क्या मोक्ष होने के पश्चात पुनर्जन्म में जीव नहीं आता

प्रशन- उपनिषद, वेदान्त, गीता आदि में यह लिखा है कि मोक्ष होने के पश्चात पुनर्जन्म में जीव नहीं ‘आता-
 
उत्तर- ‘न च पुनरावर्त्तते’ इत्यादि वचनों का यह अभिप्राय है कि जब तक मुक्ति की अवधि है अर्थात् 31 नील, 10 खरब, 40 अरब वर्ष तक मध्यकाल में जन्म में नहीं आना पड़ता। जब मुक्ति की अवधि समाप्त हो जाती है तो जन्म-मरण में आना पड़ता है क्योंकि शुद्ध ज्ञान-कर्मोंपासना से मुक्ति मिलती है और वे ज्ञान कर्मोपासना जीव ने सीमित रूप में किये हैँ । 
 
उनका फल भी सीमित होना चाहिए, असीमित नहीं। यदि सीमित ज्ञान…कर्मोंपासना का फल परमात्मा अनन्त दे देवे तो, अन्याय हो जाए।  जो जितना अच्छा या बुरा कर्म करता है, उसको उतना ही सुख व दुख फल देना न्याय कहाता है । जो पशु, पक्षी आदि योनियाँ है, उनमें जो जीव रहते हैं, वे बहुत दुखी हैँ । यदि बिना कर्म के उसको परमात्मा पशु आदि योनियों में भेज देवे तो वह दोषी हो जाए। इसलिए मुक्ति और बन्धन कर्मों के कारण ईश्वर देता है और कर्मों के सिमित होने से उनका फल भी सिमित होना उचित है , न कि सिमित कर्मों का असीमित फल । 
 
अत: मोक्ष के पश्चात जिव पुनह: ज़न्म-मरण में आता है । यदि मोक्ष से जीव पुन: संसार में जन्म न लेवे तो यह भी दोष आता है कि यह संसार समाप्त हो जाये। क्योंकि जो…जो जिव मोक्ष में जाते रहेंगे वो पुनह संसार में न आयेंगे और जीवों की संख्या निषिचत्त है, वे नये उत्पन नही होते, तो यह संसार समाप्त हो जाना चाहिए था अत्त: मोक्ष को प्राप्त होकर पुन: संसार में जीव का जन्म मानना ही ठीक है।