Category Archives: देश भगत राजीव भाई

education (शिक्षा) के क्षेत्र मे Bharat और India का अंतर:

शिक्षा के क्षेत्र मे भारत और इंडिया का अंतर: @[466243806766675:274:राजीव दीक्षित Rajiv Dixit]---------------------------------------------------------------------------------भारत मे: प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित था, प्रत्येक गाँव मे पाठशाला थी, पड़ने वाले और पड़ाने वालों मे 50% से अधिक शुद्र थे, सेर्जेरी की शिक्षा नाइ जाती के लिए, आर्किटेक्चर की शिक्षा कुम्हार के लिए, इस्पात लकड़ी, उद्योग की शिक्षा लुहार और सुथार जाती, एवं वस्त्र उद्योग की शिक्षा जुलाहा जाती को दी जाती थी|इंडिया मे (मेकोले की शिक्षा नीति): पड़े लिखे कम है, पड़े लिखों मे भी शिक्षित तो बहुत हि कम है, आरक्षण के नाम पर नेता शिक्षा के अन्दर घुसपैठ कर उसका सत्यानाश कर रहे है|--------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: विश्वभर से विद्यार्थी भारत के गुरुकुल मे पड़ने को अपने जीवन का सौभाग्य मानते थे और यहाँ पड़ने के लिए लालायित रहते थे|इंडिया मे: विद्यार्थी विदेश मे पड़ कर गर्व महसूस कर रहे है, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशो मे मार खाकर भी स्वाभिमान शून्य एक भी विद्यार्थी वापस अपने राष्ट्र नहीं लौटा और ना हि वहिष्कार करते है विदेशी शिक्षा का|-------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: गुरु गुरुकुल चलाते थे समाज का सबसे प्रबुद्ध वर्ग उन्हें शिक्षा देता था|इंडिया मे: स्कूलों मे नौकर रखें जाते हैं, जो टीचर का कार्य करते है, नौकर किसी को मालिक बनने का ज्ञान कैसे दे सकता है ? इसलिए यहाँ पड़ा लिखा व्यक्ति मानसिक रूप से गुलाम है नौकरी को हि श्रेष्ट समझता है|---------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: प्रधानमंत्री के पद से भी आचार्य का पड़ अधिक महत्व का माना जाता था (उदः आचार्य चाणक्य) जब आवश्यकता होती थी तो आचार्यो से प्रधानमंत्री बनने के लिए निबेदन होता था|इंडिया मे: शिक्षक अब टीचर हो गए है और पद भी मामूली, एक शिक्षक राष्ट्रपति बन जाता है तो उसे शिक्षक दिवस के रूप मे याद किया जाता है|--------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: पात्रता के आधार पर शिक्षा दी जाती थी, यह पात्रता सत्य-रज-तम और बात-पित्त-कफ के आधार पर तय होती थी और भारत का शिक्षक बिकाऊ नही होता था|इंडिया मे: शिक्षा पात्र-कुपात्र मे भेद के बिना, इंडिया का शिक्षित बिकाऊ है, अमिताभ, शाहरुख़ खान, आमिर खान, दारासिंह जैसे इंडिया के प्रिय भांड धन के लिए उनके चाहने वालों को जहर बेचने से भी नही हिचकते है कोई कोला बेच रहा है तो कोई अंडे खाने का प्रचार कर रहा है तो कोई मांस खाने के फायदे गिना रहा है|-------------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: शिक्षा के बदले मे गुरुदक्षिना दी जाती थी, यहाँ गुरु शिष्य संबंध प्रमुख था, धन गौण होता था|इंडिया मे: पैसे के बदले मे शिक्षा दी जाती है, रोज के ७०-८० करोड़ रूपए के विज्ञापन कमाई करने के लिए छपते है, गुरु शिष्य संबंध गौण है|--------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: समाज की प्रगति के लिए शिक्षा दी जाती है|इंडिया मे: कंपनियों के प्रगति के लिए शिक्षा दी जाती है, शेक्षिक काल खत्म होते हि कंपनियाँ इन पड़े लिखे पशुओं को खरीदने पोहुँच जाती है, और बोली लगाती है|----------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: गुरुकुल में सदाचार सम्पन्न आचार्यों से ब्रह्मचर्य धारण कर शिक्षा ग्रहण करते है|इंडिया मे: घर के भोगमय बातावरण, या हॉस्टल के कमरे की दीवारें भांडो की तस्वीरों से ढकी रहती है या शाम को फिल्म और मजे करना, यही मूल उदेश्य है|----------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: प्राकृतिक वातावरण मे ज्ञान की साधना होती है|इंडिया मे: अप्राकृतिक वातावरण में नर्सरी, किंडर गार्डन खोले जाते है, किताबों से गाय, बकरी, फुल, फल, सूर्य, चद्रमा समझाए जाते है इस ‘सेकंड-हैण्ड’ जानकारी को ज्ञान कहते है, और पेड़ के निचे बैठकर शिक्षा को सुविधाओं का और पिछड़ेपन का प्रतिक माना जाता है|----------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: गुरु केन्द्रित के साथ हि शिष्य केन्द्रित शिक्षा पद्धति थी|indiaइंडिया मे: केवल विषय केन्द्रित शिक्षा पद्धति|-----------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: पुरुषो को समाज की प्रगति की और स्त्रियों को प्रगति को स्थिरता प्रदान करने की शिक्षा दी जाती थी जैसे चलते समय एक पैर स्थिर रहता है|indiइंडिया मे: दोनों को एक सी शिक्षा दी जाती है जैसे दोनों पैर एक साथ बढाने पर जो दुर्गति होती है वैसे हि गति हो रही है|----------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: भारत मे शिक्षा आधारित परीक्षा होती थी|indiaइंडिया मे: यहाँ परीक्षा आधारित शिक्षा होती है|--------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: भारतीय शिक्षा का मनोविज्ञान त्रिगुण (सत्व-रज-तम) और प्रकृति (वात-पित्त-कफ) पर आधारित था – सत्य गुण का विकास, रजोगुण का नियंत्रण और तमोगुण का दमन शिक्षा के द्वारा साधा जाता था|इंडिया मे: इंडिया की शिक्षा का मनोविज्ञान व्यवहार पर आधारित है|-------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: प्रारम्भिक स्तर पर अपने आसपास की प्रकृति को समझने की शिक्षा दी जाती है|इंडिया मे: प्रारम्भिक स्तर पर देशी विदेशी पृथ्वी आकाश पाताल सबका भूगोल पड़ाया जाता है लेकिन दैनिक जीवन मे सर्वाधिक उपयोगी गाँव व जिले का भूगोल नहीं पड़ाया जाता है|--------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: आज की तरह इतिहास की शिक्षा नहीं होती, लेकिन लोगों को अपने पूर्वजों के बारे मे ज्ञान था|इंडिया मे: अंग्रेजो द्वारा भारत के स्वाभिमान को भंग करने के लिए लिखा गया मनघडन्त इतिहास पड़ाया जा रहा है, अंग्रेजो के सुधार कार्य (?) और बलात्कारी बादशाहों की लोरियां हि इतिहास मे मिलती है|------------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: मातृभाषा और अधिकतर राष्ट्रभाषा संस्कृत मे हि शिक्षा दी जाती थी, भाषा केवल व्यक्ति की अभिव्यक्ति का साधन हि नही यह संस्कृति व परंपरा के संरक्षण का भी साधन है|इंडिया मे: विदेशी भाषा अंग्रेजी मे शिक्षा दी जाती है हमारी संस्कृति के हजारो शब्द है जिनका अनुवाद अंग्रेजी नहीं कर सकती जैसे प्राण, प्रजा, यज्ञ, सती, सत्य-रज-तम, गलत अनुवाद धर्म – रिलिजन, विवाह-मेरिज, कृषि- एग्रीकल्चर, मक्खन-बटर, दर्शन- फिलोसोफी, तत्व-एलिमेंट, रसायन-केमिकल आदि ने बहुत नुकसान पहुँचाया इससे लोग ऋषि संस्कृति से कटकर आसुरी संस्कृति के प्रभाव मे फंस गया|-------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: प्रगति का विज्ञानं पड़ाया जाता है| इंडिया मे: दुर्गति का विज्ञानं पड़ाया जाता है|--------------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: अर्थशास्त्र पड़ाया जाता है|इंडिया मे: अनर्थशात्र पड़ाया जाता है, अर्थ शास्त्र पड़कर भी कितने हि छात्र उनकी बराबरी नही कर सकते जो कड़ी धुप मे मेहनत से बड़ा व्यापार खड़ा कर देते है जो कम पड़े लिखे होते है एमबीए धरी कम पड़े लिखों के निचे एडियाँ रगड़ते है|-------------------------------------------------------------------------------------भारत मे: हमारे समाज की मूल्यों की शिक्षा दी जाती है|इंडिया मे: भारत के मूल्यों की खिल्ली दी जाने वाली राष्ट्रद्रोही, बामपंथियों से भरी सोच और शिक्षा दी जाती है|-----------------------------------------------------------------------------------भारत मे: काम शिक्षा का उदेश्य था – काम उर्जा को ऊपर उठाकर पुस्तकीय ज्ञान से श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति, विवेक से काम के आवेश से मुक्त होना, संभव न हो तो गृहस्थ आश्रम मे प्रवेश कर काम सुख को भोग, उसकी क्षण भंगुरता का अनुभव कर शाश्वत सुख (प्रेम, भक्ति, ध्यान, समाधि की और बढना); श्रेष्ट संतान की प्राप्ति|इंडिया मे: यौन शिक्षा का उदेश्य है इंडिया की पश्चिम की तरह व्यभिचारी देश बनाना, ब्रह्मचर्य भंग करने, सुरक्षित यौन करने, यौन संबंधो के व्यावहारिक अनुभवों के लिए प्ररित करने वाली शिक्षा दी जाती है; क्या आपने कभी ‘नोट’ किया कभी मीडिया ने यह विषय उठाया या सरकार ने कही इन्टरनेट पर अश्लील सामग्री, विडियो पर प्रतिबंध लगे ? नहीं ! मेकोले यही चाहता था|


