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आर्यों का निवास स्थान

आर्य वस्तुत: यहीं के निवासी थे, या बाहार से आए?


आर्य (aryans) जाति वास्तव में इसी देश में आबाद थी या कहीं बाहर से आकर बसी-यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर पर्याप्त विवाद हुआ है और अब तक हो रहा है। यूरोपीय विद्वानों ने जिस दिन से संस्कृत-विषयक अपना अध्ययन और अनुसंधान आरम्भ किया, उसी दिन से इस प्रश्न पर बहस मनोयोग पूर्वक चर्चा आरम्भ हूई। 

जब संस्कृत – (Sanskrit Language) भाषा की रचना-प्रणाली तथा उसकी बनावट को यूरोपीय भाषाओँ से तुलना की गई तो उनमे’ विचित्र समता पाई गई। इससे विस्मित होकर यूरोपीय संस्कृतज्ञों ने अनेक परिणाम निकाले। इनमें से कुछ को सम्मति थी कि यूरोपवासी, तथा ईरान, अफगानिस्तान और भारत के रहनेवाले सब एक वंश के ही हैं। इनका नाम आर्य था। प्राचीन समय में इनके पूर्वज मध्य एशिया में रहते थे और फिर वे वहाँ से भिन -भिन भागो’ में बँटते चले गए। अत: जो लोग भारत में आए उन्होंने तो अपना मूलं नाम आर्य रखा और शेष लोगो नें अपना नाम बदल दिया। इस विद्वत्मण्डली की यह राय भाषाओँ में पाई जाने वाली उस समानता के कारण बनी, जिसका उल्लेख हम कर चुके हैं। उनका कथन है कि विभक्त होने के पहले इन सब जातियों की भाषा एक ही थी। वह भाषा अधिकांश में संस्कृत से अधिक मिलती थी और उसी से लैटिन, ग्रीक, फारसी तथा जेंद आदि भाषाएँ निकली हैं।

स्वामी दयानन्द जी की इसमें निम्म सम्मति है, जिसे उन्होंनै ‘सत्यार्थप्रकाश’ में लिखा है-

1. प्रश्न : मनुष्यों की आदि-सृष्टि किस स्थल में हुई?
उत्तर : त्रिबिष्टप अर्थात् तिब्बत में।


2. प्रश्न : उत्पत्ति के आदि में एक जाति के मनुष्य थे या अनेक जातियों के?
उत्तर : एक के, पीछे विद्वान् और देवता पुरुषों का नाम आर्य तथा बुरे लोगों का नाम दस्यु अर्थात् डाकू मूर्ख पड़ गया। इस प्रकार आर्य और दस्यु दो नाम हुए। आर्यों में उक्त रीति से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नामक चार वर्ण हुए। द्विज, विद्वानों का नाम आर्य और अनपढ़ों का नाम अनार्य अर्थात् अनाडी-शूद्र हुआ।



3. प्रशन : फिर वे यहाँ कैसे आए?
उत्तर : जब आर्य विद्वानों, देवताओं का दस्यु, असुर व राक्षसों अर्थात् भूखों में सदैव लड़ाईं-झगड़ा होने लगा और विवाद बहुत बढ़ गया तो आर्यजन सारी धरती में से इस भूमि को सबसे श्रेष्ठ समझकर यहीं आ बसे। इसीलिए इस देश का नाम आर्यवर्त पड़ा।


4. प्रश्न : आर्यावर्त की सीमा कहॉ तक है?
उत्तर : उत्तर में हिमालय पर्वत, दक्षिण में विध्याचल, पूर्व और पषिचम में समुद्र, या यह कहें कि पश्चिम मेँ सरस्वती नदी या अटक नद (जो उत्तरीय पर्वतों से निकलकर दक्षिण में अरब सागर में जा गिरता है), पूर्व में दर्षदवती (जो नेपाल देश के पूर्वीय भाग के पहाडों से निकलकर बंगाल की और समुद्र में मिल गई है, जिसको ब्रह्मपुत्र भी कहते हैं), हिमालय की मध्य रेखा से दक्षिण और पर्वतों के बीच और रामेश्वर तक विन्ध्याचल के भीतर जितने देश हैं इन सबको आर्यावर्त इसलिए कहते हैं कि यह देश आर्यावर्त देवता अर्थात् विद्वानों ने बसाया है और आर्य पुरुषों की निवास-भूमि है।


5. प्रश्न : पहले इस देश का नाम क्या था और इसमें कौन रहते थे?
उत्तर : पहले इस देश का नाम कुछ भी नहीं था और न कोई यहॉ रहता था, क्योकि आर्य मनुष्य-उत्पत्ति के आरम्भ में कुछ समय व्यतीत हौ जाने के अनन्तर तिब्बत से सीधे इस देश में आकर बसे।


6. प्रश्न : बहुतों का कथन है कि आर्य लोग ईरान से आए, इसीलिए इन लोगों का नाम आर्य है। इनसे पहले यहाँ जंगली मनुष्य रहते थे, जिनको (आर्य जन) असुर और राक्षस कहते थे। आर्य लोग अपने को देवता बताते थे और इन दोनों में जो युद्ध हुआ, वह देवासुर-संग्राम के नाम से कथाओं में वर्णित है।

उत्तर : यह बात नितान्त मिथ्या है, वयोकि ऋग्वेद मेँ लिखा है, जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है, आर्य धार्मिक, विद्वान्, सत्य वक्ताओं का नाम है और उनसे विपरीत गुणों वाले जो मनुष्य हैं, उनका नाम दस्यु अर्थात् डाकू, कुकर्मी, अधार्मिक और मूर्ख है। इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य द्विजों का नाम आर्य तथा शूद्रों का नाम अनार्य अर्थात् अनाडी है। जब वेद में यह लिखा है तो दूसरी जातियों को कल्पित बातों को बुद्धिमान् लोग कभी नहीं मान सकते। हिमालय पर्वत पर आर्य और दस्यु, मलेछ अर्थात् राक्षसों का जो संग्राम हुआ था, उसमें आर्यावर्त के अर्जुन और महाराज दशरथ प्रभृति सम्राटू देवताओं अर्थात् आर्यों की विजय और असुरों की पराजय के लिए सहायक हुए।

