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sangati ka fal hindi story संगती का फल

sangati ka fal

sangati hindi story
एक वृक्ष पर कौआ रहता था। उसी की संगती sangati में एक हंस भी रहता था। काफी समय से दोनों यहीँ पर रह रहे थे। समय बीतता गया और दोनों में दोस्ती हो गई। लेकिन कौवे और हंस के रंग, रूप, स्वभाव, गुण, दोष मैं काफी अन्तर होते हुए भी हंस ने मित्रता जारी रखी।
एक दिन शिकारी जंगल में शिकार करने आया। शिकार करने के बाद, कुछ देर आराम करने का विचार करते हुए वह उस वृक्ष के निचे जा पहुँचा जहाँ हंस और कौआ रहते थे। शिकारी पेड़ के निचे लेट गया। शिकारी काफी थका हुआ था, इसलिए नींद आ गई।
हंस और कौवा यह सब देख रहे थे। थोडी देर मैं शिकारी पर धुप पड़ने लगी’ जब हंस ने देखा की शिकारी के पर सूरज की किरणे पड़ रही हैं, तो डालियों पर जन्हा से धुंप आ रखी थी अपने पंख फेलाकर बेठ गया जिसके कारण किरणे निचे नहीं पहुँचती थीं।
इतने में कोए को शैतानी सूझी क्योंकि यह उसका स्वभाव था। उसने उस शिकारी के मुँह पर मल मूत्र त्याग दिया और पेड़ से उड़ गया।
शिकारी को बहुत बुरा लगा। उसने अपने चारों तरफ देखा! उसे केवल हंस दिखाई दिया। शिकारी ने सोचा कि यह सब इसी हंस ने किया है।
शिकारी ने पास पड़ी बन्दूक उठाई और हंस पर निशाना लगाया और धाएं से गोली चलादी जो सीधी हंस को लगी। हंस नीचे गिर पड़ा। हंस ने कभी ऐसा सोचा भी नहीं था। यदि वह दुष्ट कौवे की sangati में ना रहता तो हंस बे मौत न माराजाता।
शिक्षा :- किसी ने ठीक ही कहा है की बुरी sangati संगती अच्छी नही होती काहावत है की शराब बेचने वाले की लड़की यदि दूध लेकर जाती हो तो लोग यह सोचेंगे की यह शराब ले जा रही है, इसी प्रकार दुष्ट और शैतान लोग शरारत करके मोके से भाग जाते हैं, और बदले में शरीफ पकड़े जाते हैं, अत: दुष्ट का साथ कुछ देर के लिए भी नही करना चाहिए,
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hindi kahani short with moral इश्वर सर्वव्यापक है

hindi kahani तो आपने काफी पढ़ी होंगी लेकिन एसी motivational hindi kahani आपने नही पढ़ी होगी इस hindi kahani को पढ़ आपको कुछ नया सिखने को मिलेगा, तो चलिए इस short hindi kahani को पूरा पढ़ते हें।
 
 
motivated hindi kahani
एक गुरु के पास दो मनुष्य शिष्य होने के लिए आए। 
 
गुरुजी ने कहा-” हम तुम दोनों को एक…एक खिलौना देते हैँ, तुम ये खिलौना लेकर ऐसी जगह पर जाकर जहाँ कोई न हो, तोड लाओ; तब हम तुमको अपना चेला बना लेंगे। ” दोनों अपना-अपना खिलौना लेकर चले।
 
एक चेले ने तो गुरुजी के मकान के पीछे जाकर चारों तरफ देखा कि’ अब कोई नहीं है और खिलौना तोड़ लाकर रख दिया 
 
और दुसरे ने खिलोने को लेकर सारा संसार, ऊँची से ऊँची पाहाड की चोटियाँ, गहरी से गहरी समुद्र की सतहँ, एकान्त से एकान्त अंधेरी कोठरियाँ तथा बड़े बड़े भयानक वन खोज डाले,
 
परन्तु उसे कंही ऐसा स्थान न मिला, जहाँ खिलौना तोड़ता, अत: दूसरे ने खिलौना वैसा ही लाकर रख दिया।
 
गुरु ने पहले से प्रश्न किया…” क्योजी, आपको कहॉ ऐसा स्थान मिला, जहाँ से खिलौना तोड़ लाए? ” उसने कहा गुरुजी. मैं आपके मकान के पीछे गया। वहाँ कोई न था। बस, वन्ही खिलौना तोड़ आपके आगे लाकर रख दिया।
 
दूसरे से कहा…”क्यों भाई तुम्हें कोई ऐसा स्थान नहीं मिला, जहाँ से खिलौना तोड़ लाते? तुमने लाकर वैसा ही रख दिया? ” 
 
दूसरे ने उत्तर दिया ” महाराज मैंने ऊँचे से ऊँचे पहाडों की चोटी, गहरे से गहरे समुन्द्र की सतह, अंधेरी से अँधेरी एकान्त कोठरियाँ और बड़े-बड़े भयानक जंगल में घुमा परन्तु मुझे कहीं ऐसा स्थान न मिला’ जहाँ वो ना था अर्थात् परमेश्वर न था।
 
महाराज, इसलिए नहीं तोडा।” महात्मा ने इसे ही अपना चेला बनाया और दूसरे से कहा…तुम इस योग्य नही की मेरे शिष्य बन सको
 
शिक्षा : परमेश्वर सर्वव्यापक है, अत: एकान्त समझ कर भी पाप ना करें , हमेसा पाप करने से बचें।
 
दोस्तों आपने ये motivational hindi kahani पूरी पढ़ी इसके लिए आपका धन्यवाद उमीद करता हु ये hindi kahani आपको पसंद आई होगी।
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shekh chilli ki kahani in hindi stories

shekh chilli  शेखचिल्ली की कल्पना

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shekh chilli ki kahani

हिंदी कहानियों में shekh chilli की मुर्खता का कोई मुकाबला नही और ये काहानियाँ हमे हंसा हंसा कर लोट पोट कर देती हैं इसलिय दोस्तों shekh chilli की काहनी पढ़िए और आप भी लोट पोट हो जाइए।
 
एक shekh chilli साहब एक स्टेशन पर रहा करते थे। shekh chilli हमेसा अपने ही ख्यालों की दुनिया में खोए रहते थे। एक दिन एक मियाँजी रेल से भारी घडा लेकर उतरे और किसी सामान ढोने वाले को खोजने लगे तभी उनकी नजर एक व्येक्ती पर पड़ी उन्होंने उस आदमी यानी की शेखचिल्ली से कहा…”
 
अबे इस घडे को शहर ले चलेगा?” shekh chilli ने कहा-“हॉ हुजूरा ” 
 
मियाँ ने कहा…”दो पैसे मिलेंगे। shekh chilli ने कहा…”दो ही देना। “और मियां ने शेखचिल्ली के सिऱ पर घड़ा रखवादिया और आगे-आगे स्वयं और पीछे-पोछे शेखचिल्ली चलने लगा।
 
अब शेखचिल्ली की मनसूबेबाजी देखिए। शेखचिल्ली अपनी ही कल्पनाओं के संसार में खोजाता है और सोचने लगता है
 