education (शिक्षा) के क्षेत्र मे Bharat और India का अंतर: राजीव दीक्षित Rajiv Dixit
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भारत मे: प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित था, प्रत्येक गाँव मे School थे , पड़ने वाले और पड़ाने वालों मे 50% से अधिक शुद्र थे, सेर्जेरी की शिक्षा नाइ जाती के लिए, आर्किटेक्चर की शिक्षा कुम्हार के लिए, इस्पात लकड़ी, उद्योग की शिक्षा लुहार और सुथार जाती, एवं वस्त्र उद्योग की शिक्षा जुलाहा जाती को दी जाती थी|
इंडिया मे (मेकोले की शिक्षा नीति): पड़े लिखे कम है, पड़े लिखों मे भी शिक्षित तो बहुत हि कम है, आरक्षण के नाम पर नेता शिक्षा के अन्दर घुसपैठ कर उसका सत्यानाश कर रहे है|
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भारत मे: विश्वभर से विद्यार्थी भारत के गुरुकुल मे पड़ने को अपने जीवन का सौभाग्य मानते थे और यहाँ पड़ने के लिए लालायित रहते थे|
इंडिया मे: विद्यार्थी विदेश मे पड़ कर गर्व महसूस कर रहे है, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशो मे मार खाकर भी स्वाभिमान शून्य एक भी विद्यार्थी वापस अपने राष्ट्र नहीं लौटा और ना हि वहिष्कार करते है विदेशी शिक्षा का|
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भारत मे: गुरु गुरुकुल चलाते थे समाज का सबसे प्रबुद्ध वर्ग उन्हें शिक्षा देता था|
इंडिया मे: स्कूलों मे नौकर रखें जाते हैं, जो टीचर का कार्य करते है, नौकर किसी को मालिक बनने का ज्ञान कैसे दे सकता है ? इसलिए यहाँ पड़ा लिखा व्यक्ति मानसिक रूप से गुलाम है नौकरी को हि श्रेष्ट समझता है|
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भारत मे: प्रधानमंत्री के पद से भी आचार्य का पड़ अधिक महत्व का माना जाता था (उदः आचार्य चाणक्य) जब आवश्यकता होती थी तो आचार्यो से प्रधानमंत्री बनने के लिए निबेदन होता था|
इंडिया मे: शिक्षक अब टीचर हो गए है और पद भी मामूली, एक शिक्षक राष्ट्रपति बन जाता है तो उसे शिक्षक दिवस के रूप मे याद किया जाता है|
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भारत मे: पात्रता के आधार पर शिक्षा दी जाती थी, यह पात्रता सत्य-रज-तम और बात-पित्त-कफ के आधार पर तय होती थी और भारत का शिक्षक बिकाऊ नही होता था|
इंडिया मे: शिक्षा पात्र-कुपात्र मे भेद के बिना, इंडिया का शिक्षित बिकाऊ है, अमिताभ, शाहरुख़ खान, आमिर खान, दारासिंह जैसे इंडिया के प्रिय भांड धन के लिए उनके चाहने वालों को जहर बेचने से भी नही हिचकते है कोई कोला बेच रहा है तो कोई अंडे खाने का प्रचार कर रहा है तो कोई मांस खाने के फायदे गिना रहा है|
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भारत मे: शिक्षा के बदले मे गुरुदक्षिना दी जाती थी, यहाँ गुरु शिष्य संबंध प्रमुख था, धन गौण होता था|
इंडिया मे: पैसे के बदले मे शिक्षा दी जाती है, रोज के ७०-८० करोड़ रूपए के विज्ञापन कमाई करने के लिए छपते है, गुरु शिष्य संबंध गौण है|
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भारत मे: समाज की प्रगति के लिए शिक्षा दी जाती है|
इंडिया मे: कंपनियों के प्रगति के लिए शिक्षा दी जाती है, शेक्षिक काल खत्म होते हि कंपनियाँ इन पड़े लिखे पशुओं को खरीदने पोहुँच जाती है, और बोली लगाती है|
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भारत मे: गुरुकुल में सदाचार सम्पन्न आचार्यों से ब्रह्मचर्य धारण कर शिक्षा ग्रहण करते है|
इंडिया मे: घर के भोगमय बातावरण, या हॉस्टल के कमरे की दीवारें भांडो की तस्वीरों से ढकी रहती है या शाम को फिल्म और मजे करना, यही मूल उदेश्य है|
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भारत मे: प्राकृतिक वातावरण मे ज्ञान की साधना होती है|
इंडिया मे: अप्राकृतिक वातावरण में नर्सरी, किंडर गार्डन खोले जाते है, किताबों से गाय, बकरी, फुल, फल, सूर्य, चद्रमा समझाए जाते है इस ‘सेकंड-हैण्ड’ जानकारी को ज्ञान कहते है, और पेड़ के निचे बैठकर शिक्षा को सुविधाओं का और पिछड़ेपन का प्रतिक माना जाता है|
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भारत मे: गुरु केन्द्रित के साथ हि शिष्य केन्द्रित शिक्षा पद्धति थी|
indiaइंडिया मे: केवल विषय केन्द्रित शिक्षा पद्धति|
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भारत मे: पुरुषो को समाज की प्रगति की और स्त्रियों को प्रगति को स्थिरता प्रदान करने की शिक्षा दी जाती थी जैसे चलते समय एक पैर स्थिर रहता है|
indiइंडिया मे: दोनों को एक सी शिक्षा दी जाती है जैसे दोनों पैर एक साथ बढाने पर जो दुर्गति होती है वैसे हि गति हो रही है|
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भारत मे: भारत मे शिक्षा आधारित परीक्षा होती थी|
indiaइंडिया मे: यहाँ परीक्षा आधारित शिक्षा होती है|
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भारत मे: भारतीय शिक्षा का मनोविज्ञान त्रिगुण (सत्व-रज-तम) और प्रकृति (वात-पित्त-कफ) पर आधारित था – सत्य गुण का विकास, रजोगुण का नियंत्रण और तमोगुण का दमन शिक्षा के द्वारा साधा जाता था|
इंडिया मे: इंडिया की शिक्षा का मनोविज्ञान व्यवहार पर आधारित है|
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भारत मे: प्रारम्भिक स्तर पर अपने आसपास की प्रकृति को समझने की शिक्षा दी जाती है|
इंडिया मे: प्रारम्भिक स्तर पर देशी विदेशी पृथ्वी आकाश पाताल सबका भूगोल पड़ाया जाता है लेकिन दैनिक जीवन मे सर्वाधिक उपयोगी गाँव व जिले का भूगोल नहीं पड़ाया जाता है|
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भारत मे: आज की तरह इतिहास की शिक्षा नहीं होती, लेकिन लोगों को अपने पूर्वजों के बारे मे ज्ञान था|
इंडिया मे: अंग्रेजो द्वारा भारत के स्वाभिमान को भंग करने के लिए लिखा गया मनघडन्त इतिहास पड़ाया जा रहा है, अंग्रेजो के सुधार कार्य (?) और बलात्कारी बादशाहों की लोरियां हि इतिहास मे मिलती है|
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भारत मे: मातृभाषा और अधिकतर राष्ट्रभाषा संस्कृत मे हि शिक्षा दी जाती थी, भाषा केवल व्यक्ति की अभिव्यक्ति का साधन हि नही यह संस्कृति व परंपरा के संरक्षण का भी साधन है|
इंडिया मे: विदेशी भाषा अंग्रेजी मे शिक्षा दी जाती है हमारी संस्कृति के हजारो शब्द है जिनका अनुवाद अंग्रेजी नहीं कर सकती जैसे प्राण, प्रजा, यज्ञ, सती, सत्य-रज-तम, गलत अनुवाद धर्म – रिलिजन, विवाह-मेरिज, कृषि- एग्रीकल्चर, मक्खन-बटर, दर्शन- फिलोसोफी, तत्व-एलिमेंट, रसायन-केमिकल आदि ने बहुत नुकसान पहुँचाया इससे लोग ऋषि संस्कृति से कटकर आसुरी संस्कृति के प्रभाव मे फंस गया|
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भारत मे: प्रगति का विज्ञानं पड़ाया जाता है|
इंडिया मे: दुर्गति का विज्ञानं पड़ाया जाता है|
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भारत मे: अर्थशास्त्र पड़ाया जाता है|
इंडिया मे: अनर्थशात्र पड़ाया जाता है, अर्थ शास्त्र पड़कर भी कितने हि छात्र उनकी बराबरी नही कर सकते जो कड़ी धुप मे मेहनत से बड़ा व्यापार खड़ा कर देते है जो कम पड़े लिखे होते है एमबीए धरी कम पड़े लिखों के निचे एडियाँ रगड़ते है|
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भारत मे: हमारे समाज की मूल्यों की शिक्षा दी जाती है|
इंडिया मे: भारत के मूल्यों की खिल्ली दी जाने वाली राष्ट्रद्रोही, बामपंथियों से भरी सोच और शिक्षा दी जाती है|
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भारत मे: काम शिक्षा का उदेश्य था – काम उर्जा को ऊपर उठाकर पुस्तकीय ज्ञान से श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति, विवेक से काम के आवेश से मुक्त होना, संभव न हो तो गृहस्थ आश्रम मे प्रवेश कर काम सुख को भोग, उसकी क्षण भंगुरता का अनुभव कर शाश्वत सुख (प्रेम, भक्ति, ध्यान, समाधि की और बढना); श्रेष्ट संतान की प्राप्ति|
इंडिया मे: यौन शिक्षा का उदेश्य है इंडिया की पश्चिम की तरह व्यभिचारी देश बनाना, ब्रह्मचर्य भंग करने, सुरक्षित यौन करने, यौन संबंधो के व्यावहारिक अनुभवों के लिए प्ररित करने वाली शिक्षा दी जाती है; क्या आपने कभी ‘नोट’ किया कभी मीडिया ने यह विषय उठाया या सरकार ने कही इन्टरनेट पर अश्लील सामग्री, विडियो पर प्रतिबंध लगे ? नहीं ! मेकोले यही चाहता था|

Gau mata के गोबर और मूत्र से पूरे गाँव को निशुल्क गैस


Gau mata के गोबर और मूत्र का उपयोग करके दिलावर सिंह जी दे रहे है पूरे गाँव को निशुल्क गैस ……राजीव दीक्षित Rajiv Dixit


120 गायों से दूध की डेयरी चलाने वाले दिलावर सिंह ने गोबर और मूत्र से Gobar Gas (गोबर गैस) को पूरे गाँव में पाइप लाइन के जरिये भेजकर पूरे गाँव को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना दिया /…. और उन्हें 
gas cylinder के दाम बढ़ने का डर भी नहीं सताता

ये कार्य अगर हर गाँव में हो जाये तो हमें रसोई गैस के लिए अरब देशो के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा

Bharat.. देश में चल रहे गुप्त षड्यंत्र को समझने के लिए कृपया पांच मिनट हमें दीजिए !