युरोप के कुछ शोधकर्ता कहते हैं कि भाषाओँ की समता इस बात की पूरी साक्षी नहीं हैं कि आर्य लोग असल में भारत के निवासी नहीं थे ओर कभी प्राचीन काल में मध्य एशिया से आकर यहॉ बस गए या किसी अन्य स्थान से आए। निसंदेह यहाँ तक तो सब एकमत हैं कि यूरोप की अनेक भाषाएँ और जैद तथा पहलबी (पुरानी फारसी) संस्कृत से इतनी मिलती हैं जिससे पूर्ण बिश्वास से कहा जा सकता है कि या तो अवशिष्ट समस्त भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं, या संस्कृत और ये समस्त भाषाएँ किसी अन्य प्राचीन भाषा से उत्पन्न हैं जो इन सारी भाषाओँ की माता थी।

भारतीय बिद्वान्, जिनके साथ अनेक यूरोपीय विद्वान् भी सहमत हैं, यह कहते हैं कि ये सब भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं, क्योकि यह बात मान ली गई किं संस्कृत इन सबसे प्राचीन तथा सर्वोपरि उत्तम है। अत: कोई कारण नहीं, जिससे यह न माना जाए कि अन्य सभी भाषाएँ जो एक दूसरे से पर्याप्त समान हैँ इसी संस्कृत की पुत्रियाँ हैं। यथा-नवीन संस्कृत्त, प्राकृत, आधुनिक बंगला, वर्तमान गुजराती, मराठी आदि प्राचीन संस्कृत से बहुत भेद रखती हैं। परन्तु इसमें किसी को संन्देह नहीं कि इन सबकी माता प्राचीन संस्कृत है। 

इसी प्रकार चाहे फारसी, जेंद, पहलवी, लातीनी और यूनानी आदि सब भाषाएँ प्राचीन संस्कृत से भिन्न हैं, परन्तु उनमें इतनी समानता है कि आधुनिक भारतीय भाषाओं की भाँती उनको भी संस्कृत सेनिकली माना जा सकता है। दूसरी ओर कई यूरोपीय विद्वान् यह कहते हैं कि भारत की आधुनिक भाषाओं’ की संस्कृत से जितनी समानता है उतनी ही समानता लातीनी, यूनानी आदि से नहीं, इसलिए यह माना जा सकता है कि इन भाषाओँ की माता एक अन्य भाषा हैजो भिन-भिन देशों में जाने से पहले आर्य वंश में बोली जाती थी। 

निसंदेह भाषाओं के बारे में यह परिणाम तो निकाला जा सकता है कि जिस दशा में यह भाषा अब प्रचलित है, उन वंशों में भी कुछ न कुछ पुराना सम्बन्ध अवश्य रहा होगा। क्या ये सब वंश किसी समय मध्य एशिया में बसते थे और वहाँ से इधर-उधर चले गए, या इन सब वंशों के पूर्व-पुरुष हिमालय के बर्फीले पहाडों के दक्षिण या उत्तर में निवास करते थे और उनकी सन्तान संसार के भिन्न-भिन्न भागों में फैल गई? ये एसे प्रश्न हैं जिनके विषय में अभी तक कोई निश्चयात्मक उत्तर नहीं मिला है। 

हमारी सम्मति में लॉर्ड एलफिस्टन और उनके साथी विद्वान् उचित रीति से विवाद करते हैं और कहते हैँ कि जो प्रमाण इस मत की’ पुष्टि में दिये जाते हैं कि आर्य जाति किसी समय मध्य एशिया में रहती थी और वहाँ से हिन्दू (आर्य) भारत में आए, वह इस परिणाम पर पहुँचने की पूर्ण सीडी नहीं है। यह केवल बिचार-मात्र हैं। जब ऐतिहासिक साक्षी मिलती हैं, उस समय से हिन्दू (आर्य) वंश का निवास भारत में ही सिद्ध होता हैं। इसलिए इस बात को सिद्ध करने का भार उन्हीं लोगों पर है जो कहते हैं कि आर्य कहीं बाहार से आए हैं। ऐसी अवस्था में हिन्दू छात्रों को यह शिक्षा देना कि उनके पूर्वज भारत के असली निवासी नहीं हैं, उनको कुमार्ग पर ले जाना हैं!
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आर्यों का ज्ञान एंव विज्ञान भाग 2


आर्य ही थे विश्व गुरु जानीय अपना गोर्वशाली इतिहाश 

मित्रों जैसा की भाग 1 में आर्यों के ज्ञान विज्ञानं vedic science के 11 प्रमाण दिए जा चुके हैं अब इस भाग 2 में 20 प्रमाण और दिए जा रहे हैं जो ये सिद्ध करेंगे की आर्य ही विश्व गुरु थे, यदि किसी को फिर भी शंका रहे तो मेरे पास हजारों साल पुराने महर्षि भारद्वाज का लिखा विमान शाष्त्र भी है जो मुझे मेरे मित्र राहुल आर्य से प्राप्त हुआ है में इस vedic science book ग्रन्थ से ये सिद्ध कर सकता हूँ की आर्य ऋषि कितने बड़े वैज्ञानिक थे जय आर्यवर्त 
12. वेद में लिखा है की पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और उसी (सूर्य) के आकर्षण के कारण अपने मार्ग से भटक नहीं सकती । सूर्यं की परिक्रमा पृथ्वी कितने दिनो में करती है? इसका उत्तर वेद इस प्रकार देता है:-

द्वादश प्रधयश्चक़मेकं त्रीणि नभ्यानी क उतच्चिकेत ।
तस्मिन् त्सांक त्रिशता न शंकवोsप्रिता: षप्टिर्न चलाचलाश: । ।
-ऋग्वेद १-१६४-४८

भावार्थ : (चक्रम्) यहां वर्ष ही चक्र है, क्योंकि यह रथ के पहिय के समान क्रमण: अर्थात् पुन: पुन: घूमता रहता है। उस चक्र में (द्वादश+प्रधय:) जैसे चक्र में 12 छोटी-छोटी अरे प्रधि = कीलें हैं। वैसे साल में बारह मास हैं।
(त्रीणि+नभ्यानी) इसके (पृथ्वी के) परिक्रमण के दौरान कोई भाग सूर्यं के नजदीक आने दूर जाने से तीन ऋतुएं होती हैं। (क:+उ+तत्+चिकेत) इस तत्व को कौन जानता है। (तस्मिन्+साकम्+शंकव:) उस वर्ष में कीलों सी
(त्रिशता+षष्ठी: ) 300 और 60 दिन (अर्पिता) स्थापित हैं! ( न + चलाचलाशा: ) वे 360 दिन रूप कीलें कभी विचलित होने वाली नहीं हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि एक वर्षमें 360 दिन हौते हैं।

एक प्रवचन में स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था कि प्राचीन काल में दरिद्रो के घर में भी विमान थे। उपरिचर नामक राजा सदा हवा में ही फिरा करता था, पहले के लोगों को विमान रचने की विद्या भली प्रकार विदित थी