“इस घड़े को शहर में पोहचाने पर मुझे दो पैसे मिलेंगे। और में उन दो पैसों की एक मुर्गी लूँगा। और जब मुर्गी के अन्डे से बच्चे होंगे, तो उन्हें बेचकर बकरी लूँगा। जब बकरी के बच्चे होंगे, तो उन्हें बेचकर गौमाता लूँगा जब गऊ के बछड़े. होंगे, तो उन्हें बेचकर एक भैंस लूँगा। 
 
जब भैंस के बच्चे होंगे, तो उन्हें बेचकर अपनी शादी करवाऊंगा। और फिर मेरे भी बच्चे होंगे, और बच्चे मुझसे कहैंगे कि बापू हमको फलाँ चीज ले दो. हम कहेंगे धत बदमाशा ” इस शब्द के जोर से कहने पर सिर से घड़ा गिर गया और गिरकर फूट गया।
 
यह देख मियाँजी बोले “अबे मुर्ख तूने यह क्या किया; मेरा ये कीमती घडा घडा क्यों फोड़ दिया ?” शेखचिल्ली ने काहा अजी मियाँ, आपको तो घडे की पडी है, यहॉ तो मेरा बसा बसाया घर ही उजड़ गया।”
 
शिक्षा – व्यर्थ की कल्पनाओं से बचो। कल्पनाएँ मनुष्य को मानसिक रोगी बनाती हैं।

इज्जत करे इज्जत मिले inspirational stories in hindi

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hindi kahani तो आपने काफी पढ़ी होंगी और हर बार कुछ नया सिखने को मिला होगा इस हिंदी कहानी को भी मैने इसी उदेश्य से डाला है की आपके जीवन में कुछ परिवर्तन आए 
 
एक गांव में दो रईस रहा करते थे। उनमें से एक तो बड़े मालदार-यहाँ तक कि दस-बीस गाँव और करोडों के मालिक थे और दूसरे साहाब के पास किसी गाव में सिर्फ कुछ हिस्सा था।
 
वहि मालदार साहब को सदैव यह चेष्ठा रहती की लोग पहिले हमसे दुआ, बंदी, सलाम करें। इसलिए आप गाल फुलाए जैसे रहते थे। 
 
कभी अपने आप किसी दूसरे से हाथ जोड़ प्रणाम नहीं किया करते थे और न बैठने-उठने में ही ‘ आइय , ‘पधारिए’ कहते थे बल्कि जहाँ बैठे होते थे वहीं कुर्सी या आराम-कुर्सी पर बैठे रहते थे। आस पास चारपाइयाँ पडी रहती थी , 
 
उन पर आने वाले की तबीयत चाहै तो बैठ जाये और तबीयत चाहे चला जाये! इतना ही नहीं; वरन दो-चार आदमियों के बैठे रहने पर भी घर से मिठाई मंगवाई या कोई और वस्तु आई, तो और किसी से पूछना-पाछना नहीं । 
 
आप ही खाने लगते थे यही दशा आप की पान-पत्ते और इलायची में रहती थी। पास के बैठने वाले मुंह ताका करते थे और आप पान, इलायची मुंह में भरे बड़े शोक से बातचीत किया करते। यही दशा इनको अपनी रियासत से बाहर जाने पर भी साथ के आदमियों से या अन्यो से भी रहा करती थी।
 
दूसरे साहब जो इनके सामने कुछ भी नहीँ थे, और केवल एक गांव के कुछ हिस्सेदार ही थे, उनकी यह दशा थी कि सबसे प्रथम अभिवादन करते। 
 
”अपनी शक्ति भर कभी दूसरे को यह मौका न देते थे कि वह प्रथम अभिवादन करे। यों धोखे से चाहे कोई प्रथम भले ही कर ले। दूसरे को देखते ही उठ पड़ते थे और अपने से उच्च आसन दिया करते थे। पर फिर भी लोग जो जैसा होता था वैसा ही बैठा करते थे। 
 
इसके अतिरिक्त कभी किसी वस्तु की एकाएकी मांगने की चेष्टा नहीं करते थे, किन्तु यह औरों को खिला-पिला देते थे और आप वैसे ही रह जाते थे।
 
दूसरे के दुख पर जहॉ वह किसी के दरवाजे नहीं जानते थे, वहीं से बिना बुलाए ही दुखी के दरवाजे प्रत्येक दुखी – सुखी के दुख सुख में शामिल हुआ करते थे  परिणाम यह निकला कि उन बडे मालदार की की माँ मर गई, और उनके यहाँ एक आदमी भी न पहुँचा, विशेषकर उनकी प्रजा भी न गई। केवल नौकर और आप थे 
 
और इस एक ग्राम के हिस्सेवाले की स्त्री के मरने के समय पाँच सौ आदमी साथ थे केवल एक काम यही नहीं, बल्कि उस एक ग्राम के हिस्सेवाले के यहाँ यदि कुछ भी काम होता था, तो सैकडों आदमी जमा हो जाते थे 
 
और दूसरी तरफ उस बड़े रहिस के यंहा कोई झाँकने भी ना जाता था। 
 
और एक ग्राम के हिस्सेदार की लोग सर्वथा हर प्रकार से इज्जत किया करते थे और इनको देखकर उठते भी न थे। निदान इन्होंने अपनी यह बेइज्जती देख सैंकडों पर झूठे मुकदमे, तहसील-वसूली में सख्ती आदि हर प्रकार के प्रपंच रचे, परन्तु लोगों ने इनकी इज्जत न की।
 
शिक्षा – अगर तुम अपनी इज्जत कराना चाहते हो, तो पहले दूसरों की इज्जत करना शुरू करो, क्योंकि दुनिया आइना के समान है। यथा, आइने के सामने जैसी शकल होगी उसमें वैसी ही शकल दिखेगी इसी तरहां दुनिया के साथ जैसा बर्ताव आप करेंगे दुनिया भी आपके साथ वैसा ही बर्ताव करेगी।  
 
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सफलता की कुंजी inspirational story in hindi

 

Motivational story in hindi

Secret To Success story in hindiएक सेठजी की अपनी दुकान थी। बही मेहनत से अपने कारोबार को बढाया। अच्छी-खासी कमाई भी होती थी।
सेठजी का इकलौता पुत्र था। लेकिन वह माहाआलसी , कामचोर और निखट्टू भी था। सेठजी के लाख समझाने पर भी वह काम न करता था। सेठजी को अपने कारोबार को देख चिन्ता होती रहती की इसको यह कैसे सम्भाल पाएगा। आखिरकार सेठजी के मन में एक idea आया।
 