Bharat देश में चल रहे गुप्त षड्यंत्र को समझने के लिए कृपया पांच मिनट हमें दीजिए !
लेख से पहले आपको एक सच्ची कहानी सुनाना चाहता हूँ।

हमारे देश में एक महान scientist हुए हैं प्रो. श्री जगदीश चन्द्र बोस। भारत
को और हम भारत वासियों को उन पर बहुत गर्व है। इन्होने सबसे पहले

अपने शोध से यह निष्कर्ष निकाला कि मानव की तरह पेड़ पौधों में भी भावनाएं
होती हैं। वे भी हमारी तरह हँसते खिलखिलाते और रोते हैं। उन्हें भी

सुख दुःख का अनुभव होता है। और श्री बोस के इस अनुसंधान की तरह इसकी कहानी भी
बड़ी दिलचस्प है।

श्री बोस ने शोध के लिये कुछ गमले खरीदे और उनमे कुछ पौधे लगाए। अब इन्होने
गमलों को दो भागों में बांटकर आधे घर के एक कोने में तथा शेष

को किसी अन्य कोने में रख दिया। दोनों को नियमित रूप से पानी दिया, खाद डाली।
किन्तु एक भाग को श्री बोस रोज़ गालियाँ देते कि तुम बेकार हो,

निकम्मे हो, बदसूरत हो, किसी काम के नहीं हो, तुम धरती पर बोझ हो, तुम्हे तो
मर जाना चाहिए आदि आदि। और दूसरे भाग को रोज़ प्यार से

पुचकारते, उनकी तारीफ़ करते, उनके सम्मान में गाना गाते। मित्रों देखने से यह
घटना साधारण सी लगती है। किन्तु इसका प्रभाव यह हुआ कि जिन

पौधों को श्री बोस ने गालियाँ दी वे मुरझा गए और जिनकी तारीफ़ की वे खिले खिले
रहे, पुष्प भी अच्छे दिए।

तो मित्रों इस साधारण सी घटना से बोस ने यह सिद्ध कर दिया कि किस प्रकार से
गालियाँ खाने के बाद पेड़ पौधे नष्ट हो गए। अर्थात उनमे भी भावनाएं हैं।

मित्रों जब निर्जीव से दिखने वाले सजीव पेड़ पौधों पर अपमान का इतना
दुष्प्रभाव पड़ता है तो मनुष्य सजीव सदेह का क्या होता होगा?

वही होता है जो आज हमारे भारत देश का हो रहा है।

500 -700 वर्षों से हमें यही सिखाया पढाया जा रहा है कि तुम बेकार हो, खराब
हो, तुम जंगली हो, तुम तो हमेशा लड़ते रहते हो, तुम्हारे अन्दर सभ्यता

नहीं है, तुम्हारी कोई संस्कृती नहीं है, तुम्हारा कोई दर्शन नहीं है,
तुम्हारे पास कोई गौरवशाली इतिहास नहीं है, तुम्हारे पास कोई ज्ञान विज्ञान
नहीं है

आदि आदि। मित्रों अंग्रेजों के एक एक अधिकारी भारत आते गए और भारत व भारत
वासियों को कोसते गए। अंग्रजों से पहले ये गालियाँ हमें फ्रांसीसी

 देते थे, और फ्रांसीसियों से पहले ये गालियाँ हमें पुर्तगालियों ने दीं। इसी
क्रम में लॉर्ड मैकॉले का भी भारत में आगमन हुआ। किन्तु मैकॉले की नीति

कुछ अलग थी। उसका विचार था कि एक एक अंग्रेज़ अधिकारी भारत वासियों को कब तक
कोसता रहेगा?

कुछ ऐसी परमानेंट व्यवस्था करनी होगी

कि हमेशा भारत वासी खुद को नीचा ही देखें और हीन भावना से ग्रसित रहें।

इसलिए उसने जो व्यवस्था दी उसका नाम रखा Education System. सारा सिस्टम उसने
ऐसा रचा कि भारत वासियों को केवल वह सब कुछ पढ़ाया

जाए जिससे वे हमेशा गुलाम ही रहें। और उन्हें अपने धर्म संस्कृती से घृणा हो जाए।
 
इस शिक्षा में हमें यहाँ तक पढ़ाया कि भारत वासी सदियों से

गौमांस का भक्षण कर रहे हैं। ( जबकि गोमांस भक्षण योग में खेचरी मुद्रा को कहतें हें )
अब आप ही सोचे यदि भारत वासी सदियों से गाय का
मांस खाते थे तो आज के हिन्दू ऐसा क्यों नहीं करते?

और इनके द्वारा दी गयी सबसे गंदी गाली यह है कि हम भारत वासी आर्य बाहर से आये थे।
आर्यों ने भारत के मूल द्रविड़ों पर आक्रमण करके उन्हें दक्षिण तक

खदेड़ दिया और सम्पूर्ण भारत पर अपना कब्ज़ा ज़मा लिया। और हमारे देश के
वामपंथी चिन्तक आज भी इसे सच साबित करने के प्रयास में लगे हैं।

इतिहास में हमें यही पढ़ाया गया कि कैसे एक राजा ने दूसरे राजा पर आक्रमण
किया। इतिहास में केवल राजा ही राजा हैं प्रजा नदारद है, हमारे ऋषि

मुनि नदारद हैं। और राजाओं की भी बुराइयां ही हैं अच्छाइयां गायब हैं। आप जरा
सोचे कि अगर इतिहास में केवल युद्ध ही हुए तो भारत तो हज़ार साल

पहले ही ख़त्म हो गया होता।

और राजा भी कौन कौन से गजनी, तुगलक, ऐबक, लोदी,
तैमूर, बाबर, अकबर, सिकंदर जो कि भारतीय थे ही नहीं। ( सब के सब लुटेरे थे )

राजा विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान गायब हैं। इनका
ज़िक्र तो इनके आक्रान्ता के सम्बन्ध में आता है। जैसे सिकंदर की कहानी

में चन्द्रगुप्त का नाम है। चन्द्रगुप्त का कोई इतिहास नहीं पढ़ाया गया। और यह
सब आज तक हमारे पाठ्यक्रमों में है।

इसी प्रकार अर्थशास्त्र का विषय है। आज भी अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाले
बड़े बड़े विद्वान् विदेशी अर्थशास्त्रियों को ही पढ़ते हैं।

भारत का सबसे  बड़ा अर्थशास्त्री Chanakya तो कही है ही नहीं।
उनका एक भी सूत्र किसी स्कूल में भी बच्चों को नहीं पढ़ाया जाता।
जबकि उनसे बड़ा अर्थशास्त्री तो पूरी दुनिया
में कोई नहीं हुआ।

Plastic Surgery इसका अविष्कार भारत मे हुआ है|


अगर आप पूरी पोस्ट नही पड़ सकते तो यहाँ Click करें: राजीव दीक्षित Rajiv Dixit
http://www.youtube.com/watch?v=ZO-bpE9NYUA

Plastic Surgery जो आज की Surgery की दुनिया मे आधुनिकतम विद्या है इसका अविष्कार भारत मे हुअ है| सर्जरी का अविष्कार तो हुआ ही  है Plastic Surgery का अविष्कार भी यहाँ हि हुआ है| प्लास्टिक सर्जरी मे कहीं की त्वचा  को काट के कहीं लगा देना और उसको इस तरह से लगा देना की पता हि न चले यह विद्या सबसे पहले दुनिया को भारत ने दी है|

1780 मे दक्षिण भारत के कर्णाटक राज्य के एक बड़े भू भाग का राजा था हयदर अली| 1780-84 के बीच मे अंग्रेजों ने हयदर अली के ऊपर कई बार हमले किये और एक हमले का जिक्र एक अंग्रेज की डायरी मे से मिला है| एक अंग्रेज का नाम था कोर्नेल कूट उसने हयदर अली पर हमला किया पर युद्ध मे अंग्रेज परास्त हो गए और हयदर अली ने कोर्नेल कूट की नाक काट दी|

कोर्नेल कूट अपनी डायरी मे लिखता है के “मैं पराजित हो गया, सैनिको ने मुझे बन्दी बना लिया, फिर मुझे हयदर अली के पास ले गए और उन्होंने मेरा नाक काट दिया|” फिर कोर्नेल कूट लिखता है के “मुझे घोडा दे दिया भागने के लिए नाक काट के हात मे दे दिया और कहा के भाग जाओ तो मैं घोड़े पे बैठ के भागा| भागते भागते मैं बेलगाँव मे आ गया, बेलगाँव मे एक वैद्य ने मुझे देखा और पूछा मेरी नाक कहाँ कट गयी? तो मैं झूट बोला के किसीने पत्थर मार दिया, तो वैद्य ने बोला के यह पत्थर मारी हुई नाक नही है यह तलवार से काटी हुई नाक है, मैं वैद्य हूँ मैं जानता हूँ| तो मैंने वैद्य से सच बोला के मेरी नाक काटी गयी है| वैद्य ने पूछा किसने काटी? मैंने बोला तुम्हारी राजा ने काटी| वैद्य ने पूछा क्यों काटी तो मैंने बोला के उनपर हमला किया इसलिए काटी| फिर वैद्य बोला के तुम यह काटी हुई नाक लेके क्या करोगे? इंग्लैंड जाओगे? तो मैंने बोला इच्छा तो नही है फिर भी जाना हि पड़ेगा|”