13. सेनटरीफ्युग्ल पम्प का आविष्कार भी आर्यों ने किया था। कणाद मुनि कहते हैं। कि नली से वायु निकाल देने” पर जल ऊपर चढता है। पानी निकालते जाइये पानी ऊपर चढता जाएगा ।

14. आर्यो के पास कम्पास भी था । कम्पास का सिद्धांत चुम्बक की सुई पर अवलम्बित है। वैशेषिक में कणाद मुनि लिखते हैं कि मणिगमनं सुच्यभिसपर्णमद्रष्टकारणम् अर्थात् चुम्बक की सुई की ओरे लोहे के दौडने का कारण अदृष्ट है।  यह लोह चुम्बक सुई ‘के अस्तित्त्व का प्राचीनतमृ प्रमाण है।

इसी तरह अति प्राचीन हस्तलिखित शिल्पसंहिता जो गुजरात के अणहिलपुर के जैन पुस्तकालय में है। उसमें ध्रुव मत्स्य यंत्र बनाने की विधि स्पष्ट रूप से लिखी मिलती है, उसी शिल्पसंहिता में बैरोमीटर बनाने की विधि लिखी हुई है। वहां लिखा है कि पारा, सूत और जल के योग से यह यंत्र बनता है। शिल्पसंहिता कार कहते हैं कि इस यंत्र से ग्रीष्म आदि ऋतुओं का निर्णय होता है।

15. आर्यों ने समय जानने के लिए धुपघड़ी, जलघडी और बालूघड़ी का निर्माण भी कर लिया था ज्योतिष ग्रन्थों में लिखा है की

 ‘तोययंत्रकपाल थेमंयूर नर वानरे: । ससूत्ररे वुगभेश्च सम्यकालं प्रसाधयेत्

अर्थात् जलयंत्र से समय जाना जाता है अथवा मयूर नर और मानव आकृति के यंत्र बनाकर उनमें बालू भरने और एक और का रेणु सूत्र दूसरे में गिरने से भी समय जानने का यंत्र बन जाता है।

16. आर्यों ने स्वयंवह नामक वह यंत्र बना लिया था जो गर्मी या सर्दी पाकर अमुक वेग से अपने आप चलने लगता था जिसमें पारा भरा जाता था जो तूफान या मानसून जानने का सर्वोत्तम यंत्र था।

17. ज्वार भाटा कीं बात आर्यों को ज्ञात थी। विष्णु पुराण में लिखा है कि यथार्थ में ज्वार भाटे से समुद्र का जल कम और “अघिक नहीं हो जाता। प्रत्युत अग्नि में थाली पर जल रखने से जिस प्रकार वह उमड पडता है। उसी प्रकार चन्द्रमा के आकर्षण से ज्वार भाटा होता है। अत: विलियम वेवल ज्वार भाटा सिद्धांत के जनक नहीं हैं।

18. बीजापुर के संस्कृत पुस्तकालय में सुरक्षित संस्कृत की एक प्राचीन पुस्तक में वायरलैस बनाने का वर्णन है, तभी तो शुक्रनीति में लिखा है कि राजा एक दिन में दस कोस तक की बात जाने। उपरोक्त पुस्तक में ऐसे मसाले बनाने की विधि का वर्णन भी है, जिसके उपयोग से मृत शरीर हजारों वर्ष अविकृत अवस्था में रह सकता है।

19. पुराने जमाने में ऐसा यंत्र भी बनाया जाता था जो आदमी की भांति बोलता था। विक्रमादित्य के सिंहासन की पुतलिया बराबर बोलती’ थी। रावण ने एक कृत्रिम सीता बनाई थी जो राम का नाम लेकर रोती थी अत: रोबोट भी पुराने जमाने में बनाये जाते थे।

20. आधुनिक विज्ञान बताता है कि सूर्यं आकाश गंगा के अक्षीय परिक्रमा करता है। यह बात यजुर्वेद में इस प्रकार लिखी है-‘सृर्य वर्षा आदि का कर्ता (जल -भाप-बादल-वर्ष) प्रकाशमान तेजोमय सब प्राणियों में अमृत रूप वृष्टि (किरणे) द्वारा प्रवेश (विटामिन डी आदि) करा और मूर्तिमान सब द्रव्यों को दिखाता हुआ सब लोकों के साथ आकर्षण गुण से अपनी परिधि में घूमता है किन्तु किसी लोक (पृथ्वी आदि दस ग्रह) के चारों और नहीँ घूमता।

21. कहते हैं कि वेदों मे ’भुत-प्रेतों की कथाएं हैं .लेकिन यह झूठा आरोप है। क्योंकि एक स्थान पर लिखा है कि जब गुरू का प्राणान्त हो, तब मृतक शरीर जिसका नाम प्रेत है, उसका दाह करने वाला शिष्य प्रेतहार अर्थात् मृतक को उठाने वालो के साथ दसवें दिन शुद्ध होता है। दाह होने के बाद उसका नाम भूत है। अत: जो बीत गया उसी का नाम भूत है।

22. किसी भी वैदिक साहित्य में पशुबलि या नरबलि का विधान नहीं है वेदानुसार अश्वमेध यज्ञ उसे कहते हैं जो राजा घर्मं से पालन करे, न्याय के साथ राष्ट्र में स्थिरता कायम करे। विद्या आदि प्रदान करना और जनकल्याण के लिए होम करना ही अश्वमेघ है। कृषि कर्म करना, इन्द्रियों, पृथ्वी आदि को पवित्र रखना गोमेध यज्ञ कहलाता है । यज्ञ तो हिंसा रहित होता है।


23. एक्सबायोलोजी अभिधारणा के बारे में वेद कहता है कि जिस प्रकार सूर्य-चन्द्र आदि इस लोक में हैं, अन्य लोक में भी हैं।” यह आर्यों को भली- भांति विदित है कि अर्जुन महाभारत काल में मंगल ग्रह पर गया था। अन्य लोक जहां पर जीवन है, जलवायु व वातांवरणानुसार प्राणियों के रंग, रूप व भाषा में अन्तर हो सकता है।

24. वेद का प्रत्येक शब्द योगिक है । जैसे कुरान में अकबर का नाम होने से कुरान को मुगल बादशाह अकबर के बाद का नहीँ माना जा सकता। इसी प्रकार कृष्ण, अर्जुन, भारद्वाज आदि नाम वेदों में होने से उनकों वेद से पहले नहीं माना जा सकता। वेदों के शब्द पहले के और मनुष्यों के बाद के हैं। योगिक अर्थ की एक झलक इस प्रकार है:-
भारद्वाज=मन, अर्जुन=चन्द्रमा, कृष्ण=रात्रि