 
सेठजी ने अपने लड़के को कहा, “बेटे आज अपनी मेहनत का कुछ कमाकर लाओ तभी भोजन मिलेगा, अन्यथा नहीं। सेठजी ने लडके को सुधारने का अच्छा तरीका ढूंडा था। लड़का सेठजी की बात सुन कर परेशान हो गया और सोचने लगा कि अब क्या किया जाए? वह सीधे अपनी माताजी ’के पास गया गिड़गिड़ाने लगा कि मुझे एक रुपया चाहिए। माताजी ने उसे एक रुपया दे दिया। शाम को जब सेठजी ने आज की Income मांगी तो लडके ने एक रुपया उसके हाथ पर रख दिया। पुराने जमाने में एक रुपए की भी बहुत कीमत होती थी। लेकिन सेठजी
की नजर लडके के कार्य पर थी कि वह क्या करता है। वह सब जान गए। सेठजी ने आदेश दिया जा अब इसे कुए में डाल दे लंड़का दौड़कर गया और रुपया कूँए में फेक दिया। लड़के ने सोचा की बला टल गई।
 
सेठजी ने दूसरे दिन फिर लडके को बुलाया और कहा आज फिर अपनी मेहनत का कुछ कमाकर लाओ, तभी आपको भोजन मिलेगा। ” लडके ने सोचा आज फिर वही मुसीबता उसका स्वभाव था कामचोर, आलसी, कार्य वह करना नहीं चाहता था। आज़ वह बड़ी बहन के सामने जाकर एक रुपये के लिए रोने… धोने लगा। बहन को भाई पर दया आईं और एक रुपया उसे दे दिया। लड़के की परेशानी दूर हो गयी। शाम को सेठजी ने उसकी कमाई मांगी। उसने आज फिर उसे एक रुपया थमा दिया दिया। सेठजी बुद्धिमान् थे, वह जानते थे कि यह रुपया कहाँ से लाया है। क्योंकि कल मां से रुपया लाए जाने पर सेठजी ने उसकी माँ को मायके भेज दिया था। अब वह बहन से लाया है।
 
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सेठजी ने आदेश दिया जाओ इसे भी उसी कूँए में डाल आ’ओँ। लडका तेजी से गया और रुपया डाल आया। तत्पश्चात उसे भोजन मिला। लेकिन सेठजी ने अपनी बेटी को उसकी ससुराल भेज दिया। तीसरे दिन सेठजी ने फिर लडके को बुलाया और कहा आज फिर अपनी मेहनत का कुछ कमा कर लाओ। ” लड़का आज बहुत परेशान था। क्योकि आज उसे रुपया देनेवाली उसकी माँ, बहन घर पर न थी। आज़ उसकी कौन सुनता। उसके पडौसी सभी जानते थे वह निखटू है। जब रुपया मिलने की कोई उम्मीद नहीं रही तो वह चला बाजार में काम दूँढने। बडी मुश्किल से एक काम मिला।
 
लालाजी ने दिनभर भी कार्य करने के बाद एक चवन्नी देने को कहा। लड़के ने इसे  स्वीकार किया दिन भर वह बोरियाँ ढोता रहा। उसकी कमर लचक गई। सीधी भी न कर सकता था। पहली बार मेहनत करने के कारण वह थक कर चूर हो चुका था। चलने की शक्ति भी उसमें अब न रही।
 
कठिन व कठोर मेहनत के बाद वह चवन्नी लेकर घर पहुँचा। सेठजी ने देखा कि लडके का चेहरा कुछ और ही बता रहा था। उसने आज की मेहनत की कमाई मांगी। लड़के ने हाथ पर एक चवन्नी रख दी। सेठजी समझदार थे तुरन्त बोले “जाओ इसे भी कूँए में डाल दो।” यह सुनते ही लड़के की आँखे क्रोध से लाल हो गई और बोले, “मैरी दिन भर कमर लचकी रही, चलने की भी शक्ति न रही श्री, कितनी कठिन परिश्रम करने के बाद मैं यह चवन्नी लाया हूँ। आप कह रहे हैं कि इसे कूँए में डाल दो।”
 
सेठजी ने कहा, “कल तो एक रुपया कूँए में डाला था, आज तो केवल एक चवन्नी है लडका बोला “पिताजी, यह चवन्नी एक रुपए से कहीं ज्यादा कीमती है क्योंकि मैंने यह ‘जान लिया कि बिना मेहनत की कमाई ‘के एक रुपए के फैकने से मुझें कोई कष्ट न हुआ जबकि चवन्नी के डालने में कष्ट अनुभव कर रहा हू।
 
सेठजी ने लड़के की कमर थपथपाई। उसे अपने गले से लगा लिया और अपनी दूकान का कारोबार उसे सौंप दिया और कहा, ” आज तुमने परिश्रम के फल को जान लिया जो मीठा होता है। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। अब तुम यह कार्य कर सकोगे। बस, यही शिक्षा मैं तुम्हे देना चाहता था।
 
शिक्षा – ये hindi story पढ़ कर हमे शिक्षा मिलती है की मनुष्य को सफलता दिलाने वाला उपाय पुरुषार्थ हैं। जो मनुष्य पुरुषार्थ नही करता, वह पिछड जाता है। निठल्ले व्यक्ति का जीवन व्यर्थ होता है।
 

देश प्रेम की शिक्षा short hindi stories with moral values

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एक जंगल में खूब बड़ा पेड़ था जिसपर खूब फल फुल लगते थे और छाया भी घनी थी। उस पर बहूत से पक्षी घोसला बनाकर रहते थे। उसके मीठे फलों को खाकर जीवन बिताते और उसकी ठंडी छाया में आनन्द से इस “प्रकार रहते हुए उन पक्षियों का उस पेड़ से अत्यधिक लगाव हो गया। पेड़ क्या था, सैकडों पक्षियों का बसेरा था, जो पक्षियों का एक गाँव सा लगता था। सुबह शाम वह पक्षियों के कलरव से मधुर संगीत से गूंज उठता। इस प्रकार ‘पक्षीगण बडे आनन्द से अपना समय बिता रहे थे।
 
एक बार जंगल में भयंकर आग लग गयी। आग तूफान की तरह फैलने लगी। “जंगल के सभी जानवर, पक्षी मनुष्य सुरक्षित स्थान की खोज में भागने लगे। शिकारी शिकार का विचार छोड़ वापिस लौट गए’ आग की लपटे तेजी से फैलकर सभी को अपनी लपेट में ले रही थी। एक शिकारी ने देखा की एक विशालकाय पेड़ को आग की लपटें पकड़ने लगी है और उस पर बैठे पक्षी उड़ नहीं रहे हैँ, अपितु ज्यों के त्यों स्थिरभाव से बैठे हैं। शिकारी ने उन्हें चेताते हुए कहा-
आग लगी इस वृक्ष को जलन लगे हैं पात 
उड़ जाओ रे पक्षियों, जब पंख तुम्हारे साथा।
 
यह सुनकर पक्षी उडे नहीं अपितु उन्होंने बड़े द्रिड भाव से शिकारी को यह उत्तर दिया-
 
फल खाय इस वृक्ष के गन्दे किन्हें पात
घर्म हमारा अब यही जलें इसी के साथा।
 
पक्षियों का यह उतर सुनकर शिकारी निरुतर हो गया। थोड़ी ही देर में अपने पेड़रूपी देश के साथ सभी पक्षी बलिदान हो गए। 
 

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शिक्षा – hindi kahaniya पक्षीयों के इस संवाद में कवी ने देशवासियों को देश प्रेम की शिक्षा दी है। देश के उपर आप्पति आने पर हमे देश को छोड़ कर भागना नही चाहिय। अपितु उसकी रक्षा के लिय जी जान की बाजी लगा देनी चाहिय। जिस मात्र भूमि की गोद में हम पले हैं उसके उपकारों को भूलना नही चाहिय। एसे ही बलिदानियों के कारण हमारा देश आजाद हो सका है। भगोड़ों से देश गुलाम बनजाता है। 

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आर्यों का निवास स्थान

आर्य वस्तुत: यहीं के निवासी थे, या बाहार से आए?


