ष होने के पश्चात पुनर्जन्म में जीव नहीं ‘आता-
 
उत्तर- ‘न च पुनरावर्त्तते’ इत्यादि वचनों का यह अभिप्राय है कि जब तक मुक्ति की अवधि है अर्थात् 31 नील, 10 खरब, 40 अरब वर्ष तक मध्यकाल में जन्म में नहीं आना पड़ता। जब मुक्ति की अवधि समाप्त हो जाती है तो जन्म-मरण में आना पड़ता है क्योंकि शुद्ध ज्ञान-कर्मोंपासना से मुक्ति मिलती है और वे ज्ञान कर्मोपासना जीव ने सीमित रूप में किये हैँ । 
 
उनका फल भी सीमित होना चाहिए, असीमित नहीं। यदि सीमित ज्ञान…कर्मोंपासना का फल परमात्मा अनन्त दे देवे तो, अन्याय हो जाए।  जो जितना अच्छा या बुरा कर्म करता है, उसको उतना ही सुख व दुख फल देना न्याय कहाता है । जो पशु, पक्षी आदि योनियाँ है, उनमें जो जीव रहते हैं, वे बहुत दुखी हैँ । यदि बिना कर्म के उसको परमात्मा पशु आदि योनियों में भेज देवे तो वह दोषी हो जाए। इसलिए मुक्ति और बन्धन कर्मों के कारण ईश्वर देता है और कर्मों के सिमित होने से उनका फल भी सिमित होना उचित है , न कि सिमित कर्मों का असीमित फल । 
 
अत: मोक्ष के पश्चात जिव पुनह: ज़न्म-मरण में आता है । यदि मोक्ष से जीव पुन: संसार में जन्म न लेवे तो यह भी दोष आता है कि यह संसार समाप्त हो जाये। क्योंकि जो…जो जिव मोक्ष में जाते रहेंगे वो पुनह संसार में न आयेंगे और जीवों की संख्या निषिचत्त है, वे नये उत्पन नही होते, तो यह संसार समाप्त हो जाना चाहिए था अत्त: मोक्ष को प्राप्त होकर पुन: संसार में जीव का जन्म मानना ही ठीक है।