25. वेदिक साहित्य में श्रद्धा से किये गये’ काम, सेवा या श्रद्धापूर्वक दान का नाम श्राद्ध लिखा है, मुर्दों का नही। माता-पित्ता आदि देवगण” ही जीवित पितर हैं” उनकी सेवा ही श्राद्ध व तर्पण हैं।” मरे हुए का श्राद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि व्यक्ति मरकर नया जन्म ले लेता है।

26. आर्यो की अभिधारणा थी कि परमात्मा एक है जो इस जग के कण-कण में व्याप्त है। जिसे विद्वान लोग अनेकों गुणवाचक नामों से पुकरते हैं। इसलिए उसकी कोई मूर्ति नहीं।

27. भारतीय संस्कृति के विकास में वेदिक आर्यों की विशेष देने सहिष्णुता और सामंजस्य की भावना, ज्ञान-विज्ञान का विकास, तपोवन पद्धति, वर्णव्यवस्था और नारियों की प्रतिष्ठा थी। पुत्रियों का उपनयन संस्कार भी होता था, वे ब्रह्मचर्यंवर्ती भी होती थीं। उम्हें यज्ञ करने का अधिकार था।

28. हडप्पा आर्यों की विकृत संस्कृति थी। हडप्पा के नगरों का नियोजन और वास्तुशिल्प उच्चकोटि के ज्यामिति के शास्त्र का प्रतिफल है, जिस प्रमेय को पाइथागोरस का प्रमेय कहा जात्ता है, उसका उल्लेख पाइथागोरस से दो हजार वर्ष पूर्व बौधायन ने अपने सुलभ सूत्र में कर दिया था। पाइथागोरस ने वह प्रमेय भारत में पढी थी। गाल्टन साहब का कथन है कि आजकल के यूरापीय लोग ज्ञान के मामले में यूनानियों के सामने हबशियो के समान हैं, तो प्रश्न यह है कि ‘भारतीयो के सामने यूनानियों का दर्जा क्या था डाक्टर आँनफील्ड लिखले है कि ”भारत वर्ष” में शिक्षा प्राप्त करने के लिए पाइथागोरस, अनकसागोरस, पिरहो और -अन्य बहुत से महाश्य आए जो बाद में यूनान के प्रसिद्ध वैज्ञानिक बनें।

29. चिकित्सा शास्त्र के जनक आर्य ही हैं। वर्तमान यूरोपीय चिकित्सा शास्त्र का आधार भी आयुर्वेद है। लार्ड एन्पिथल ने एक भाषण में कहा था कि मुझे यह निश्चय है कि आयुर्वेद भारत से अरब में और वहां से यूरोप में गया। भोज प्रबन्ध में बेहोश कर शल्यकर्म करने का उल्लेख है। ऋग्वेद में असली बाहु कट जाने पर कृत्रिम बाहु लगाते हुए देव का वर्णन आया है। ऋग्वेद में कटा हुआ सिर भी शल्य चिकित्सा से जोड़ने का विधान है। प्राचीन काल में मृत व्यक्ति की आँखें निकालं कर चक्षुहीन को लगाई जाती थी। शरीर की टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत करके युवा अवस्था को काफी समय तक बरकरार रखा जाता था । च्यवन ऋषि को तो विर्धावस्था से युवा अवस्था प्राप्त हो गयी थी। च्यवनप्राश आयुवर्धक (रीजनरेटिव) औषधि आज नहीं है ? ऋग्वेद में मानव शरीर का पंचभूतों से बनने का उल्लेख एवं एक हजार ओषधियों का वर्णन है। अथर्ववेद को वेद में भेषजा कहा गया है” इससे बडी साक्षी वेदों में औषधियों के वर्णन की और क्या होगी ? अथर्ववेद में रोगों के नाम एवं उनके लक्षणों तक का ही नहीं बल्कि मनुष्य की शरीर की 206 हडियों का वर्णन” तक है।

वेदों में Germ theory पाई जाती है! प्रो. मैकडानल ने लिखा है कि ऋगवेद तथा अथर्ववेद में अद्र्ष्ट शब्द एक प्रकार के कृमियों के लिए आया है । वेद मंत्रो में सूर्यं को ऐसे किर्मियों का नाशक कहा गया है, अथर्ववेद में तो द्रष्ट तथा अदर्ष्ट कृमियों का विस्तृत वर्णन है। वात्स्यान प्रणीत कामसूत्र में रज व वीर्यं का वैज्ञानिक विधि से विस्तृत वर्णन है। अथर्ववेद में 15 प्रकार की शल्य चिकित्सा का वर्णन है।

30. प्राचीन आर्य कृत्रिम दांतों का बनाना और लगाना तथा कृत्रिम नाक बनाकर सीना भी जानते थे! दांत उखाडने के लिए एनीपद शस्त्र का वर्णन मिलता है। मोतियाबिन्द (कैटेरेक्ट) के निकालने के लिए भी शस्त्र था। बागभट ने शल्यकर्मों के यंत्रों की संख्या 115 लिखी है। प्राचीन काल में आर्य सूक्ष्म आपरेशन करते थे। कटी हुई नाक को जोडने की विधि यूरोपियनो ने भारतीयों से सीखी।

31. वनस्पति शास्त्र के जनक भी आर्य ही हैं! हंसदेव का मृगपक्षी शास्त्र वनस्पति विज्ञान का प्रामाणिक ग्रंथ है। बागों में कृत्रिम झरने लगाये जाते थे। समरांगणसूत्रधार मॅ तो लिफ्ट का भी जिक्र है। वेद कहता है कि लता तथा पेडों के पत्ते दोनों वर्णो (सूर्यं का लाल व भूमि का रस कृष्ण वर्ण) के मेल से हरे बनते हैं।

32. 10 आषाढ शुदी 1932 वी, को अपने एक प्रवचन में स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था कि प्राचीन काल में दरिद्रो के घर में भी विमान थे। उपरिचर नामक राजा सदा हवा में ही फिरा करता था, पहले के लोगों को विमान रचने की विद्या भली प्रकार विदित थी ए.ओ हयूम जिन्होंने बाद में भारतीय कांग्रेस की स्थापना की, उन्होने स्वामी दयानन्द जी का उपहास करते हुए कहा, ’व्यक्ति का उडना गुब्बारों तक ही सीमित रह सकता है, यान बनाकर तो केवल सपनों में ही उडा जा सकता है ।’ लेकिन जब विमान का आविष्कार हुआ तो ह्यूम साहब ने बाद में उदयपुर में श्रद्धानंद जी से अपने उपहास के लिए क्षमा मांगी थी।
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भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव को गोली मारी गई थी ?