आर्य (aryans) जाति वास्तव में इसी देश में आबाद थी या कहीं बाहर से आकर बसी-यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर पर्याप्त विवाद हुआ है और अब तक हो रहा है। यूरोपीय विद्वानों ने जिस दिन से संस्कृत-विषयक अपना अध्ययन और अनुसंधान आरम्भ किया, उसी दिन से इस प्रश्न पर बहस मनोयोग पूर्वक चर्चा आरम्भ हूई। 

जब संस्कृत – (Sanskrit Language) भाषा की रचना-प्रणाली तथा उसकी बनावट को यूरोपीय भाषाओँ से तुलना की गई तो उनमे’ विचित्र समता पाई गई। इससे विस्मित होकर यूरोपीय संस्कृतज्ञों ने अनेक परिणाम निकाले। इनमें से कुछ को सम्मति थी कि यूरोपवासी, तथा ईरान, अफगानिस्तान और भारत के रहनेवाले सब एक वंश के ही हैं। इनका नाम आर्य था। प्राचीन समय में इनके पूर्वज मध्य एशिया में रहते थे और फिर वे वहाँ से भिन -भिन भागो’ में बँटते चले गए। अत: जो लोग भारत में आए उन्होंने तो अपना मूलं नाम आर्य रखा और शेष लोगो नें अपना नाम बदल दिया। इस विद्वत्मण्डली की यह राय भाषाओँ में पाई जाने वाली उस समानता के कारण बनी, जिसका उल्लेख हम कर चुके हैं। उनका कथन है कि विभक्त होने के पहले इन सब जातियों की भाषा एक ही थी। वह भाषा अधिकांश में संस्कृत से अधिक मिलती थी और उसी से लैटिन, ग्रीक, फारसी तथा जेंद आदि भाषाएँ निकली हैं।

स्वामी दयानन्द जी की इसमें निम्म सम्मति है, जिसे उन्होंनै ‘सत्यार्थप्रकाश’ में लिखा है-

1. प्रश्न : मनुष्यों की आदि-सृष्टि किस स्थल में हुई?
उत्तर : त्रिबिष्टप अर्थात् तिब्बत में।


2. प्रश्न : उत्पत्ति के आदि में एक जाति के मनुष्य थे या अनेक जातियों के?
उत्तर : एक के, पीछे विद्वान् और देवता पुरुषों का नाम आर्य तथा बुरे लोगों का नाम दस्यु अर्थात् डाकू मूर्ख पड़ गया। इस प्रकार आर्य और दस्यु दो नाम हुए। आर्यों में उक्त रीति से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नामक चार वर्ण हुए। द्विज, विद्वानों का नाम आर्य और अनपढ़ों का नाम अनार्य अर्थात् अनाडी-शूद्र हुआ।



3. प्रशन : फिर वे यहाँ कैसे आए?
उत्तर : जब आर्य विद्वानों, देवताओं का दस्यु, असुर व राक्षसों अर्थात् भूखों में सदैव लड़ाईं-झगड़ा होने लगा और विवाद बहुत बढ़ गया तो आर्यजन सारी धरती में से इस भूमि को सबसे श्रेष्ठ समझकर यहीं आ बसे। इसीलिए इस देश का नाम आर्यवर्त पड़ा।


4. प्रश्न : आर्यावर्त की सीमा कहॉ तक है?
उत्तर : उत्तर में हिमालय पर्वत, दक्षिण में विध्याचल, पूर्व और पषिचम में समुद्र, या यह कहें कि पश्चिम मेँ सरस्वती नदी या अटक नद (जो उत्तरीय पर्वतों से निकलकर दक्षिण में अरब सागर में जा गिरता है), पूर्व में दर्षदवती (जो नेपाल देश के पूर्वीय भाग के पहाडों से निकलकर बंगाल की और समुद्र में मिल गई है, जिसको ब्रह्मपुत्र भी कहते हैं), हिमालय की मध्य रेखा से दक्षिण और पर्वतों के बीच और रामेश्वर तक विन्ध्याचल के भीतर जितने देश हैं इन सबको आर्यावर्त इसलिए कहते हैं कि यह देश आर्यावर्त देवता अर्थात् विद्वानों ने बसाया है और आर्य पुरुषों की निवास-भूमि है।


5. प्रश्न : पहले इस देश का नाम क्या था और इसमें कौन रहते थे?
उत्तर : पहले इस देश का नाम कुछ भी नहीं था और न कोई यहॉ रहता था, क्योकि आर्य मनुष्य-उत्पत्ति के आरम्भ में कुछ समय व्यतीत हौ जाने के अनन्तर तिब्बत से सीधे इस देश में आकर बसे।


6. प्रश्न : बहुतों का कथन है कि आर्य लोग ईरान से आए, इसीलिए इन लोगों का नाम आर्य है। इनसे पहले यहाँ जंगली मनुष्य रहते थे, जिनको (आर्य जन) असुर और राक्षस कहते थे। आर्य लोग अपने को देवता बताते थे और इन दोनों में जो युद्ध हुआ, वह देवासुर-संग्राम के नाम से कथाओं में वर्णित है।

उत्तर : यह बात नितान्त मिथ्या है, वयोकि ऋग्वेद मेँ लिखा है, जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है, आर्य धार्मिक, विद्वान्, सत्य वक्ताओं का नाम है और उनसे विपरीत गुणों वाले जो मनुष्य हैं, उनका नाम दस्यु अर्थात् डाकू, कुकर्मी, अधार्मिक और मूर्ख है। इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य द्विजों का नाम आर्य तथा शूद्रों का नाम अनार्य अर्थात् अनाडी है। जब वेद में यह लिखा है तो दूसरी जातियों को कल्पित बातों को बुद्धिमान् लोग कभी नहीं मान सकते। हिमालय पर्वत पर आर्य और दस्यु, मलेछ अर्थात् राक्षसों का जो संग्राम हुआ था, उसमें आर्यावर्त के अर्जुन और महाराज दशरथ प्रभृति सम्राटू देवताओं अर्थात् आर्यों की विजय और असुरों की पराजय के लिए सहायक हुए।

युरोप के कुछ शोधकर्ता कहते हैं कि भाषाओँ की समता इस बात की पूरी साक्षी नहीं हैं कि आर्य लोग असल में भारत के निवासी नहीं थे ओर कभी प्राचीन काल में मध्य एशिया से आकर यहॉ बस गए या किसी अन्य स्थान से आए। निसंदेह यहाँ तक तो सब एकमत हैं कि यूरोप की अनेक भाषाएँ और जैद तथा पहलबी (पुरानी फारसी) संस्कृत से इतनी मिलती हैं जिससे पूर्ण बिश्वास से कहा जा सकता है कि या तो अवशिष्ट समस्त भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं, या संस्कृत और ये समस्त भाषाएँ किसी अन्य प्राचीन भाषा से उत्पन्न हैं जो इन सारी भाषाओँ की माता थी।