यह सब सुनके वो दयालु वैद्य कहता है के मैं तुम्हारी नाक जोड़ सकता हूँ, कोर्नेल कूट को पहले विस्वास नही हुआ, फिर बोला ठीक  है जोड़ दो तो वैद्य बोला तुम मेरे घर चलो| फिर वैद्य ने कोर्नेल को ले गया और उसका ऑपरेशन किया और इस ऑपरेशन का तिस पन्ने मे वर्णन है| ऑपरेशन सफलता पूर्वक संपन्न हो गया नाक उसकी जुड़ गयी, वैद्य जी ने उसको एक लेप दे दिया बनाके और कहा की यह लेप ले जाओ और रोज सुबह शाम लगाते रहना| वो लेप लेके चला गया और 15-17 दिन के बाद बिलकुल नाक उसकी जुड़ गयी और वो जहाज मे बैठ कर लन्दन चला गया|

फिर तिन महीने बाद ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे खड़ा हो कोर्नेल कूट भाषण दे रहा है और सबसे पहला सवाल पूछता है सबसे के आपको लगता है के मेरी नाक कटी हुई है? तो सब अंग्रेज हैरान होक कहते है अरे नही नही तुम्हारी नाक तो कटी हुई बिलकुल नही दिखती| फिर वो कहानी सुना रहा है ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे के मैंने हयदर अली पे हमला किया था मैं उसमे हार गया उसने मेरी नाक काटी फिर भारत के एक वैद्य ने मेरी नाक जोड़ी और भारत की वैद्यों के पास इतनी बड़ी हुनर है इतना बड़ा ज्ञान है की वो काटी हुई नाक को जोड़ सकते है|

फिर उस वैद्य जी की खोंज खबर ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे ली गयी, फिर अंग्रेजो का एक दल आया और बेलगाँव की उस वैद्य को मिला, तो उस वैद्य ने अंग्रेजो को बताया के यह काम तो भारत के लगभग हर गाँव मे होता है; मैं एकला नहीं हूँ ऐसा करने वाले हजारो लाखों लोग है| तो अंग्रेजों को हैरानी हुई के कोन सिखाता है आपको ? तो वैद्य जी कहने लगे के हमारे इसके गुरुकुल चलते है और गुरुकुलों मे सिखाया जाता है|

फिर अंग्रेजो ने उस गुरुकुलों मे गए उहाँ उन्होंने एडमिशन लिया, विद्यार्थी के रूप मे भारती हुए और सिखा, फिर सिखने के बाद इंग्लॅण्ड मे जाके उन्होंने प्लास्टिक सर्जरी शुरू की| और जिन जिन अंग्रेजों ने भारत से प्लास्टिक सर्जरी सीखी है उनकी डायरियां हैं| एक अंग्रेज अपने डायरी मे लिखता है के ‘जब मैंने पहली बार प्लास्टिक सर्जरी सीखी, जिस गुरु से सीखी वो भारत का विशेष आदमी था और वो नाइ था जाती का| मने जाती का नाइ, जाती का चर्मकार या कोई और हमारे यहाँ ज्ञान और हुनर के बड़े पंडित थे| नाइ है, चर्मकार है इस आधार पर किसी गुरुकुल मे उनका प्रवेश वर्जित नही था, जाती के आधार पर हमारे गुरुकुलों मे प्रवेश नही हुआ है, और जाती के आधार पर हमारे यहाँ शिक्षा की भी व्यवस्था नही था| वर्ण व्यवस्था के आधार पर हमारे यहाँ सबकुछ चलता रहा| तो नाइ भी सर्जन है चर्मकार भी सर्जन है| और वो अंग्रेज लिखता है के चर्मकार जादा अच्छा  सर्जन इसलिए हो सकता है की उसको चमड़ा सिलना सबसे अच्छे तरीके से आता है|

एक अंग्रेज लिख रहा है के ‘मैंने जिस गुरु से सर्जरी सीखी वो जात का नाइ था और सिखाने के बाद उन्होंने मुझसे एक ऑपरेशन करवाया और उस ऑपरेशन की वर्णन है| 1792 की बात है एक मराठा सैनिक की दोनों हात युद्ध मे कट गए है और वो उस वैद्य गुरु के पास कटे हुए हात लेके आया है जोड़ने के लिए| तो गुरु ने वो ऑपरेशन उस अंग्रेज से करवाया जो सिख रहा था, और वो ऑपरेशन उस अंग्रेज ने गुरु के साथ मिलके बहुत सफलता के साथ पूरा किया| और वो अंग्रेज जिसका नाम डॉ थॉमस क्रूसो था अपनी डायरी मे कह रहा है के “मैंने मेरे जीवन मे इतना बड़ा ज्ञान किसी गुरु से सिखा और इस गुरु ने मुझसे एक पैसा नही लिया यह मैं बिलकुल अचम्भा मानता हूँ आश्चर्य मानता हूँ|” और थॉमस क्रूसो यह सिख के गया है और फिर उसने प्लास्टिक सेर्जेरी का स्कूल खोला, और उस स्कूल मे फिर अंग्रेज सीखे है, और दुनिया मे फैलाया है| दुर्भाग्य इस बात का है के सारी दुनिया मे Plastic Surgery का उस स्कूल का तो वर्णन है लेकिन इन वैद्यो का वर्णन अभी तक नही आया विश्व ग्रन्थ मे जिन्होंने अंग्रेजो को प्लास्टिक सेर्जेरी सिखाई थी|

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वन्देमातरम
भारत माता की जय

Anti-gravity की खोज के काफी नजदीक थे हमारे राजीव भाई

 
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 हमारे राजीव भाई CSIR (Center For Science & Industrial Research) के एक शोध कार्य मे काम किया था| वो शोध कार्य Fundamental Fifth Force के ऊपर था, आप जानते है ब्रह्माण्ड मे चार तरह के Fundamental Force है, पर एक कल्पना ऐसी है के कोई एकk Fifth Force भी है और वो Anti-gravity है| तो इसके लिए राजीव भाई ने Mathematical Foundations तक Develop किया, पहले तो Assumption थे फिर Foundations मे राजीव भाई गए फिर Experimental Verification का काम राजीव भाई अपने टीम के साथ शुरू किया|

तभी इस काम के बारे मे Germany के कुछ वैज्ञानिकों को खबर लग गयी, उहाँ पर एक Max Planck Research Institute है Munich नाम की शहर मे, उनको पता चल गया के हिन्दुस्तान मे ऐसा कुछ काम हो रहा है तो उन्होंने राजीव भाई की टीम को Offer कर दिया के अब तो आप यहाँ आ जाइये और इहाँ पे करिए, हम आपको Billions of Dollars Provide करेंगे| तो राजीव भाई ने काहा के ‘नही ये संभव नही है हम तो हमारे देश मे कुछ करना चाहते है’| तो कहने लगे आपके देश मे तो Facilities नही है, तब राजीव भाई ने काहा ‘नही है, तो क्या है ? आचार्य जगदीश चन्द्र बोसू ने जब काम किया था तब उनके पास भी Facilities नही थे तो क्या वो अमेरिका भाग गए थे शोध करने के लिए ? वो यही पे रहके काम करते थे|’ फिर उन लोगोने धमकी देना शुरु किया के ऐसा कर देंगे, वैसा कर देंगे, Government of India को उन्होंने कहा के आप तो Pressurize करिए इन लोगोंको, माने एक ग्रुप के वैज्ञानिकों को जो राजीव भाई के साथ काम कर रहे थे| तो वो कहते थे इनको Pressurize करो पैसे की मदत से या किसी भी तरह से या तो Surrender कर दे यह पूरी शोध या यह तैय कर ले की Patent सिर्फ Germany लेगा माने Max Planck Research Institute.

राजीव भाई के मन मे कुछ ऐसे प्रतिक्रिया आ रही थी.. दो रास्ते थे उनके पास, एक के वो अपनी शोध (Research) को Surrender कर दे, कुछ पैसा उनको मिल जाये, करोड़ पति बन जाय, मज़े का जीवन बिताएं या Germany चला जाए| एक और रास्ता था के राजीव भाई उनसे झगड़ा करे, और कहें के कोई सवाल हि नही उठता यह उनका अपना है, वो खुद रखेंगे, तुमको International Court मे जाना है उहाँ चले जाओ, मैं फाइट करूँगा ऐसा करूँगा वैसा करूँगा| तीसरा और एक आखरी रास्ता है जो राजीव भाई को बहुत पसंद था वो था के शोध हि बंध कर दो| किस बात का झगड़ा लेना ? होगा क्या के राजीव भाई शोध करेंगे और Patent उनको हो जायेगा तो Technology वो बनायेंगे|

अब Technology कहाँ से आयेगी ? अब यह तैय हो जाये के Fundamental Fifth Force है और यह भी तैय हो जाये के वो Anti-gravity है तो यह जो Satellite Communications का Field है यह तो हमारे लिए बिलकुल खुल जायेगा, बहुत अपर सम्भावनाये इसमें हो जाएगी, और हम बहुत कम पैसे मे दुनिया के Master हो सकते है| राजीव भाई को लगता था के हम Satellite बनायेंगे तो हिन्दुस्तान के प्राकृतिक सम्पदा के बारे मे पता लगायेंगे, Star Wars तो नही करने वाले| अगर अमेरिका के पास यही Technology पोहुंच जाएगी तो वो इसको Star Wars इस्तेमाल करेंगे| इराक को बम मारेंगे, ईरान को बम मारेंगे, अफगानिस्तान को बम मारेंगे, उसको मारेंगे ..तो राजीव भाई के मन मे आया के यह काम बंध कर देना चाहिए क्योंकि भारत सरकार का कोई भरोसा नही है| पता नही कब भारत सरकार जर्मनी के सामने Surrender देंगे और कहेंगे के इतना बिलियन डॉलर मिलता है तो ले लो… तो सरकार पर कोई भरोसा नही और राजीव भाई को उनसे झगड़ा नही करना, तो एक रास्ता उन्होंने ढूंड लिया के इस प्रोजेक्ट को बंध कर दिया जाये| राजीव भाई के जो गाइड थे डॉ एम् पि कौशिक उन्होंने कहा के जब हमारी ताकत और हैसियत होगी तब हम फिर से शुरू करेंगे अभी फ़िलहाल बंध कर दो| तो राजीव भाई ने वो प्रोजेक्ट बंध कर दिया|