क्या bhagat singh ,raaj guru, sukh dev को गोली मारी गई थी ?


bhagat singh ,raaj guru, sukh dev जी के द्वारा लिखी गई चिठ्ठी 

आदरणीय महोदय,
सेवा में सविनय निवेदन है कि भारत की ब्रिटिश-सरकार के सर्वोच अधिकारी वायसराए ने एक विशेष अध्यादेश जारी करके लाहोर षड्यंत्र के लिए एक विशेष न्यायाधिकर्ण (ट्रिब्यूनल) को स्थापित किया था, जिसने अक्तूबर सन 1930 में हमें फांसी का दंड सुनाया। हमारे विरुद्ध सबसे बड़ा दोष लगाया गया है कि हमने सम्राट जार्ज पंचम के विरुद्ध युद्ध किया है। न्यायालय के इस निर्णयं से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैँ- 
प्रथम यह कि अंग्रेज़ जाति और भारतीयों के मध्य एक युद्ध चल रहा है, दूसरे यह कि हमने निश्चित रूप से उस युद्धृ मैं हिस्सा लिया है। अंत: हम राजकीय युद्धबन्दी हैं। यद्यपि इसकी व्याख्या में बहुत ‘अतिशयोक्ति से काम लिया गया है, तथापि हम यह कहे बिना नहीं रह सकते की एसा करके हमें समानित किया गया है 

प्रथम व्याख्या पर हम ज़रा विस्तार के साथ प्रकाश डालना चाहते हैं। हमारे विचार से प्रथम रूप में ऐसी कोई लडाई छिडी हुई नहीँ है और हम नहीं जानते की युद्ध छिड़ने से न्यायालय का आशय क्या है, परन्तु हम इस व्याख्या को स्वीकार करते हैं हम इसको इसके ठीक अर्थों में समझना चाहते हैं। 

हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिकों की आए के साधनों पर अपना एकाधिकार जमाये रखेंगे। चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज़ पूंजीपति हों या सर्वथा भारतीय ही हों। उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है।

यदि शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों द्वारा भी निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी इस स्थिति में कोई अंतर नही पड़ता। यदि आपकी सरकार कुछ नेताओं या भारतीय समाज के मुखियाओं पर प्रभाव जमाने में सफल हो जाय, कुछ सुविधाएं मिल जाएं अथवा समझोते हो जाएं उससे भी स्थिति नही बदल सकती। जनता पर इन सब बातों का प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

इस बात की भी हमें चिन्ता नहीँ है कि एक बार फिर युवकों को धोखा दिया गया है। इस बात का भी भय नहीँ है कि हमारे राजनैतिक नेता पथभ्रष्ट हो गए हैं और वें समझोते की बातचीत में इन निरपराध. बेघर और निराश्रित बलिदानियों को भूल गए हैं। जिन्हें दुर्भाग्य से क्रांतिकारी पार्टी का सदस्य समझा जाता है। हमारे राजनेतिक नेता उन्हें अपना शत्रु समझते हैं, क्योंकि उनके विचार में वें हिंसा में विशवास रखते हैं। हमारी वीरांगनाओं ने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया है। उन्होंने बलिवेदी पर अपने पतियों को भेंट किया, उन्होंने अपने आपको भी न्योछावर कर दिया, परन्तु आपकी सरकार उन्हें विद्रोही समझती है। आपके एजेंट भले ही झूटी काहानियाँ बनाकर उन्हें बदनाम कर दें और पार्टी की ख्याति को हानि पोहचाने का प्रयास करें परन्तु यह युद्ध चलता रहेगा।

हो सकता है की यह युद्ध भिन-भिन दशाओं में भिन-भिन स्वरूप ग्रहण करे, कभी यह युद्ध प्रकट रूप ले ले, कभी गुप्त दशा में चलता रहे, कभी भयानक रूप धारण कर ले, कभी किसान के स्तर पर जारी रहे और कभी यह युद्ध इतना भयानक हो जाए की जीवन और मरण की बाजी लग जाये’ चाहे कोई भी परिस्थिति हो इसका प्रभाव आप पर पड़ेगा।

यह आपकी इच्छा है कि आप जिस परिस्थिति को चाहें चुन लें परन्तु यह युद्ध चलता रहेगा। इसमे छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा । बहुत सम्भव है की यह युद्ध भयंकर स्वरूप धारण कर ले। यह उस समय तक समाप्त नही होगा जब तक की समाज का वर्तमान ढांचा समाप्त नही हो जाता। प्रत्यक व्येवस्था में परिवर्तन या क्रान्ति नही हो जाती और श्रृष्टि में एक नए युग का सूत्र पात नही हो जाता।

निकट भविष्य में यह युद्ध अंतिम रूप में लड़ा जाएगा और तब यह निर्णायक युद्ध होगा। साम्राज्यवाद एंव पूंजीवादी कुछ समय के मेहमान हैं। यही वेह युद्ध है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप में भाग लिया है। हम इसके लिय अपने पर गर्व करते हैं की इस युद्ध को ना तो हमनें प्रारम्भ ही किया है और न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त ही होगा। हमारी सेवाएं इसतिहास के उस अध्याय के लिय मानी जाएंगी, जिसे यतीन्द्रनाथ दास और भगवतीचरण के बलिदानों ने विशेष रूप में प्रकाशमान कर दिया है। इनके बलिदान माहान हैं।

जंहा तक हमारे भाग्य का सम्बन्ध है, हम बलपूर्वक आपसे यह कहना चाहते हैं की आपने हमें फांसी पर लटकाने का निर्णय लिया है, आप एसा करेंगे ही। आपके हाथों में शक्ति है और आपको अधिकार भी प्राप्त है, परन्तु इस प्रकार आप जिसकी लाठी उसकी भेंस वाला सिध्दांत ही अपना रहे हैं। और उस पर कटिबद्ध हैं। हमारे अभियोग की सुनवाई इस वक्तव्य को सिद्ध करने के लिय पर्याप्त है की हमने कभी कोई प्रार्थना नही की, और अब भी हम आपसे किसी भी प्रकार की दया की प्रार्थना नही करते। हम केवल आपसे यह प्रार्थना करना चाहते हैं की आपकी सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार हमारे विरुद्ध युद्ध जारी रखने का अभियोग है।

इस स्थिति में हम युद्धबन्दी हैं और इसी आधार पर हम आपसे मांग करते हैं कि हमारे प्रति युद्ध बंदियों जैसा ही व्येवाहार किया जाए हमे फांसी देने के बदले गोली से उड़ा दिया जाए।