भारतीय बिद्वान्, जिनके साथ अनेक यूरोपीय विद्वान् भी सहमत हैं, यह कहते हैं कि ये सब भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं, क्योकि यह बात मान ली गई किं संस्कृत इन सबसे प्राचीन तथा सर्वोपरि उत्तम है। अत: कोई कारण नहीं, जिससे यह न माना जाए कि अन्य सभी भाषाएँ जो एक दूसरे से पर्याप्त समान हैँ इसी संस्कृत की पुत्रियाँ हैं। यथा-नवीन संस्कृत्त, प्राकृत, आधुनिक बंगला, वर्तमान गुजराती, मराठी आदि प्राचीन संस्कृत से बहुत भेद रखती हैं। परन्तु इसमें किसी को संन्देह नहीं कि इन सबकी माता प्राचीन संस्कृत है। 

इसी प्रकार चाहे फारसी, जेंद, पहलवी, लातीनी और यूनानी आदि सब भाषाएँ प्राचीन संस्कृत से भिन्न हैं, परन्तु उनमें इतनी समानता है कि आधुनिक भारतीय भाषाओं की भाँती उनको भी संस्कृत सेनिकली माना जा सकता है। दूसरी ओर कई यूरोपीय विद्वान् यह कहते हैं कि भारत की आधुनिक भाषाओं’ की संस्कृत से जितनी समानता है उतनी ही समानता लातीनी, यूनानी आदि से नहीं, इसलिए यह माना जा सकता है कि इन भाषाओँ की माता एक अन्य भाषा हैजो भिन-भिन देशों में जाने से पहले आर्य वंश में बोली जाती थी। 

निसंदेह भाषाओं के बारे में यह परिणाम तो निकाला जा सकता है कि जिस दशा में यह भाषा अब प्रचलित है, उन वंशों में भी कुछ न कुछ पुराना सम्बन्ध अवश्य रहा होगा। क्या ये सब वंश किसी समय मध्य एशिया में बसते थे और वहाँ से इधर-उधर चले गए, या इन सब वंशों के पूर्व-पुरुष हिमालय के बर्फीले पहाडों के दक्षिण या उत्तर में निवास करते थे और उनकी सन्तान संसार के भिन्न-भिन्न भागों में फैल गई? ये एसे प्रश्न हैं जिनके विषय में अभी तक कोई निश्चयात्मक उत्तर नहीं मिला है। 

हमारी सम्मति में लॉर्ड एलफिस्टन और उनके साथी विद्वान् उचित रीति से विवाद करते हैं और कहते हैँ कि जो प्रमाण इस मत की’ पुष्टि में दिये जाते हैं कि आर्य जाति किसी समय मध्य एशिया में रहती थी और वहाँ से हिन्दू (आर्य) भारत में आए, वह इस परिणाम पर पहुँचने की पूर्ण सीडी नहीं है। यह केवल बिचार-मात्र हैं। जब ऐतिहासिक साक्षी मिलती हैं, उस समय से हिन्दू (आर्य) वंश का निवास भारत में ही सिद्ध होता हैं। इसलिए इस बात को सिद्ध करने का भार उन्हीं लोगों पर है जो कहते हैं कि आर्य कहीं बाहार से आए हैं। ऐसी अवस्था में हिन्दू छात्रों को यह शिक्षा देना कि उनके पूर्वज भारत के असली निवासी नहीं हैं, उनको कुमार्ग पर ले जाना हैं!
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आर्यों का ज्ञान एंव विज्ञान भाग 2


आर्य ही थे विश्व गुरु जानीय अपना गोर्वशाली इतिहाश 

मित्रों जैसा की भाग 1 में आर्यों के ज्ञान विज्ञानं vedic science के 11 प्रमाण दिए जा चुके हैं अब इस भाग 2 में 20 प्रमाण और दिए जा रहे हैं जो ये सिद्ध करेंगे की आर्य ही विश्व गुरु थे, यदि किसी को फिर भी शंका रहे तो मेरे पास हजारों साल पुराने महर्षि भारद्वाज का लिखा विमान शाष्त्र भी है जो मुझे मेरे मित्र राहुल आर्य से प्राप्त हुआ है में इस vedic science book ग्रन्थ से ये सिद्ध कर सकता हूँ की आर्य ऋषि कितने बड़े वैज्ञानिक थे जय आर्यवर्त 
12. वेद में लिखा है की पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और उसी (सूर्य) के आकर्षण के कारण अपने मार्ग से भटक नहीं सकती । सूर्यं की परिक्रमा पृथ्वी कितने दिनो में करती है? इसका उत्तर वेद इस प्रकार देता है:-

द्वादश प्रधयश्चक़मेकं त्रीणि नभ्यानी क उतच्चिकेत ।
तस्मिन् त्सांक त्रिशता न शंकवोsप्रिता: षप्टिर्न चलाचलाश: । ।
-ऋग्वेद १-१६४-४८

भावार्थ : (चक्रम्) यहां वर्ष ही चक्र है, क्योंकि यह रथ के पहिय के समान क्रमण: अर्थात् पुन: पुन: घूमता रहता है। उस चक्र में (द्वादश+प्रधय:) जैसे चक्र में 12 छोटी-छोटी अरे प्रधि = कीलें हैं। वैसे साल में बारह मास हैं।
(त्रीणि+नभ्यानी) इसके (पृथ्वी के) परिक्रमण के दौरान कोई भाग सूर्यं के नजदीक आने दूर जाने से तीन ऋतुएं होती हैं। (क:+उ+तत्+चिकेत) इस तत्व को कौन जानता है। (तस्मिन्+साकम्+शंकव:) उस वर्ष में कीलों सी
(त्रिशता+षष्ठी: ) 300 और 60 दिन (अर्पिता) स्थापित हैं! ( न + चलाचलाशा: ) वे 360 दिन रूप कीलें कभी विचलित होने वाली नहीं हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि एक वर्षमें 360 दिन हौते हैं।

एक प्रवचन में स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था कि प्राचीन काल में दरिद्रो के घर में भी विमान थे। उपरिचर नामक राजा सदा हवा में ही फिरा करता था, पहले के लोगों को विमान रचने की विद्या भली प्रकार विदित थी


13. सेनटरीफ्युग्ल पम्प का आविष्कार भी आर्यों ने किया था। कणाद मुनि कहते हैं। कि नली से वायु निकाल देने” पर जल ऊपर चढता है। पानी निकालते जाइये पानी ऊपर चढता जाएगा ।

14. आर्यो के पास कम्पास भी था । कम्पास का सिद्धांत चुम्बक की सुई पर अवलम्बित है। वैशेषिक में कणाद मुनि लिखते हैं कि मणिगमनं सुच्यभिसपर्णमद्रष्टकारणम् अर्थात् चुम्बक की सुई की ओरे लोहे के दौडने का कारण अदृष्ट है।  यह लोह चुम्बक सुई ‘के अस्तित्त्व का प्राचीनतमृ प्रमाण है।