अब यह Concept की बात है, तो राजीव भाई के दिमाग मे जब भी इस बात को लेके विचार आते थे तो वो यही सोचते थे के उनका उस शोध का काम अगर वो प्रोयोग करेंगे, Technology के field मे जायेंगे तो उनको Satellite के field मे हिन्दुस्तान को कुछ आगे ले जाने की बात Self Sufficient करने की बात दीखता था| उनको क्या दीखता था ? के इसको हम प्रोयोग करके दुनिया पर हम राज करेंगे Star Wars के Masters हो जायेंगे हम Missiles को ऐसे डिजाईन करेंगे वैसे डिजाईन करेंगे|

तो यह जो Civilization Concept है यह Technology के Development मे बड़ी भूमिका निभाता है| हमारी Civilization की जो मान्यताएं है उसि के हिसाब से Technology बनाते है और हमारी जो मान्यतायों के विरुद्ध है वो Technology मे हम नही जाते| अब पिछले 20 सालों से क्या हो गया है के यूरोप की जो मान्यताये है Civilization की उसके आधार पर उन्होंने जो Technology का विकास किया है वो वकास के आधार पर उन्होंने ऐसी बहुत सारी Technology बनाई है जो दुनिया का नाश हि जादा करती है, फ़ायदा तो बहुत कम करती है| यूरोप और अमेरिका के पास इस समय जितनी भी Technology है अगर आप उसको classify करने की कौसिश करें to 70% se 80% Technology उनकी ऐसी है जो Mass Destruction की है| और इसमें Trillion of Dollar की Investment है| और हमने जो Technology बनाई है पिछले 50-55 साल मे वो ऐसा बिलकुल नही है| Technology अछि या बुरी नही होती कभी भी जैसे एक चाकू है ..ये अच्छा और बुरा कुछ नही होता प्रोयोग करने वाले के हात मे है के आप उसका क्या प्रोयोग करेंगे! आप चाकू से किसीका जेब काट सकते है किसीका पेट फाड़ सकते है, और उसि चाकू से आप केला काट सकते है, आलू काट सकते है, सब्जी बनाके खा सकते है| आप अगर यह पश्चिमी लोगों के हात मे दे दोगे तो वो पेट फाड़ने का सोचेंगे, जेब काटने का सोचेंगे और हिन्दुस्तानी या पूर्वी लोगोंके हात मे दोगें तो वे सब्जी काट के हि खायेंगे उससे|

तो यह डिबेट नही करना है के Technology अछि है या ख़राब! उनके लिए बहुत अछि हो सकती है पर मेरे लिए ख़राब| यह Relativity का सवाल है न के अपने लिए Star Wars का Concept बहुत ख़राब हो सकता है Atom Bomb बहुत ख़राब हो सकता है Hydrogen Bomb बहुत ख़राब हो सकता है Chemical Bomb बहुत ख़राब हो सकता है Anthrax बहुत ख़राब हो सकता है लेकिन यूरोप, अमेरिका के लिए हो सकता है बहुत अच्छा हो, क्योंकि उन्हें अपना उदेश्य हासिल करने मे वो Technology की मदत मिलती हो तो वो करेंगे उनके लिए बहुत अछि हो सकती है|

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वन्देमातरम्

हम भारतवासी आर्य कहीं बहार से आयें| इतना बड़ा झूट अंग्रेज हमारे इतिहास मे लिख गए

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हमारे देश मे मैकॉले के द्वारा जो विषय तै किये गए उनमे से एक था इतिहास विषय| जिसमे मैकौले ने यह कहा के भारतवासियों को उनका सच्चा इतिहास नहीं बताना है क्योंकि उनको गुलाम बनाके रखना है, इसलिए इतिहास को विकृत करके भारत मे पड़ाया जाना चाहिए| तो भारत के इतिहास पूरी तरह से उन्होंने विकृत कर दिया|

सबसे बड़ी विकृति जो हमारे इतिहास मे अंग्रेजो ने डाली जो आजतक ज़हर बन कर हमारे खून मे घूम रही है, वो विकृति यह है के “ हम भारतवासी आर्य कहीं बहार से आयें|” सारी दुनिया मे शोध हो जुका है के आर्य नाम की कोई जाती भारत को छोड़ कर दुनिया मे कहीं नही थी; तो बाहार से कहाँ से आ गए हम ? फिर हम को कहा गया के हम सेंट्रल एशिया से आये मने मध्य एशिया से आये| मध्य एशिया मे जो जातियां इस समय निवास करती है उन सभि जातियों के DNA लिए गए, DNA आप समझते है जिसका परिक्षण करके कोई भी आनुवांशिक सुचना ली जा सकती है| तो दक्षिण एशिया मे मध्य एशिया मे और पूर्व एशिया मे तीनो स्थानों पर रेहने वाली जातिओं के नागरिकों के रक्त इकठ्ठे करके उनका DNA परिक्षण किया गया और भारतवासियो का DNA परिक्षण किया गया| तो पता चला भारतवासियो का DNA दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और पूर्व एशिया के किसी भी जाती समूह से नही मिलता है तो यह कैसे कहा जा सकता है की भारतवासी मध्य एशिया से आये, आर्य मध्य एशिया से आये ?

इसका उल्टा तो मिलता है की भारतवासी मध्य एशिया मे गए, भारत से निकल कर दक्षिण एशिया मे गए, पूर्व एशिया मे गए और दुनियाभर की सभि स्थानों पर गए और भारतीय संस्कृति, भारतीय सभ्यता और भारतीय धर्म का उन्होंने पूरी ताकत से प्रचार प्रसार किया| तो भारतवासी दूसरी जगह पे जाके प्रचार प्रसार करते है इसका तो प्रमाण है लेकिन भारत मे कोई बाहार से आर्य नाम की जाती आई इसके प्रमाण अभीतक मिले नही और इसकी वैज्ञानिक पुष्टि भी नही हुई| इतना बड़ा झूट अंग्रेज हमारे इतिहास मे लिख गए, और भला हो हमारे इतिहासकारों का उस झूट को अंग्रेजों के जाने के 65 साल बाद भी हमें पड़ा रहे है|

अभी थोड़े दिन पहले दुनिया के जेनेटिक विशेषज्ञ जो DNA RNA आदि की जांच करनेवाले विशेशाज्ञं है इनकी एक भरी परिषद् हुई थी और वो परिषद् का जो अंतिम निर्णय है वो यह कहता है के “ आर्य भारत मे कहीं बहार से नही आये थे, आर्य सब भारतवासी हि थे जरुरत और समय आने पर वो भारत से बहार गए थे|”

अब आर्य हमारे यहाँ कहा जाता है श्रेष्ठ व्यक्ति को, जो भी श्रेष्ठ है वो आर्य है, कोई ऐसा जाती समूह हमारे यहाँ आर्य नही है| हमारे यहाँ तो जो भी जातिओं मे श्रेष्ठ व्यक्ति है वो सब आर्य माने जाते है, वो कोई भी जाती के हो सकते है, ब्राह्मण हो सकते है, क्षत्रिय हो सकते है, शुद्र हो सकते है, वैश्य हो सकते है| किसी भी वर्ण को कोई भी आदमी अगर वो श्रेष्ठ आचरण करता है हमारे उहाँ उसको आर्य कहा जाता है, आर्य कोई जाती समूह नही है, वो सभि जाती समूह मे से श्रेष्ठ लोगों का प्रतिनिधित्व करनेवाला व्यक्ति है| ऊँचा चरित्र जिसका है, आचरण जिसका दूसरों के लिए उदाहरण के योग्य है, जिसका किया हुआ, बोला हुआ दुसरो के लिए अनुकरणीय है वो सभि आर्य है|

हमारे देश मे परम श्रेधेय और परम पूज्यनीय स्वामी दयानन्द जैसे लोग, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चन्द्र बोसे, उधम सिंह, चंद्रशेखर, अस्फाकउल्ला खान, तांतिया टोपे, झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई, कितुर चिन्नम्मा यह जितने भी नाम आप लेंगे यह सभि आर्य है, यह सभि श्रेष्ठ है क्योंकि इन्होने अपने चरित्र से दूसरों के लिए उदाहरण प्रस्तुत किये हैं| इसलिए आर्य कोई हमारे यहाँ जाती नहीं है| रजा जो उच्च चरित्र का है उसको आर्य नरेश बोला गया, नागरिक जो उच्च चरित्र के थे उनको आर्य नागरिक बोला गया, भगवान श्री राम को आर्य नरेश कहा जाता था, श्री कृष्ण को आर्य पुत्र कहा गया, अर्जुन को कई बार आर्यपुत्र का संबोधन दिया गया, युथिष्ठिर, नकुल, सहदेव को कई बार आर्यपुत्र का सम्बोधन दिया गया, या द्रौपदी को कई जगह आर्यपुत्री का सम्बोधन है| तो हमारे यहाँ तो आर्य कोई जाती समूह है हि नही, यह तो सभि जातियों मे श्रेष्ठ आचरण धारण करने वाले लोग, धर्म को धारण करने वाले लोग आर्य कहलाये है| तो अंग्रेजों ने यह गलत हमारे इतिहास मे डाल दिया|

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वन्देंमातरंम्
भारत माता कि जय