अब यह सिद्ध करना आपका काम है कि आपको उस निर्णय में विशवास है, जो आपकी सरकार के एक न्यायालय ने दिया है। आप अपने कार्य द्वारा इस बात का प्रमाण दिजिय। हम विनय पूर्वक आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप अपने सेना-विभाग को आदेश दें कि हमें गोली से उड़ाने के लिए एक सैनिक टोली भेज दी जाये।

भवदीय 
भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव 
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आर्यों का ज्ञान एंव विज्ञान भाग 1

गर्व से कहो हम आर्य हैं 


Aryavart आर्यवर्त (भारत) में ही मनुष्य ने सर्वप्रथम प्रथम विज्ञान और कला का अरुणोदय देखा। जब यंहा सभ्यता एंव संस्कृति अपने शिखर पर पहुंच चुकी थी तो यूरोप वाले नितांत जंगली थे।” डफ साहब का कथन है कि आर्यों का विज्ञान (vedic science) इतना विस्तरत है कि यूरोपीय विज्ञान के सब अंग वहां मिलते हैं।

सृष्टि से लेकर पाँच हजार वर्ष पूर्व तक आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती  ” अर्थात भूगोल में एकमात्र सर्वोपरि राज्य था। आर्यावर्त से भिन्न देश मलेच्छ या दस्यु देश थे। संसार को आज ही की तरह सात महाद्वीपों में बांटा गया था। जिसे आज एशिया कहते हैं, वेदिक काल में उसका नाम जम्बुद्वीप था आर्यवर्त (भारत) इसी का एक वर्ष है जब यहां पर तोप व वायुयान थे तब यूरोप में पाषाण युग ही चल रहा था।

वेदों में सब पदार्थ एंव सब विदयाओं का वर्णन है। लेकिन यह गहन अनुसंधानों के बाद ही संभव है। आधुनिक युग में यदि कोई विदवान अपने अविद्यान्ध्रकार को हटाकर ज्ञान को प्रकाशित कर देता है तो वह समझता है कि मैंने एक नया आविष्कार किया है। भोले-भाले अन्य मनुष्य भी समझने लगते हैं कि इस विद्वान ने ही नई खीज की है और इससे पहले इस बात का किसी को पता ही नहीं था। यह उनकी बडी भूल होती है। वेदिक युग में सब ज्ञान प्रकाशित था।  धीरे…धीरे अज्ञान अन्धकार से विज्ञान का वह प्रकाश लुप्त हो गया। इतनी बात तो अवश्य है कि उस विद्वान ने इस युग में ज्ञानान्धकार हटाकर पुंनआंविष्कार किया, अपनी योग्यता से नई बात का पता लगाया।

यह कहना सर्वथा ही अनुचित है कि इससे पहले कभी किसी को इस बात काज्ञान था ही नहीं।


ईसाई पादरी मैक्समूलर (मोक्षमूलर) ने एक स्थान पर लिखा है कि में आपको पुन: स्मरण कराता हूँ कि वेद में अधिकांश बालकों औंर मूर्खा की बातें हैं।  पादरियों द्वारा आर्यों को गंवार तथा धुमकड बताया गया। दरअसल मैक्समूलर यदि वेदों में विज्ञान सिद्ध कर देते तो यह बाइबल के विरूद्ध होता और बाइबल, के विरूद्ध बोलने का परिणाम होता सजा ए-मौत इसलिए उन्होंने सत्य को दबा दिया, लेकिन सत्य भला कभी दबाया जा सकता है? कदापि नहीं।

रेवरेन्ड मौरिस फिलिप नामकं ईसाई पादरी ने मैक्समूलर के बयानो पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा है कि हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वैदिक आर्यों के ईश्वरादि विषयक पवित्रता और उच्चतर विचार एक प्रारम्भिक ईश्वरीय ज्ञान के परिणाम थे।

आर्य उच्चकोटि “के विद्वान थे, इसको हम इस प्रकार सिद्ध कर सकते है:-


1. आर्य साहित्य में विज्ञान शब्द का अर्थ साइन्स के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जैसे ‘एतदुविज्ञानम्’ – शतपथ 3-3-4

इति विज्ञायेत‘-यास्कीय निरूक्त एवं कल्पसूत्र

संस्कृत व्याकरण में विद नामक चार धातुएँ हैं जिनसे ‘वेद’ शब्द बन सकता है -विद सत्तायाम् (विद्यते), विद ज्ञाने (वेति), विद विचारणे (वेविन्ते) ’और विद्रल लाभे (विन्दति) । इन चारों धातुओं से बनने वाले शब्द ‘आश्चर्य चकित करने वाले हैं। मनुष्य जाति के अस्तित्व में आते ही (विद सतायाम), ज्ञान प्राप्ति के लिए (विद ज्ञाने), विचारपूर्वक (विद विचारणे), संसार के लाभ के लिए (विद्र्ल्र लाभे) अपनी जो महान विरासत परमात्मा ने छोडी है, उसी का नाम वेद है। ’वेद’ शब्द लिट् लकार में नहीं बनता, केवल लट् लकार में ही बनता है, जो वर्तमान काल का घोतक है। वेद भूत काल से मुक्त है अर्थात् वह सतत् प्रत्यक्ष है। 

अत्त: जब वेद नहीं रहेंगे तो सृष्टि भी नहीँ रहेगी। वेदिक वानप्रस्थिर्यों और ऋषियों ने जंगलो के बीच निरोग जलवायु में वेदों पर अनुसंधान करके क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त किया, क्रमबद्ध ज्ञान -विज्ञान कहा गया और आर्यों का यह विज्ञान मानव कल्याण के लिए था, उनकी शिक्षाएं नैतिकता व नम्रता के लिए है क्योंकि ऋषियों का व्यवहार स्वच्छ व निष्काम था।

सृष्टि से लेकर पाँच हजार वर्ष पूर्व तक आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती  ” अर्थात भूगोल में एकमात्र सर्वोपरि राज्य था।


2.  पृथ्वी के आकार का ज्ञान पुराणों में इंगित पड़माकार, अंडाकार से होता है-  शतपथ में परिमण्डल रूप भी पृथ्वी की गोलाकार आकृति का. घोतक है” ऋगवेदानुसार भी पृथ्वी गोल है तथा सूर्यं के आकर्षण पर ठहरी है।

3. यजुर्वेद के अनुसार पृथ्वी जल के सहित सूर्य के चारों और घूमती जाती है। भला आर्यों को गंवार कैसे कहा जा सकता है ? गृह परिचालन सिद्धांत को महाज्ञानी ही लिख सकते हैं।