इसी तरह अति प्राचीन हस्तलिखित शिल्पसंहिता जो गुजरात के अणहिलपुर के जैन पुस्तकालय में है। उसमें ध्रुव मत्स्य यंत्र बनाने की विधि स्पष्ट रूप से लिखी मिलती है, उसी शिल्पसंहिता में बैरोमीटर बनाने की विधि लिखी हुई है। वहां लिखा है कि पारा, सूत और जल के योग से यह यंत्र बनता है। शिल्पसंहिता कार कहते हैं कि इस यंत्र से ग्रीष्म आदि ऋतुओं का निर्णय होता है।

15. आर्यों ने समय जानने के लिए धुपघड़ी, जलघडी और बालूघड़ी का निर्माण भी कर लिया था ज्योतिष ग्रन्थों में लिखा है की

 ‘तोययंत्रकपाल थेमंयूर नर वानरे: । ससूत्ररे वुगभेश्च सम्यकालं प्रसाधयेत्

अर्थात् जलयंत्र से समय जाना जाता है अथवा मयूर नर और मानव आकृति के यंत्र बनाकर उनमें बालू भरने और एक और का रेणु सूत्र दूसरे में गिरने से भी समय जानने का यंत्र बन जाता है।

16. आर्यों ने स्वयंवह नामक वह यंत्र बना लिया था जो गर्मी या सर्दी पाकर अमुक वेग से अपने आप चलने लगता था जिसमें पारा भरा जाता था जो तूफान या मानसून जानने का सर्वोत्तम यंत्र था।

17. ज्वार भाटा कीं बात आर्यों को ज्ञात थी। विष्णु पुराण में लिखा है कि यथार्थ में ज्वार भाटे से समुद्र का जल कम और “अघिक नहीं हो जाता। प्रत्युत अग्नि में थाली पर जल रखने से जिस प्रकार वह उमड पडता है। उसी प्रकार चन्द्रमा के आकर्षण से ज्वार भाटा होता है। अत: विलियम वेवल ज्वार भाटा सिद्धांत के जनक नहीं हैं।

18. बीजापुर के संस्कृत पुस्तकालय में सुरक्षित संस्कृत की एक प्राचीन पुस्तक में वायरलैस बनाने का वर्णन है, तभी तो शुक्रनीति में लिखा है कि राजा एक दिन में दस कोस तक की बात जाने। उपरोक्त पुस्तक में ऐसे मसाले बनाने की विधि का वर्णन भी है, जिसके उपयोग से मृत शरीर हजारों वर्ष अविकृत अवस्था में रह सकता है।

19. पुराने जमाने में ऐसा यंत्र भी बनाया जाता था जो आदमी की भांति बोलता था। विक्रमादित्य के सिंहासन की पुतलिया बराबर बोलती’ थी। रावण ने एक कृत्रिम सीता बनाई थी जो राम का नाम लेकर रोती थी अत: रोबोट भी पुराने जमाने में बनाये जाते थे।

20. आधुनिक विज्ञान बताता है कि सूर्यं आकाश गंगा के अक्षीय परिक्रमा करता है। यह बात यजुर्वेद में इस प्रकार लिखी है-‘सृर्य वर्षा आदि का कर्ता (जल -भाप-बादल-वर्ष) प्रकाशमान तेजोमय सब प्राणियों में अमृत रूप वृष्टि (किरणे) द्वारा प्रवेश (विटामिन डी आदि) करा और मूर्तिमान सब द्रव्यों को दिखाता हुआ सब लोकों के साथ आकर्षण गुण से अपनी परिधि में घूमता है किन्तु किसी लोक (पृथ्वी आदि दस ग्रह) के चारों और नहीँ घूमता।

21. कहते हैं कि वेदों मे ’भुत-प्रेतों की कथाएं हैं .लेकिन यह झूठा आरोप है। क्योंकि एक स्थान पर लिखा है कि जब गुरू का प्राणान्त हो, तब मृतक शरीर जिसका नाम प्रेत है, उसका दाह करने वाला शिष्य प्रेतहार अर्थात् मृतक को उठाने वालो के साथ दसवें दिन शुद्ध होता है। दाह होने के बाद उसका नाम भूत है। अत: जो बीत गया उसी का नाम भूत है।

22. किसी भी वैदिक साहित्य में पशुबलि या नरबलि का विधान नहीं है वेदानुसार अश्वमेध यज्ञ उसे कहते हैं जो राजा घर्मं से पालन करे, न्याय के साथ राष्ट्र में स्थिरता कायम करे। विद्या आदि प्रदान करना और जनकल्याण के लिए होम करना ही अश्वमेघ है। कृषि कर्म करना, इन्द्रियों, पृथ्वी आदि को पवित्र रखना गोमेध यज्ञ कहलाता है । यज्ञ तो हिंसा रहित होता है।


23. एक्सबायोलोजी अभिधारणा के बारे में वेद कहता है कि जिस प्रकार सूर्य-चन्द्र आदि इस लोक में हैं, अन्य लोक में भी हैं।” यह आर्यों को भली- भांति विदित है कि अर्जुन महाभारत काल में मंगल ग्रह पर गया था। अन्य लोक जहां पर जीवन है, जलवायु व वातांवरणानुसार प्राणियों के रंग, रूप व भाषा में अन्तर हो सकता है।

24. वेद का प्रत्येक शब्द योगिक है । जैसे कुरान में अकबर का नाम होने से कुरान को मुगल बादशाह अकबर के बाद का नहीँ माना जा सकता। इसी प्रकार कृष्ण, अर्जुन, भारद्वाज आदि नाम वेदों में होने से उनकों वेद से पहले नहीं माना जा सकता। वेदों के शब्द पहले के और मनुष्यों के बाद के हैं। योगिक अर्थ की एक झलक इस प्रकार है:-
भारद्वाज=मन, अर्जुन=चन्द्रमा, कृष्ण=रात्रि

25. वेदिक साहित्य में श्रद्धा से किये गये’ काम, सेवा या श्रद्धापूर्वक दान का नाम श्राद्ध लिखा है, मुर्दों का नही। माता-पित्ता आदि देवगण” ही जीवित पितर हैं” उनकी सेवा ही श्राद्ध व तर्पण हैं।” मरे हुए का श्राद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि व्यक्ति मरकर नया जन्म ले लेता है।

26. आर्यो की अभिधारणा थी कि परमात्मा एक है जो इस जग के कण-कण में व्याप्त है। जिसे विद्वान लोग अनेकों गुणवाचक नामों से पुकरते हैं। इसलिए उसकी कोई मूर्ति नहीं।

27. भारतीय संस्कृति के विकास में वेदिक आर्यों की विशेष देने सहिष्णुता और सामंजस्य की भावना, ज्ञान-विज्ञान का विकास, तपोवन पद्धति, वर्णव्यवस्था और नारियों की प्रतिष्ठा थी। पुत्रियों का उपनयन संस्कार भी होता था, वे ब्रह्मचर्यंवर्ती भी होती थीं। उम्हें यज्ञ करने का अधिकार था।