तक्षशिला विश्वविद्यालय जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी।

तक्षशिला विश्वविद्यालय — राजीव दीक्षित Rajiv Dixit

तक्षशिला विश्वविद्यालय वर्तमान पश्चिमी पाकिस्तान की राजधानी रावलपिण्डी से 18 मील उत्तर की ओर स्थित था। जिस नगर में यह विश्वविद्यालय था उसके बारे में कहा जाता है कि श्री राम के भाई भरत के पुत्र तक्ष ने उस नगर की स्थापना की थी। यह विश्व का प्रथम विश्विद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे। यहां 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था। 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के चिकित्सा शास्त्र का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकास विभिन्न रूपों में हुआ था। इसका कोई एक केन्द्रीय स्थान नहीं था, अपितु यह विस्तृत भू भाग में फैला हुआ था। विविध विद्याओं के विद्वान आचार्यो ने यहां अपने विद्यालय तथा आश्रम बना रखे थे।

छात्र रुचिनुसार अध्ययन हेतु विभिन्न आचार्यों के पास जाते थे। महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में यहां वेद-वेदान्त, अष्टादश विद्याएं, दर्शन, व्याकरण, अर्थशास्त्र, राजनीति, युद्धविद्या, शस्त्र-संचालन, ज्योतिष, आयुर्वेद, ललित कला, हस्त विद्या, अश्व-विद्या, मन्त्र-विद्या, विविद्य भाषाएं, शिल्प आदि की शिक्षा विद्यार्थी प्राप्त करते थे। प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरुषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेतनभोगी शिक्षक नहीं थे और न ही कोई निर्दिष्ट पाठयक्रम था। आज कल की तरह पाठयक्रम की अवधि भी निर्धारित नहीं थी और न कोई विशिष्ट प्रमाणपत्र या उपाधि दी जाती थी।

शिष्य की योग्यता और रुचि देखकर आचार्य उनके लिए अध्ययन की अवधि स्वयं निश्चित करते थे। परंतु कहीं-कहीं कुछ पाठयक्रमों की समय सीमा निर्धारित थी। चिकित्सा के कुछ पाठयक्रम सात वर्ष के थे तथा पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक छात्र को छरू माह का शोध कार्य करना पड़ता था। इस शोध कार्य में वह कोई औषधि की जड़ी-बूटी पता लगाता तब जाकर उसे डिग्री मिलती थी। अनेक शोधों से यह अनुमान लगाया गया है कि यहां बारह वर्ष तक अध्ययन के पश्चात दीक्षा मिलती थी। 500 ई. पू. जब संसार में चिकित्सा शास्त्र की परंपरा भी नहीं थी तब तक्षशिला आयुर्वेद विज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र था। जातक कथाओं एवं विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि यहां के स्नातक मस्तिष्क के भीतर तथा अंतडिय़ों तक का आपरेशन बड़ी सुगमता से कर लेते थे। अनेक असाध्य रोगों के उपचार सरल एवं सुलभ जड़ी बूटियों से करते थे। इसके अतिरिक्त अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भी उन्हें ज्ञान था। शिष्य आचार्य के आश्रम में रहकर विद्याध्ययन करते थे। एक आचार्य के पास अनेक विद्यार्थी रहते थे। इनकी संख्या प्रायरू सौ से अधिक होती थी और अनेक बार 500 तक पहुंच जाती थी। अध्ययन में क्रियात्मक कार्य को बहुत महत्व दिया जाता था। छात्रों को देशाटन भी कराया जाता था।

शिक्षा पूर्ण होने पर परीक्षा ली जाती थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय से स्नातक होना उस समय अत्यंत गौरवपूर्ण माना जाता था। यहां धनी तथा निर्धन दोनों तरह के छात्रों के अध्ययन की व्यवस्था थी। धनी छात्रा आचार्य को भोजन, निवास और अध्ययन का शुल्क देते थे तथा निर्धन छात्र अध्ययन करते हुए आश्रम के कार्य करते थे। शिक्षा पूरी होने पर वे शुल्क देने की प्रतिज्ञा करते थे। प्राचीन साहित्य से विदित होता है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढऩे वाले उच्च वर्ण के ही छात्र होते थे। सुप्रसिद्ध विद्वान, चिंतक, कूटनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री चाणक्य ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूर्ण की थी। उसके बाद यहीं शिक्षण कार्य करने लगे। यहीं उन्होंने अपने अनेक ग्रंथों की रचना की। इस विश्वविद्यालय की स्थिति ऐसे स्थान पर थी, जहां पूर्व और पश्चिम से आने वाले मार्ग मिलते थे। चतुर्थ शताब्दी ई. पू. से ही इस मार्ग से भारत वर्ष पर विदेशी आक्रमण होने लगे। विदेशी आक्रांताओं ने इस विश्वविद्यालय को काफी क्षति पहुंचाई। अंततरू छठवीं शताब्दी में यह आक्रमणकारियों द्वारा पूरी तरह नष्ट कर दिया।

