child education छोटे बच्चो को समझाने का तरीका

प्रश्न : छोटे बच्चे (children) भगवन का रूप होते हैं, तो क्या उनको सजा देना अच्छी बात है?

उत्तर : जो छोटे बच्चे (children) होते हैं, आपने कहा कि वो भगवान का रूप होते है। अच्छा, भगवान गलतिया करता है, क्या? हां या न? नहीं करता। तो भगवान तो गलती करता नहीं, और बच्चे गलतियां कर रहे हैं, तो बताइए, भगवान का रूप कहॉ हुआ? अगर बच्चे छोटे हैं और आप उनको भगवान का रूप मानते हैं. तो वो गलती नहीं करेंगे। जो बच्चे गलतियां कर रहे हैं, तो वो भगवान का रूप नही हैं। तो जो बच्चे भगवान का रूप है वो गलती करेंगे, नहीँ। और जो गलती करेंगे ही नहीं, तो उनको क्यो दण्ड देना? वो तो अन्याय है। इसलिए जो बच्चे अच्छे हैं, बुद्धिमान हैं, धार्मिक है, सीधे सरल हैं, जो गलती नहीं करते उनको दण्ड नहीं देंगे। अब जो बच्चे गड़बड़ करते है, अनुशासन में नहीं रहते हैं, शांति से नहीं रहते, झूठ बोलते हैं, झगडा करते हैं, शोर मचाते हैं, तोड़-फोड़ करतै हैं, बताने पर भी नहीं समझते, नहीं मानते, तो उनको दण्ड देना पड़ेगा।

child education in hindiबच्चा हो, बूढा हो या जवान हो, दण्ड सबके लिए है। दण्ड कैसा हो, ये ध्यान देने की बात है। हमारे ऋषिगण विद्वान लोग बताते हैं कि, पाँच साल से कम उम्र के बच्चे, छोटे बच्चे, उनको पीटना नहीँ चाहिए, उनको थप्पड़ नहीं मारना चाहिए, उनको डण्डा नहीं मारना। उनको दो बार…चार बार, बातचीत से, प्रेम से समझाइए। बेटा, शोर मत करो, शांति से बैठो, हमको काम करने दो। घर में आपके अतिथि आएं हैं. मेहमान आए हैं, आप उनसे बात कर रहे हैं, और बच्चे वहॉ शोर मचा रहे हैं, बात नहीं करने देते। यहां उनको प्रेम से समझाएंगे कि बेटा, शोर मत करो, हमको बातचीत करने दो, घर में अतिथि आए हैं, ऐसे दो बार, चार बार, उनको प्रेम से समझाइए।

जब प्रेम से समझाने पर भी नहीं मानते, फिर उनको डांट लगाएं, आँख दिखाएं, चलो-चलो, चुप…चुप, शोर नहीं करना, चलो उधर के अपनी पढाई, करो। ऐसे डांट भी लगा सकते हैं, आँख भी दिखा सकते हैं, थोडा सा डरा सकते हैं।

कोई…कोई बच्चे ज्यादा अडियल होते हैं, वो इतने से भी नहीँ मानते हैं। उनका भी इलाज यह है कि बच्चा तीन साल का है, और बार-बार बताने से डांटने से, बार…बार आँख दिखाने से भी नहीं मानता, तब भी इसको थप्पड नहीँ मारना। उसका फिर आखिरी इलाज ये है कि आप उससे बात मत कीजिए। उससे बात करना बंद कीजिये आप भी उससे ये कहिए कि, ‘तुम हमारी बात नहीं मानते, हम तुमसे बात नहीं करते, जाओं। इधर मुँह घुमाकर बैठ जाओ। देखना, दो मिनट
में बच्चा ठीक हो जाएगा, उसको थप्पड मारने की जरूरत नहीं है। तीन साल का, चार साल का बच्चा उसको कहिए, तुमको अच्छा खिलौना नहीं देंगे, तुमको अच्छी मिठाई नहीँ खिलाएगे, ये सुविधा तुम्हारी बंद कर देंगे। बस उसके लिए
इतना दण्ड काफी है. थप्पड नहीँ मारेंगे।

जब बच्चा पॉच साल से बडा हो जाए। आजकल के माहौल को देखते हुए आखिरी सीमा बारह वर्ष पाँच से बारह वर्ष तक की जो एज ग्रुप है, इस उम्र के बच्चों को गलती करने पर पहले प्रेम से समझाएं कि, ”ये गलत काम है, मत करो। ये ठीक काम है ये करो।” दो बार. चार बार, प्रेम से कहिए जब नहीं मानते, तो फिर डॉट लगाइए, फिर डाँट से भी नहीं मानते, तो फिर थप्पड लगाइए, एक, दो, ज्यादा नहीँ। ऐसा नहीं कि आपको गुस्सा आ गया, तो आप पीटते रहें, पीटते रहें। गुस्सा उतारने के लिए नहीं पीटना बच्चे को, उसकी गलती को सुधारने के लिए उसको थोडा सा दण्ड देना, ताकि उसके दिमाग में यह डर
बना रहे “यदि मै गलती करूंगा, तो मुझे दुख भोगना पडेगा, दण्ड मिलेगा।” बस दण्ड का प्रयोजन इतना ही है, कि सुधार करना।

अगर वो दो थप्पड़ खाकर सुधर जाता है. तो दो ही मारो। और दो से नहीं सुधरता है, तीन-चार खाने पड़ते हैं, तब सुधरता है, तो उतने हिसाब से उसको थोडा सा दण्ड अधिक दिया जा सक्ता है। पर दण्ड देते समय ये ध्यान रखें, उसके शरीर का नुकसान न हो जाए। आपने थप्पड मारा, उसका क्या बिगड गया, उसकी आँख खराब हो गई, आँख में उंगली लग गई, ऐसा न हो।