28. हडप्पा आर्यों की विकृत संस्कृति थी। हडप्पा के नगरों का नियोजन और वास्तुशिल्प उच्चकोटि के ज्यामिति के शास्त्र का प्रतिफल है, जिस प्रमेय को पाइथागोरस का प्रमेय कहा जात्ता है, उसका उल्लेख पाइथागोरस से दो हजार वर्ष पूर्व बौधायन ने अपने सुलभ सूत्र में कर दिया था। पाइथागोरस ने वह प्रमेय भारत में पढी थी। गाल्टन साहब का कथन है कि आजकल के यूरापीय लोग ज्ञान के मामले में यूनानियों के सामने हबशियो के समान हैं, तो प्रश्न यह है कि ‘भारतीयो के सामने यूनानियों का दर्जा क्या था डाक्टर आँनफील्ड लिखले है कि ”भारत वर्ष” में शिक्षा प्राप्त करने के लिए पाइथागोरस, अनकसागोरस, पिरहो और -अन्य बहुत से महाश्य आए जो बाद में यूनान के प्रसिद्ध वैज्ञानिक बनें।

29. चिकित्सा शास्त्र के जनक आर्य ही हैं। वर्तमान यूरोपीय चिकित्सा शास्त्र का आधार भी आयुर्वेद है। लार्ड एन्पिथल ने एक भाषण में कहा था कि मुझे यह निश्चय है कि आयुर्वेद भारत से अरब में और वहां से यूरोप में गया। भोज प्रबन्ध में बेहोश कर शल्यकर्म करने का उल्लेख है। ऋग्वेद में असली बाहु कट जाने पर कृत्रिम बाहु लगाते हुए देव का वर्णन आया है। ऋग्वेद में कटा हुआ सिर भी शल्य चिकित्सा से जोड़ने का विधान है। प्राचीन काल में मृत व्यक्ति की आँखें निकालं कर चक्षुहीन को लगाई जाती थी। शरीर की टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत करके युवा अवस्था को काफी समय तक बरकरार रखा जाता था । च्यवन ऋषि को तो विर्धावस्था से युवा अवस्था प्राप्त हो गयी थी। च्यवनप्राश आयुवर्धक (रीजनरेटिव) औषधि आज नहीं है ? ऋग्वेद में मानव शरीर का पंचभूतों से बनने का उल्लेख एवं एक हजार ओषधियों का वर्णन है। अथर्ववेद को वेद में भेषजा कहा गया है” इससे बडी साक्षी वेदों में औषधियों के वर्णन की और क्या होगी ? अथर्ववेद में रोगों के नाम एवं उनके लक्षणों तक का ही नहीं बल्कि मनुष्य की शरीर की 206 हडियों का वर्णन” तक है।

वेदों में Germ theory पाई जाती है! प्रो. मैकडानल ने लिखा है कि ऋगवेद तथा अथर्ववेद में अद्र्ष्ट शब्द एक प्रकार के कृमियों के लिए आया है । वेद मंत्रो में सूर्यं को ऐसे किर्मियों का नाशक कहा गया है, अथर्ववेद में तो द्रष्ट तथा अदर्ष्ट कृमियों का विस्तृत वर्णन है। वात्स्यान प्रणीत कामसूत्र में रज व वीर्यं का वैज्ञानिक विधि से विस्तृत वर्णन है। अथर्ववेद में 15 प्रकार की शल्य चिकित्सा का वर्णन है।

30. प्राचीन आर्य कृत्रिम दांतों का बनाना और लगाना तथा कृत्रिम नाक बनाकर सीना भी जानते थे! दांत उखाडने के लिए एनीपद शस्त्र का वर्णन मिलता है। मोतियाबिन्द (कैटेरेक्ट) के निकालने के लिए भी शस्त्र था। बागभट ने शल्यकर्मों के यंत्रों की संख्या 115 लिखी है। प्राचीन काल में आर्य सूक्ष्म आपरेशन करते थे। कटी हुई नाक को जोडने की विधि यूरोपियनो ने भारतीयों से सीखी।

31. वनस्पति शास्त्र के जनक भी आर्य ही हैं! हंसदेव का मृगपक्षी शास्त्र वनस्पति विज्ञान का प्रामाणिक ग्रंथ है। बागों में कृत्रिम झरने लगाये जाते थे। समरांगणसूत्रधार मॅ तो लिफ्ट का भी जिक्र है। वेद कहता है कि लता तथा पेडों के पत्ते दोनों वर्णो (सूर्यं का लाल व भूमि का रस कृष्ण वर्ण) के मेल से हरे बनते हैं।

32. 10 आषाढ शुदी 1932 वी, को अपने एक प्रवचन में स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था कि प्राचीन काल में दरिद्रो के घर में भी विमान थे। उपरिचर नामक राजा सदा हवा में ही फिरा करता था, पहले के लोगों को विमान रचने की विद्या भली प्रकार विदित थी ए.ओ हयूम जिन्होंने बाद में भारतीय कांग्रेस की स्थापना की, उन्होने स्वामी दयानन्द जी का उपहास करते हुए कहा, ’व्यक्ति का उडना गुब्बारों तक ही सीमित रह सकता है, यान बनाकर तो केवल सपनों में ही उडा जा सकता है ।’ लेकिन जब विमान का आविष्कार हुआ तो ह्यूम साहब ने बाद में उदयपुर में श्रद्धानंद जी से अपने उपहास के लिए क्षमा मांगी थी।
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Greedy Pigeon लालची कबूतर हिंदी कहानी

सरयू नदी के किनारे पीपल का एक बहुत ही पुराना पेड़ (old tree) था, सदियों पुराना पीपल का पेड़ हर यात्री के लिए तो आकर्षण था ही, किन्तु इसके साथ-साथ हजारों छोटे-बड़े पक्षी (bird) इस पीपल के पेड पर रहते थे दिन भर उड़ते हुए वे प्राणी अपने पेट की भूख मिटाते फिरते किन्तु-जेसे ही सूर्यास्त होने लगता तो वे सबके सब इस पेड़ पर बने अपने-अपने घोंसलों में आ जाते I