विज्ञानं के क्षेत्र में भारत और India का अंतर: राजीव दीक्षित

 विज्ञानं के क्षेत्र में भारत और India का अंतर:@[466243806766675:274:राजीव दीक्षित Rajiv Dixit] भारत में : किसीको वैज्ञानिक बनने से पहले उसका ऋषि होना आवशक होता था। इंडिया में: वैज्ञानिक बनने के लिए पुस्तकों का ज्ञान और कुछ जड़ का प्रयोग करने की क्षमता काफी है। ---------------------------------------------------------------- भारत में: भारतीय वैज्ञानिक जानते थे की मनुष्य प्राकृतिक वातावरण में ही स्वस्थ रहता है उन्नति करता है इसलिए यहाँ प्रकृति को पुष्ट कर उससे अधिक से अधिक लाभ उठाने का विज्ञानं विकसित हुआ, भारत का विज्ञानं समृद्धि का विज्ञानं था।  इंडिया में: इंडिया ने प्रकृति को उजड़ा लोगोंको प्रकृति से दूर कर दिया, इससे जो अभाव और विकृतिया पैदा हुई उसकी पूर्ति करने के लिए विज्ञानं का विकास किया, इसलिए इंडिया का विज्ञानं अभाव एवं दुर्गति का विज्ञानं है। ------------------------------------------------------------------ भारत में: प्रकृति से जुड़े होने के कारन भारत में स्वस्य्थ जीवन का विज्ञानं विकसित हुआ। इंडिया में: प्रकृति विरोधी होने के कारन रोग बड़े तो इंडिया ने पश्चिम की चिकित्सा पद्धति अपनाया। -------------------------------------------------------------------- भारत में: यही विज्ञानं का विकास हुआ सभी बड़े आविष्कार यहाँ हुए। इंडिया में: हमारे वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार पर आविष्कार करने वाले अंग्रेजो को ही मूल आविष्कार मानना, पश्चिम के इसी विज्ञानं की नक़ल और उसपर आधारित तकनीक का विकास हो रहा हैं।  --------------------------------------------------------------------- भारत में: भारत के हर गाँव और शहर बहुत ही समृद्ध थे, गाँव में ही रोजगार उपलब्ध थे, बेरोजगारी नामक शब्द तक नही था समाज में, कभी व्यापारी, तीर्थयात्री, विद्यान दूर दूर तक आते थे, यात्रियों को कोई कष्ट न हो इसलिए अतिथि सत्कार की परंपरा विकसित हुई, भारत निर्यात में बहुत आगे था, इसलिए यहाँ नौका विज्ञानं अति समृद्ध था, वास्कोडिगामा ने भारत की खोंज नही की थी वह अफ्रीका के नाविकों और व्यापारियों के साथ यहाँ पहुंचा था।  इंडिया में: शहरों को बसने के लिए गाँव को उजाड़ा। गाँव से शहर, शहर से महानगर, दूरियों के कारन यातायात के लिए नेशनल हाईवे, ट्रक, रेल, विमान इसी तरह शहरों में भीड़ बड़ी तो शहरों में ऊँची इमारतों आदि मजबूरी का विज्ञानं विकसित हो रहा हैं। 5 लाख से अधिक जनसँख्या होने के बाद शहर विकृत होने लगते हैं, उस विकृति को दूर करने के लिए जिस विज्ञानं की आवश्यकता होती हैं वह प्रकृति के विरुद्ध होने से विकृति का विज्ञानं हैं।   -------------------------------------------------------------------- भारत में: प्रकृति से जुडाव होने के कारण हर व्यक्ति की सोच वैज्ञानिक थी। इंडिया में: प्रकृति से कटा व्यक्ति भेद चाल चल रहा है, सुनामी यहाँ एक भी वनवासी या खुला पशु नही मरा, पड़े लिखे समाज के लाखों लोग मरे। होटलों, आधुनिक अनुष्ठानो का अधिक से अधिक क्षति हुआ। पशु जितना सामान्य ज्ञान न होने के बाद भी यह अहंकार की हम वैज्ञानिक युग में जी रहें है, व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ने की वजाय, आपदा की सुचना के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों पर अरबों खरबों खर्च किया जाता हैं। -------------------------------------------------------------------- भारत में: समाज की प्रगति के लिए विज्ञानं की तकनीकों का विकास होता था। इंडिया में: तकनिकी प्रगति के अनुरूप समाज को ढलने का प्रयत्न किया जाता हैं। ------------------------------------------------------------------ भारत में: भारत के ऋषि जानते थे की शक्ति का आधार आहार नही है उसमे निहित प्राण हैं। अतः प्राण विज्ञानं आधारित बैल से कृषि का विकास हुआ। इंडिया में: इंडिया का वैज्ञानिक जानते ही नही के क्या है प्राण। सारा आहार प्राणहीन ही नही प्राणनाशक होता जा रहा हैं।  ------------------------------------------------------------------ भारत में: गेहूं पिसने की घट्टी, तेल निकलने की घाणी, घी निकालने की बिलोना पद्धति, रोटी बनाने वाली आदि तकनीकों का विकास प्राण विज्ञानं के आधार पर हुआ, विज्ञानं में पिछड़ेपन का कारण नही। इंडिया में: आता चक्की, तेल मिल, डेयरी घी यह अज्ञान की दें हैं विज्ञानं की नही, ब्रेड बनाने में गेहूं के 23 पौष्टिक गुण नष्ट हो जाते हैं फिर उसमे 8 कृत्तिम और सुगन्धित गुण डालकर कंपनी कहती है 'एनरिच्ड ब्रेड' 'हमारा आटा बिना मिलावट वाला' और पड़ी लिखी महिलाये उसे खरीद कर गौरान्वित होती हैं। ----------------------------------------------------------------- भारत में: प्रकृति आधारित आयुर्वेद के मानदंडो पर खरा उतरने पर ही किसी विद्या को स्वस्थ विज्ञानं का प्रमाण पत्र मिलता हैं।  इंडिया में: अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के मानदंडो पर खरा उतरने पर ही किसी विद्या को स्वस्थ विज्ञानं का प्रमाण मिलता हैं। ---------------------------------------------------------------- भारत में: स्वस्थ अर्थात स्व में स्थित। इंडिया में: स्वस्थ अर्थात रोग मुक्त। -------------------------------------------------------------- भारत में: वैज्ञानिक भाषा संस्कृत का विकास हुआ। इंडिया में: सभी भाषाएँ अवैज्ञानिक भाषा अंग्रेजी के अधीन हैं।
विज्ञानं के क्षेत्र में भारत और India का अंतर:राजीव दीक्षित Rajiv Dixit
भारत में : किसीको वैज्ञानिक बनने से पहले उसका ऋषि होना आवशक होता था।
इंडिया में: वैज्ञानिक बनने के लिए पुस्तकों का ज्ञान और कुछ जड़ का प्रयोग करने की क्षमता काफी है।
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भारत में: भारतीय वैज्ञानिक जानते थे की मनुष्य प्राकृतिक वातावरण में ही स्वस्थ रहता है उन्नति करता है इसलिए यहाँ प्रकृति को पुष्ट कर उससे अधिक से अधिक लाभ उठाने का विज्ञानं विकसित हुआ, भारत का विज्ञानं समृद्धि का विज्ञानं था।
इंडिया में: इंडिया ने प्रकृति को उजड़ा लोगोंको प्रकृति से दूर कर दिया, इससे जो अभाव और विकृतिया पैदा हुई उसकी पूर्ति करने के लिए विज्ञानं का विकास किया, इसलिए इंडिया का विज्ञानं अभाव एवं दुर्गति का विज्ञानं है।
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भारत में: प्रकृति से जुड़े होने के कारन भारत में स्वस्य्थ जीवन का विज्ञानं विकसित हुआ।
इंडिया में: प्रकृति विरोधी होने के कारन रोग बड़े तो इंडिया ने पश्चिम की चिकित्सा पद्धति अपनाया।
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भारत में: यही विज्ञानं का विकास हुआ सभी बड़े आविष्कार यहाँ हुए।
इंडिया में: हमारे वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार पर आविष्कार करने वाले अंग्रेजो को ही मूल आविष्कार मानना, पश्चिम के इसी विज्ञानं की नक़ल और उसपर आधारित तकनीक का विकास हो रहा हैं।
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भारत में: भारत के हर गाँव और शहर बहुत ही समृद्ध थे, गाँव में ही रोजगार उपलब्ध थे, बेरोजगारी नामक शब्द तक नही था समाज में, कभी व्यापारी, तीर्थयात्री, विद्यान दूर दूर तक आते थे, यात्रियों को कोई कष्ट न हो इसलिए अतिथि सत्कार की परंपरा विकसित हुई, भारत निर्यात में बहुत आगे था, इसलिए यहाँ नौका विज्ञानं अति समृद्ध था, वास्कोडिगामा ने भारत की खोंज नही की थी वह अफ्रीका के नाविकों और व्यापारियों के साथ यहाँ पहुंचा था।
इंडिया में: शहरों को बसने के लिए गाँव को उजाड़ा। गाँव से शहर, शहर से महानगर, दूरियों के कारन यातायात के लिए नेशनल हाईवे, ट्रक, रेल, विमान इसी तरह शहरों में भीड़ बड़ी तो शहरों में ऊँची इमारतों आदि मजबूरी का विज्ञानं विकसित हो रहा हैं। 5 लाख से अधिक जनसँख्या होने के बाद शहर विकृत होने लगते हैं, उस विकृति को दूर करने के लिए जिस विज्ञानं की आवश्यकता होती हैं वह प्रकृति के विरुद्ध होने से विकृति का विज्ञानं हैं।
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भारत में: प्रकृति से जुडाव होने के कारण हर व्यक्ति की सोच वैज्ञानिक थी।
इंडिया में: प्रकृति से कटा व्यक्ति भेद चाल चल रहा है, सुनामी यहाँ एक भी वनवासी या खुला पशु नही मरा, पड़े लिखे समाज के लाखों लोग मरे। होटलों, आधुनिक अनुष्ठानो का अधिक से अधिक क्षति हुआ। पशु जितना सामान्य ज्ञान न होने के बाद भी यह अहंकार की हम वैज्ञानिक युग में जी रहें है, व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ने की वजाय, आपदा की सुचना के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों पर अरबों खरबों खर्च किया जाता हैं।
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भारत में: समाज की प्रगति के लिए विज्ञानं की तकनीकों का विकास होता था।
इंडिया में: तकनिकी प्रगति के अनुरूप समाज को ढलने का प्रयत्न किया जाता हैं।
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भारत में: भारत के ऋषि जानते थे की शक्ति का आधार आहार नही है उसमे निहित प्राण हैं। अतः प्राण विज्ञानं आधारित बैल से कृषि का विकास हुआ।
इंडिया में: इंडिया का वैज्ञानिक जानते ही नही के क्या है प्राण। सारा आहार प्राणहीन ही नही प्राणनाशक होता जा रहा हैं।
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भारत में: गेहूं पिसने की घट्टी, तेल निकलने की घाणी, घी निकालने की बिलोना पद्धति, रोटी बनाने वाली आदि तकनीकों का विकास प्राण विज्ञानं के आधार पर हुआ, विज्ञानं में पिछड़ेपन का कारण नही।
इंडिया में: आता चक्की, तेल मिल, डेयरी घी यह अज्ञान की दें हैं विज्ञानं की नही, ब्रेड बनाने में गेहूं के 23 पौष्टिक गुण नष्ट हो जाते हैं फिर उसमे 8 कृत्तिम और सुगन्धित गुण डालकर कंपनी कहती है ‘एनरिच्ड ब्रेड’ ‘हमारा आटा बिना मिलावट वाला’ और पड़ी लिखी महिलाये उसे खरीद कर गौरान्वित होती हैं।
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भारत में: प्रकृति आधारित आयुर्वेद के मानदंडो पर खरा उतरने पर ही किसी विद्या को स्वस्थ विज्ञानं का प्रमाण पत्र मिलता हैं।
इंडिया में: अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के मानदंडो पर खरा उतरने पर ही किसी विद्या को स्वस्थ विज्ञानं का प्रमाण मिलता हैं।
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भारत में: स्वस्थ अर्थात स्व में स्थित।
इंडिया में: स्वस्थ अर्थात रोग मुक्त।
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भारत में: वैज्ञानिक भाषा संस्कृत का विकास हुआ।
इंडिया में: सभी भाषाएँ अवैज्ञानिक भाषा अंग्रेजी के अधीन हैं।

Scorpion (बिच्छू काटने पर इस दवा का इस्तेमाल करें

Like ✔ Comment✔ Tag ✔ Share ✔ @[466243806766675:274:राजीव दीक्षित Rajiv Dixit] पूरी post नहीं पढ़ सकते तो यहाँ click करे ! http://www.youtube.com/watch?v=N4iEd5Ku9lQ  बिच्छू काटने पर बहुत दर्द होता है जिसको बिच्छू काटता है उसके सिवा और कोई जान नही सकता कितना भयंकर कष्ट होता है। तो बिच्छू काटने पर एक दावा है उसका नाम है Silicea 200 इसका लिकुइड 5 ml घर में रखे । बिच्छू काटने पर इस दावा को जिव पर एक एक ड्रोप 10-10 मिनट अंतर पर तिन बार देना है । बिच्छू जब काटता है तो उसका जो डंक है न उसको अन्दर छोड़ देता है वोही दर्द करता है । इस डंक को बाहर निकलना आसान काम नही है, डॉक्टर के पास जायेंगे वो काट करेगा चीरा लगायेगा फिर खिंच के निकालेगा उसमे उसमे ब्लीडिंग भी होगी तकलीफ भी होगी । ये मेडिसिन इतनी बेहतरीन मेडिसिन है के आप इसके तिन डोस देंगे 10-10 मिनट पर एक एक बूंद और आप देखेंगे वो डंक अपने आप निकल कर बाहर आ जायेगा। सिर्फ तिन डोस में आधे घन्टे में आप रोगी को ठीक कर सकते है। बहुत जबरदस्त मेडिसिन है ये Silicea 200. और ये मेडिसिन मिट्टी से बनती है,वो नदी कि मिट्टी होती है न जिसमे थोड़ी बालू रहती है उसी से ये मेडिसिन बनती है ।  इस मेडिसिन को और भी बहुत सारी काम में आती है । अगर आप सिलाई मशीन में काम करती है तो कभी कभी सुई चुव जाती है और अन्दर टूट जाती है उस समय भी आप ये मेडिसिन ले लीजिये ये सुई को भी बाहर निकाल देगा। आप इस मेडिसिन को और भी कई केसेस में व्यवहार कर सकते है जैसे कांटा लग गया हो , कांच घुस गया हो, ततैया ने काट लिया हो, मधुमखी ने काट लिया हो ये सब जो काटने वाले अन्दर जो छोड़ देते है वो सब के लिए आप इसको ले सकते है । बहुत तेज दर्द निवारक है और जो कुछ अन्दर छुटा हुआ है उसको बाहर निकलने की मेडिसिन है । बहुत सस्ता मेडिसिन है 5 ml सिर्फ 10 रूपए की आती है इससे आप कम से कम 50 से 100 लोगों का भला कर सकते है । @[466243806766675:274:राजीव दीक्षित Rajiv Dixit]पूरी post नहीं पढ़ सकते तो यहाँ click करे !
http://www.youtube.com/watch?v=N4iEd5Ku9lQ