सावधानी से दण्ड दें, उसका नुकसान न हो, उसका सुधार हो जाए, बस इतना ही प्रयोजन है। और फिर उसको इस तरह से बताएं कि “तुम्हारा टीवी. देखना बंद कर देंगे, तुम्हारा कार्टून देखना बंद कर देंगे ।” इस-इस तरह से उनको क्या दिए जा सकते हैं। ओंर कभी-कभी धमकी भी लगाई जा सकती है। किसी भी तरह से न मानें तो फिर उसको धमकी लगाएं- ‘तुम हमारी बात नहीं मानोगे तो हम तुम्हें घर से निकाल देंगे। तुम्हें घर में नहीं रखेंगे। जाओं, अपना कमाओ और खाओ। हम तुमको न तो स्कूल की फीस देंगे, न खाना देंगे, न यूनीफोंर्म, कुछ नहीं देंगे। जाओं, निकल जाओं यहॉ से।” ऐसी धमकी भी दे सकते हैं। पर वो जरा सावधानी से देनी पड़ेगी। ये जरा आँपरेशन वाला काम है, सर्जरी वाला काम है, दस-बारह साल के बच्चे तक को आप धमकी दे सकते हैं, इससे इससे बड़ा हो जाए, यदि 15 – 18 का हो जाए, फिर धमकी नहीं देना। फिर तो वो भाग भी जाएगा और क्या कुछ उल्टा…सीधा भी कर लेगा। तो बडे बच्चों के साथ इस तरह का व्यवहार न करें।

जब आपके बच्चे 15, 16, 18, 20 के हो जाएं, तब वो जो गलती करें, तब आप उनको सुझाव दें उनको समझाएं कि “बेटा ये काम करोगे तो इसमें ये नुकसान है और ये काम करोगे तो इसमें फायदा है।” अब वो बुद्धिमान हो गए, बुद्धि भी चलने लग गई। उम्र भी 15-18 हो गई। शरीर में ताकत भी आगई बच्चों के । अब वो बुद्धि से हर बात को समझना चाहते हैँ तो फिर अब आपकी उनसे बुद्धि से लडाई चलेगी! अब ताकत की लडाई नहीं चलेगी। अब ताकत की लडाई बंद

आठ साल, दस साल, बारह साल के बच्चे। उनके शरीर में शक्ति कम है, आपके शरीर में शक्ति ज्यादा। छोटे बच्चों से ताकत की लडाई चलेगी।

आप उनको 2 थप्पड़ मार सकते हैं, थप्पड लगा सकते हैं’ और जो करवाना है’ वो करवा सकते है। जब तक उनकी बुद्धि कम है, जब तक उनके शरीर में शक्ति कम है, तब तक वो आपकी मार खा लेंगे, आपकी बात मान लेंगे, सह लेंगे, उनके पास और कोई दूसरा विकल्प नहीं है। अब जब बच्चे 15-18 के हो गए, उनकी बुद्धि भी चलने लग गई. और शरीर में ताकत भी आ गई।

अब अगर आप मारपीट करेंगे, तो वो भी हाथ उठाएगा। बेटा भी हाथ उठाएगा। इसलिए 15 के बाद फिर मारपीट नहीं करना और धाक-धमकी नहीं करना। अब शरीर से ताकत की लडाई बंद और दिमाग की लडाई शुरू। अब दिमाग से लडिए। बडा बच्चा/युवक आपके सामने तर्क उठाएगा, बहस करेगा, ये काम क्यों करें, हमको अच्छा नहीँ लगता है, हम नहीँ करना चाहते। आपको ये समझाना होगा, कि “ये काम इसलिए करना है, क्योकि इसमें ये फायदा है। और ये काम इसलिए नहीं करना है क्योंकि इसमें ये नुकसान है l”

अगर आप बड़े बच्चे को नियंत्रित करना चाहते हैं, तो आपको हानि और लाभ समझाने पड़ेगे। जिस काम को आप बच्चों से करवाना चाहते हैं, उस काम के लाभ उनको समझाएं I एक कागज पर लिस्ट बनाएं, कि इस काम को करने से क्या-‘क्या लाभ है, वो लिस्ट उनको पकडा दें। और उनको कह दें, इसको रोज पढो! एक…दो महीना पढने से दिमाग में बैठ जाएगा, कि इस काम के करने से ये फायदा है। अगर उसको फायदा समझ में आ गया, तो वो काम करेगा। और जिस गलत काम से इसको रोकना चाहते हैं, उसकी एक लिस्ट बनाएं और उसमें टाईटल लिखें कि इस गलत काम को करने से ये-ये हानि है। वो सारी हानिया लिखकर के उसको दे दीजिए और कहिए, उसको एक-महीना दो महीना रोज पढो। बस और कुछ नहीं करना, हानि और लाभ समझाना हैं। अगर आपका बच्चा पढ़ा मढा-लिखा है, बुद्धिमान है, और यदि दो दो महीना उस लिस्ट को पढ लेगा तो जिस काम के लाभ वो पढ लेगा, उसको समझ में आ जाएगा। वो बच्चा उस काम को करेगा। और जिस काम की हानियां बतायी जाएंगी और दो महीना पढने से उसके दिमाग में वो हानियां बैठ जाएंगी, तो उस काम को वह नही करेगा। इस प्रकार से बड़े बच्चों को नियंत्रित करने का ये उपाय है

ध्यान दें :- ये लेख स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी के पर्वचनों से लिया गया है, ओउम नमस्ते

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