यंही पर इन पक्षियों का छोटा सा संसार बसा हुआ था, उन को सबसे अधिक डर उन शिकारियों से लगता था जो की उनके बसे हुए संसार को उजाड़ने के लिए आते थे,
कई बार जब भी कोई शिकारी (hunter) उस और आनिकलता तो बेचारे पक्षी डर के मारे कांपने लगते । उनके दिलों में ऐसा डर उठता कि उन्हें खाना पीना भी न लगता  ।
उन्हें यह शिकारी नहीं, मौत के फरिश्ते नजर आया करते थे । इन पक्षियों के बीच मे ही लघुपतनक नाम का एक बुद्धिमान कौआ (Intelligent Crow) अपने परिवार सहित रहता था यह कौआ बहुत तीव्र बुद्धि का था । उस वृक्ष पर रहने वाले सारे पक्षियों का पूरा-पूरा ध्यान रखना उसका कर्तव्य था ।
एक दिन- सुबह-जैसे ही कौए की आँख खुली तो उसने एक शिकारी को अपनी ओर आते देखा थोड़ी देर पश्चात उस शिकारी ने अपनी पोटली में से चावल निकाले और पास के खुले मैदान में बिखेर दिया ।
कोए ने पीपल पर रहने वाले सारे पक्षियों की एक सभा बुलाई और उन सबसे कहा- देखों मित्रों यह दुष्ट शिकारी हमारा शिकार करने आया है ,तुम सब लोग होशियार रहना शिकारी ने धरती पर सफेद चावल बिखेर कर अपना जाल फैलाया है । यह चावल नहीं हमारी मृत्यु के वारंट है, इनसे बचना इस पापी से बचना ये बातें सुनकर सभी पक्षी अपने इस साथी का धन्यवाद करने लगे ।
और साथ ही चौकस होकर उस शिकारी की ओर देखने लगे जो नदिया किनारे बेठ कर बड़े आनन्द से गाने गा रहा था ।
हर बार उस शिकारी की नजर अपने बिछाये हुए जाल की जोर ही जाती है उसे तो सुबहे किसी शिकार की तलाश थी वः सोच रहा था की यदि कोई छोटा मोटा पक्षी भी उसके जाल में फस जाए तो वह उसे भूनकर खालेगा मांसाहारी आदमी की भूख तो मॉस से मिटती हे ।
उस शिकारी को क्या पता था कि कौए ने इस वृक्ष पर रहने वाले सारे जानवरों को पहले से ही होशियार कर दिया है वह तो यही आशा लेकृर आया था कि इस पेड पर सबसे अधिक पक्षी रहते हें, इनमें से कोई ना कोई इन चावलों को देखकर फंस जाएगा ।
मगर कौए ने उसकी सारी उमीदों पर पांनी फेर दिया था कुछ देरके पश्चात आकाश पर उड़ता सफेद कबूतरों (Pigeon) का एक परिवार शिकारी ने देखा उसके मुंह में…पानी भर आया ।
आहा सफेद कबूतर काश यह जालमेँ फस जाएं I”
कबूतरों ने चावलों को धरती पर बिखरे देखा तो उनकी भूख कुछ अधिक ही तेज हो गई उन्होंने अपने राजा मोती सागर से बोला महाराज चावत देखो आज सुबह-सुबह चावल खाने को मिले आज कितना आनन्द आएगा I
कबूतरों का राजा दूर द्रिष्टि का मालिक था उसने अपने कबूतरों को चोकस करते हु कहा सावधान “हो सकता हे” ये किसी शिकारी का जाल हो सोचों इतनी दूर जंगल में ये चावल कंहाँ से आए? लेकिन उसके साथी लालच (greedy) में आकर बोले की हो सकता हे ये किसी दयालु मनुष्ये ने हमारे लिए यंहा डाले हो “सारे कबूतरों ने अपने राजा से कहा”
में फिर कहता हूँ ये जरुर किसी शिकारी की चाल हे लेकिन लालची कबूतरों (Greedy Pigeon) ने राजा की बात नही मानी और वें शिकारी के जाल में फंस गए I
लालच एक बुरी बला हे हमे अपने बुजुर्गों की हर बात सदेव माननी चाहिए 

Hindi Stories – वीर बालक स्कन्दगुप्त

Hindi Story Moral Story for KIDS
वीर बालक स्कन्दगुप्त 

हूंण, शक आदि मध्ये एशिया की मरुभूमि में रहने वाली बर्बर जातियां हें, जो वंहा पांचवी शताब्दी में थी,  हूंण और शक जाती के लोग बड़े लड़ाकू और निर्दय थे, इन लोगों ने यूरोप को अपने आक्रमणों से उजाड़ सा दिया था, रोम का बड़ा भरी राज्ये उनकी चढाईयों से नष्ट हो गया, चीन को भी अनेकों बार इन लोगों ने लुटा, ये लोग बड़ी भारी सेना लेकर जिस देश पर चढ़ जाते थे उस देश में आहाकर मच जाता था,
एक बार पता चला हूणों की सेना हिमालये के उस पर भारत पर आक्रमण करने के लिए इकठ्ठी हो रही हे, उस समय भारत में मगध बड़ा राज्ये था, वंहा का सम्राट कुमारगुप्त था, उनके पुत्र स्कन्दगुप्त उस समय तरुण नही हुए थे, हूणों की सेना का एकत्रित होने का जेसे ही समाचार स्कन्दगुप्त को मिला वो तुरंत अपने पितासे मिलने गए, सम्राट कुमारगुप्त अपने मंत्रियों के साथ हूणों से युद्ध करने की सलहा कर रहे थे, स्कन्दगुप्त ने पितासे कहा की में भी युद्ध करने जाऊंगा,
महाराज कुमारगुप्त ने बहूत समझाया की हूण बहूत ही पराक्रमी और निर्दयी होते हें, वें अधर्म पूर्वक छिप कर भी लड़ते हें, और उनकी संख्या भी अधिक हे, उनसे लड़ना तो मिर्त्यु से ही लड़ना हे,
लेकिन युवराज स्कन्दगुप्त एसी बातों से डरने वाले नही थे, युवराज ने कहा की पिताजी देश और धर्म की रक्षा के लिए शत्रिये का मरजाना तो बड़े गर्व की बात हें, में मिर्त्यु से लडूंगा और देश को उन अत्याचारियों से बचाऊंगा, महाराज ने अपने पुत्रको सिने से लगा लिया, और युवराज को युद्ध में जाने की आगया दी, युवराज अपने साथ 2 लाख वीर सेनिकों की सेना लेकर पटना से चलकर पंजाब से होकर हिमालये की बर्फ से ढकी चोटियों पर चढ़ गये
हूणों ने ये कभी नही सोचा था की कोई उनपर भी आक्रमण कर सकता हे, जब हूणों ने पर्वत की चोटियों से उतरते हुए सेनिकों को देखा तो वो भी युद्ध के लिए अपने सेनिकों को तयार करने लगे,
युद्ध आरम्भ हुआ और वीर युवराज जिधर से भी गुजरते हूणों की लाशों के ढेर लगा देते, थोड़ी देर के युद्ध से ही हूणों की हिमत टूट गयी, और उनकी सेना में भगदड़ मच गयी पूरी हूण सेना भाग खड़ी हुई, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके जब युवराज भारत वापस लोटे तो लाखों की संख्या में लोग उनके स्वागत के लिए खड़े थे, पुरे देश में उस दिन उनके स्वागत में उत्सव मनाया गया,
यही युवराज स्कन्दगुप्त आगे जाकर भारत के सम्राट हुए, आजके ईरान और अफगानिस्तान तक इन्होने अपने सम्राज्य का विस्तार कर लिया था, इनके जेसा वीर पराक्रमी भारत को छोड़ और किसी देश के इतिहाश में मिलना कठिन हें, इन्होने दिग्विजय करके अश्वमेघ यग किया था, वीर होने के साथ साथ ये धर्मात्मा, दयालु, और न्यायी सम्राट हुए थे,