(scorpion) बिच्छू काटने पर बहुत दर्द होता है जिसको बिच्छू काटता है उसके सिवा और कोई जान नही सकता कितना भयंकर कष्ट होता है। तो बिच्छू काटने पर एक दावा है उसका नाम है Silicea 200 इसका लिकुइड 5 ml घर में रखे । बिच्छू काटने पर इस दावा को जिव पर एक एक ड्रोप 10-10 मिनट अंतर पर तिन बार देना है । बिच्छू जब काटता है तो उसका जो डंक है न उसको अन्दर छोड़ देता है वोही दर्द करता है । इस डंक को बाहर निकलना आसान काम नही है, डॉक्टर के पास जायेंगे वो काट करेगा चीरा लगायेगा फिर खिंच के निकालेगा उसमे उसमे ब्लीडिंग भी होगी तकलीफ भी होगी । ये मेडिसिन इतनी बेहतरीन मेडिसिन है के आप इसके तिन डोस देंगे 10-10 मिनट पर एक एक बूंद और आप देखेंगे वो डंक अपने आप निकल कर बाहर आ जायेगा। सिर्फ तिन डोस में आधे घन्टे में आप रोगी को ठीक कर सकते है। बहुत जबरदस्त मेडिसिन है ये Silicea 200. और ये मेडिसिन मिट्टी से बनती है,वो नदी कि मिट्टी होती है न जिसमे थोड़ी बालू रहती है उसी से ये मेडिसिन बनती है ।

इस मेडिसिन को और भी बहुत सारी काम में आती है । अगर आप सिलाई मशीन में काम करती है तो कभी कभी सुई चुव जाती है और अन्दर टूट जाती है उस समय भी आप ये मेडिसिन ले लीजिये ये सुई को भी बाहर निकाल देगा। आप इस मेडिसिन को और भी कई केसेस में व्यवहार कर सकते है जैसे कांटा लग गया हो , कांच घुस गया हो, ततैया ने काट लिया हो, मधुमखी ने काट लिया हो ये सब जो काटने वाले अन्दर जो छोड़ देते है वो सब के लिए आप इसको ले सकते है । बहुत तेज दर्द निवारक है और जो कुछ अन्दर छुटा हुआ है उसको बाहर निकलने की मेडिसिन है ।
बहुत सस्ता मेडिसिन है 5 ml सिर्फ 10 रूपए की आती है इससे आप कम से कम 50 से 100 लोगों का भला कर सकते है ।
राजीव दीक्षित Rajiv Dixit

हिन्दी मे पढ़े क्या लिखा अंग्रेज़ macaulay ने 1835 मे अंग्रेज़ो की संसद को !!!

हिन्दी मे पढ़े क्या लिखा अंग्रेज़ macaulay ने 1835 मे अंग्रेज़ो की संसद को !!! _________________________________________ मैं भारत के कोने कोने मे घूमा हूँ मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो भिखारी हो चोर हो !  इस देश में मैंने इतनी धन दोलत देखी है इतने ऊंचे चारित्रिक आदर्श गुणवान मनुष्य देखे हैं की मैं नहीं समझता हम इस देश को जीत पाएंगे , जब तक इसकी रीड की हड्डी को नहीं तोड़ देते !  जो है इसकी आध्यात्मिक संस्कृति और इसकी विरासत !  इस लिए मैं प्रस्ताव रखता हूँ ! की हम पुरातन शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति को बादल डाले !  क्यूंकि यदि भारतीय सोचने लगे की जो भी विदेशी है और अँग्रेजी है वही अच्छा है और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है तो वे अपने आत्म गौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे !! और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते है ! एक पूरी तरह से दमित देश !!  ______________________________________________________________  और बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है की macaulay अपने इस मकसद मे कामयाब हुआ !! और जैसा उसने कहा था की मैं भारत की शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बना दूंगा की इस मे पढ़ के निकलने वाला व्यक्ति सिर्फ शक्ल से भारतीय होगा ! और अकल से पूरा अंग्रेज़ होगा !!  और यही आज हमारे सामने है दोस्तो ! आज हम देखते है देश के युवा पूरी तरह काले अंग्रेज़ बनते जा रहे है !!  उनकी अँग्रेजी भाषा बोलने पर गर्व होता है !! अपनी भाषा बोलने मे शर्म आती है !!  madam बोलने मे कोई शर्म नहीं आती ! श्री मती बोलने मे शर्म आती है !!  अँग्रेजी गाने सुनने मे गर्व होता है !! मोबाइल मे अँग्रेजी tone लगाने मे गर्व होता है !!  विदेशी समान प्रयोग करने मे गर्व होता है ! विदेशी कपड़े विदेशी जूते विदेशी hair style बड़े गर्व से कहते है मेरी ये चीज इस देश की है उस देश की है !ये made in uk है ये made इन america है !!  अपने बच्चो को convent school पढ़ाने मे गर्व होता है !! बच्चा ज्यादा अच्छी अँग्रेजी बोलने लगे तो बहुत गर्व ! हिन्दी मे बात करे तो अनपद ! विदेशी खेल क्रिकेट से प्रेम कुशती से नफरत !!!  विदेशी कंपनियो pizza hut macdonald kfc पर जाकर कुछ खाना तो गर्व करना !! और गरीब रेहड़ी वाले भाई से कुछ खाना तो शर्म !!  अपने देश धर्म संस्कृति को गालिया देने मे सबसे आगे !! सारे साधू संत इनको चोर ठग नजर आते है !!  लेकिन कोई ईसाई मिशनरी अँग्रेजी मे बोलता देखे तो जैसे बहुत समझदार लगता है !!  करोड़ो वर्ष पुराने आयुर्वेद को गालिया ! और अँग्रेजी ऐलोपैथी को तालिया !!!  विदेशी त्योहार वैलंटाइन मनाने पर गर्व !! स्वामी विवेकानद का जन्मदिन याद नहीं !!!!  दोस्तो macaulay अपनी चाल मे कामयाब हुआ !! और ये सब उसने कैसे किया !!  ये जानने के लिए आप सिर्फ एक बार नीचे दिये गए link पर click करे !!! जरूर जरूर click करे ! https://www.youtube.com/watch?v=jwPuWgVuVwU   वन्देमातरम वन्देमातरम वन्देमातरम वन्देमातरम !!!
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मैं भारत के कोने कोने मे घूमा हूँ मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो भिखारी हो चोर हो !

इस देश में मैंने इतनी धन दोलत देखी है इतने ऊंचे चारित्रिक आदर्श गुणवान मनुष्य देखे हैं की मैं नहीं समझता हम इस देश को जीत पाएंगे , जब तक इसकी रीड की हड्डी को नहीं तोड़ देते !

जो है इसकी आध्यात्मिक संस्कृति और इसकी विरासत !

इस लिए मैं प्रस्ताव रखता हूँ ! की हम पुरातन शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति को बादल डाले !

क्यूंकि यदि भारतीय सोचने लगे की जो भी विदेशी है और अँग्रेजी है वही अच्छा है और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है तो वे अपने आत्म गौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे !! और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते है ! एक पूरी तरह से दमित देश !!

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और बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है की macaulay अपने इस मकसद मे कामयाब हुआ !!
और जैसा उसने कहा था की मैं भारत की शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बना दूंगा की इस मे पढ़ के निकलने वाला व्यक्ति सिर्फ शक्ल से भारतीय होगा ! और अकल से पूरा अंग्रेज़ होगा !!

और यही आज हमारे सामने है दोस्तो ! आज हम देखते है देश के युवा पूरी तरह काले अंग्रेज़ बनते जा रहे है !!

उनकी अँग्रेजी भाषा बोलने पर गर्व होता है !!
अपनी भाषा बोलने मे शर्म आती है !!

madam बोलने मे कोई शर्म नहीं आती !
श्री मती बोलने मे शर्म आती है !!

अँग्रेजी गाने सुनने मे गर्व होता है !!
मोबाइल मे अँग्रेजी tone लगाने मे गर्व होता है !!

विदेशी समान प्रयोग करने मे गर्व होता है !
विदेशी कपड़े विदेशी जूते विदेशी hair style बड़े गर्व से कहते है मेरी ये चीज इस देश की है उस देश की है !ये made in uk है ये made इन america है !!

अपने बच्चो को convent school पढ़ाने मे गर्व होता है !!
बच्चा ज्यादा अच्छी अँग्रेजी बोलने लगे तो बहुत गर्व ! हिन्दी मे बात करे तो अनपद !
विदेशी खेल क्रिकेट से प्रेम कुशती से नफरत !!!

विदेशी कंपनियो pizza hut macdonald kfc पर जाकर कुछ खाना तो गर्व करना !!
और गरीब रेहड़ी वाले भाई से कुछ खाना तो शर्म !!

अपने देश धर्म संस्कृति को गालिया देने मे सबसे आगे !! सारे साधू संत इनको चोर ठग नजर आते है !!

लेकिन कोई ईसाई मिशनरी अँग्रेजी मे बोलता देखे तो जैसे बहुत समझदार लगता है !!

करोड़ो वर्ष पुराने आयुर्वेद को गालिया ! और अँग्रेजी ऐलोपैथी को तालिया !!!

विदेशी त्योहार वैलंटाइन मनाने पर गर्व !! स्वामी विवेकानद का जन्मदिन याद नहीं !!!!

दोस्तो macaulay अपनी चाल मे कामयाब हुआ !! और ये सब उसने कैसे किया !!

ये जानने के लिए आप सिर्फ एक बार नीचे दिये गए link पर click करे !!! जरूर जरूर click करे !
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वन्देमातरम वन्देमातरम वन्देमातरम वन्देमातरम !!!