4. वेदों में सूर्यं को वर्घन कहा गया है, अर्थात् पृथ्वी से सैकडों गुणा बडा व करोडों कोस दूर। क्या घुमन्तु जाति ऐसा अनुमान लगा सकती थी।

5. अथर्ववेद में भूत-प्रेत, ताबीज बनाने का विवरण कहीं भी नहीँ बल्कि कर्मबद्ध विज्ञान ही है। जैसे -’जिस तरह चन्द्रलोक सूर्यं से प्रकाशित होता है, उसी तरह पृथ्वी भी सूर्यं से प्रकाशित होती हे।

6. सूर्य की सात किरणों का ज्ञान संसार में सबसे पहले आर्यों ने ही ज्ञात किया। आर्यों ने ही विश्व को बताया कि सूर्यं की सात किरणे दिन को उत्पन्न करती हैं। इतना ही नहीं आर्यों ने सूर्य के अन्दर सर्वप्रथम काले दागों को भी देखा था।

7. आर्यों को सूर्यं-चन्द्र ग्रहण’ के वैज्ञानिक कारणों का ज्ञान था तथा पृथ्वी की परिधि का भी। भास्कराचार्य ने इस पृथ्वी के गोल होने और उसमें आकर्षण (चुम्बकीय) शक्ति होने के सिद्धांतों का प्रतिपादन वेदाध्ययन के आधार पर ही किया क्योकि वेद सब सत्य विद्याओं का सार है। उन्होंने लिखा कि गोले की परिधि का 100 वां भाग एक सीधी रेखा प्रतीत होता है हमारी पृथ्वी भी एक बडा गोला है। मनुष्य को उसकी परिधि का बहुत ही छोटा भाग दीखता है। इसलिए वह चपटी दिखती है। “ वेदो के आकर्षण सिद्धांत का भावार्थ करते हुए न्यूटन से कई शताब्दियों पहले भास्कराचार्य ने थ्योंरी आफ ग्रेविटेशन इतनी उत्तमता से लिखा कि इसे देखकर आश्चर्य होता है। 

उन्होंने लिखा कि पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति के जोर से सब चीजों को अपनी ओंर खींचती है। इसलिए सभी पदार्थ उस पर गिरते हुए नजर आते है।” इन्हीं सिद्धांतों को पढकर फ्रांस निवासी जेकालयट ने अपनी पुस्तक (दि) बाइबल इन इंडिया में लिखा है कि सब विद्या भलाइयों का भंडार आर्यावर्त है। आर्यावर्त से ज्ञान-विज्ञान को अरब वालों ने लिया और अरब से ही यूरोप पहुंचा। एक साक्ष्य यह भी है कि खलीफा हारूंरशीद और अलमामू ने भारतीय ज्योतिषियों को अरब बुलाकर उनके ग्रन्धों (वेदों , उपनिषदों) का अरबी में अनुवाद करवाया।

आर्य ग्रीकों और अरबों के गुरू थे। आर्यभट के ग्रन्धों का अनुवाद कर धर्मबहर नाम रखा गया अलबेरुनी लिखता है कि अंकगणित शास्त्र में हिन्दू लोग संसार की सब जातियों से बढकर हैं। मेंने अनेक भाषाओं के अंकों के नामों को सीखा परन्तु मैंने किसी भी जाति में हजार से आगे के लिए कोई नाम नहीं पाया। परन्तु हिन्दू (आर्य) लोगों में 18 अंक तक की संख्याओं के नाम हैं और वे उसे परार्ध कहते हैं। यजुर्वेद में निम्नलिखित संख्या में ईंटों का कुंड बनाने की शक्ति देने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की गई है:-

एक          1 
दश          10 
शत          100 
सहस्त्र       1000 
अयुत        10000 
नियुत        100000 
प्रयुतम       10000000 
अवुर्द         100000000 
न्यवुर्द        1000000000 
समुद्र         100000000000
मध्य         10000000000000
अनंत         1000000000000000
परार्ध         100000000000000000

इतना ही नही वेदों में पाहाडों का वर्णन भी है, वर्गमूल, भिन , रेखागणित , आदि का विस्त्रत वर्णन यजुर्वेद में है।

8. आर्यों का साहित्य उच्चकोटि का है । किरातार्जुनीय में तो भारवि ने शब्द वैचित्र्य के अदभुत और उत्तम उदाहरण द्वारा संसारभर को आर्य साहित्य से अवगत करा दिया। एक श्लोक में न के सिवाय और कोई अक्षर नही सिर्फ अन्त में त हे’ 

न नोननुत्रो नुत्रोनो नाना नानानना ननु ।
नुत्रोsनुत्रो ननुन्नेनो नानेनानुत्रनुनुत ।।
                                                                  -किरातार्जुनीय 15-14 


आठवीं सदी में कविराज ने ’राघव-पाण्डवीय ग्रंथ रचा । जिसके प्रत्येक श्लोक के दो अर्थ हैं, एक रामायण की कथा बतलाता है दूसरा महाभारत की उदाहरण स्वरूप नीचे लिखे पद्य का अवलोकन कीजिए”-

नृपेण कन्या जनक्रेन दित्सितामयोनिजालम्भयितु स्वयंवरो ।
ट्टिजप्रकर्षण स धर्मनन्दन: सहानुजस्तां भुवमप्यनीयत ।। 

इसी प्रकार वाल्मीकि एवं कालिदास की प्रसिद्धि से संसार में भला कौन अवगत नहीँ है

9. आर्यों ने ग्रहण देखने के लिए तुरीय (दूरबीन) का आविष्कार किया था। शिल्प संहिता में लिखा है किं पहले मिटटी को गलाकर कांच तैयार करें, फिर उसको साफ करके स्वच्छ कांच (लैन्स बनाकर) को बांस या धातु के आदि , मध्य और अन्त में लगाकर फिर ग्रहणादि देखें। वेद में भी लिखा है की चन्द्र की छाया से जब सूर्य ग्रहण हो तब तुरिययन्त्र से आँख देखती है।

10. वेदों में ध्रुव प्रदेश में होने वाले छ – छ: मास के दिन-रात का भी वर्णन है। ध्रुवों में छ: मास का दिन व छ: मास की रात्रि मालूम करना ज्योतिष ओंर भूगोल के महान सूक्ष्म ज्ञान पर ही अवलम्बित है। पृथ्वी पर ऐसी कोई जगह न बची थी जिससे आर्य अपरिचित हों तभी तो आर्य साहित्य में लिखा है कि जिस समय लंका में सूर्य उदय होता है, उस समय यमकोटि नामक नगर में दोपहर, नीचे सिद्धपुरी में अस्तकाल और रोमक में दोपहर रात्रि रहती है। अत: रोबर्ट को उत्तरी ध्रुव का खोजकर्ता कहना गलत है।

11. ऐतरेय और गोपथ ब्राह्मण में लिखा है कि न सूर्य कभी अस्त होता है, न उदय होता है। वह सदैव बना रहता है, परन्तु’ जब पृथ्वी से छिप जाता है तब रात्रि हो जाती है और जब पृथ्वी आड से हट” जाती है तब दिन हौ जाता है। ऐसी दशा में कौन कह सकता है कि खगोलिक भूगोल का शुक्ष्म ज्ञानं आर्यों ने आविष्कृत(vedic science) नही क्या।

मित्रों आज इस लेख में इतना ही अगले लेख में 32 और प्रमाण दूंगा जो ये सिद्ध करेंगे की आर्य जाती ही सर्वश्रेष्ट थी, है और रहेगी बस हमें फिरसे आर्य बनना पड़ेगा
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माहाराणा प्रताप की बेटी चम्पा थी सच्ची देशभक्त 




भगवानदास आमेर के राजा भारमल का पुत्र था। मुगल दरबार में भगवानदास को ऊँचा स्थान प्राप्त था। इसके अलावा वह एक उत्कृष्ट योद्धा था, जिसने आमेर से बाहर जाकर पश्चिमी और उत्तरी भारत में कई बड़ी जंगें लड़ी  और उनमें विजय प्राप्त की। 


पिता राजा भारमल की मौत के बाद भगवानदास सन 1573 में आमेर का राजा बना। अपने पिता के समान ही भगवानदास को भी मुगल दरबार में काफी ऊँचा पद प्राप्त हुआ था। वह पांच हजारी मनसब तक पहुंचा था। भगवानदास को लाहौर का संयुक्त गवर्नर बनाया गया था जब मिर्जा हाकिम ने लाहोर पर आक्रमण किया तब उसे पराजित करने मेँ भगवानदास का बहुत बड़ा हाथ था। 1585 में भगवानदास को कश्मीर के सुल्तान युसुफ खान के खिलाफ लड़ने के लिए भेजा गया, जहां उससे डरकर सुल्तान ने समपंर्ण कर दिया। इस उपलब्धि पर उसके नाम से सिक्का भी प्रचलित किया गया। मानसी गंगा, गोवर्धन के तटों को पत्थरों से सीढियों को बनवाने का श्रेय भगवानदास को प्राप्त है। श्रद्धालु मानसी गंगा के चारों और दर्शनीय स्थान के दर्शन करते हुए परिक्रमा लगाते हैँ। भगवानदास को अकबर ने माहाराणा प्रताप के पास इसलिए भेजा था क्योंकि वो भी प्रताप की तरहां धर्मनिष्ट था।

उसदिन भगवान दास की भेटं सबसे पहले चम्पा से हो गई लगता है , आप महाराणा की बेटी हैं”

हाँ आपने ठीक पहनाना,” चम्पा ने कहा, “मैं भारत की बेटी हूँ”

भारत की बेटी ? भगवानदास ने काहा, “लगता है तुम्हें कम सुनता है मैंने तो कहा था कि आप महाराणा की बेटी हैँ”

मैंने तो सही ही सुना है और कम सुने हमारे शत्रुओं को? मैं भारत की ही बेटी हूँ।”

ओह लगता है कोई विक्षिप्त कन्या हे,” वह बड़बड़ाया, ” क्या  तुम महाराणा प्रतापसिंह की बेटी नही हो

हूँ ना! कह तो दिया भारत कीं ही बेटी हूँ।”

“हे भगवानदासा” लगता है दर-दर की ठोकरे खाने से महाराणा का परिवार विक्षिप्त हो गया है।

“महाराणा का परिवार विक्षिप्त नहीं हुआ! विक्षिप्त तो तुम्हारा परिवार हुआ है।

ऐ लड़की,” भगवानदास का पारा थोडा चढ गया, “तुम कहना क्या चाहती हो? मेरा परिवार विक्षिप्त कैसे हो गया हे?”

इसलिए कि तुमने अपनी बेटियों को मलेछों के रंगमहल में भेज दिया है।

ओह अब समझा,” भगवानदास ने कहा, “तुम तो बाप से भी चार कदम आगे निकल गयी, बाप की आँखों पर तो देशभक्ति का रजत रंग ही चढा था, बेटी पर तो देशभक्ति के स्वर्ण रंग की परत चढ गयी है। ” फिर उसने पूछा, “पर भारत की बेटी की क्या पहेली है? इसे भी बता दो जरा, जब हमारे परिवार के विक्षिप्त होने का कारण ही बता दिया तो इस पहेली को भी सुलझा दो।”

“ क्या तुम नहीं जानते की मेरे पिता ही महाराणा हैं और आज महाराणा ही भारत हैं।

तुम जैसे राजा-महाराजा सभी तो अकबर के चरणों की धूल अपने मस्तक पर लगाकर पराधीन हो गये हो, परंतु मेरे पिताश्री एकमात्र ऐसे शासक हैं, जो भारत की आन बान ओर शान का प्रतिबिम्ब बने हुए हैं।

इसलिए वे ही आज भारत हैँ और भारत ही आज़ महाराणा है। बुद्धू आयी बात अक्ल में 

हाँ बेटी आ गयी बात अक्ल मेँ ।” इतना कहकर भगवानदास अपने भूतकाल के कर्मों पर विचार करता हुआ वहाँ से उल्टे पाँव ही चल दिया।

इस प्रकार राणा प्रताप को मनवाने के भगवानदास के भी सारे प्रयास असफ़ल सिद्ध हुए। उसने सोचा था की बच्चों को बहकाएगा और उन्हें अकबर की महानता के किस्से सुनाकर अकबर के दरबार मेँ चलने को प्रेरित करेगा, पर महाराणा की बेटी ने उसे ऐसा दुत्कारा कि उसे उल्टे पॉव भागना पड़ा।

जहाँगीर की माता मरियम-उजून्जामानी आमेर नरेश बिहारीमल की पुत्री की पुत्री थी । इसी प्रकार के संबंध कई अन्य राजपूतों ने भी किए, राणा प्रताप ऐसा कोई वैवाहिक संबंध नहीं चाहते थे । यही कारण है कि जब भगवानदास को बालिका ने अपने गौरवशाली इतिहास का भान कराया तो उसे उल्टे पाँव ही लोटना पड़ा।

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