आर्यों का निवास स्थान

आर्य वस्तुत: यहीं के निवासी थे, या बाहार से आए?


आर्य (aryans) जाति वास्तव में इसी देश में आबाद थी या कहीं बाहर से आकर बसी-यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर पर्याप्त विवाद हुआ है और अब तक हो रहा है। यूरोपीय विद्वानों ने जिस दिन से संस्कृत-विषयक अपना अध्ययन और अनुसंधान आरम्भ किया, उसी दिन से इस प्रश्न पर बहस मनोयोग पूर्वक चर्चा आरम्भ हूई। 

जब संस्कृत – (Sanskrit Language) भाषा की रचना-प्रणाली तथा उसकी बनावट को यूरोपीय भाषाओँ से तुलना की गई तो उनमे’ विचित्र समता पाई गई। इससे विस्मित होकर यूरोपीय संस्कृतज्ञों ने अनेक परिणाम निकाले। इनमें से कुछ को सम्मति थी कि यूरोपवासी, तथा ईरान, अफगानिस्तान और भारत के रहनेवाले सब एक वंश के ही हैं। इनका नाम आर्य था। प्राचीन समय में इनके पूर्वज मध्य एशिया में रहते थे और फिर वे वहाँ से भिन -भिन भागो’ में बँटते चले गए। अत: जो लोग भारत में आए उन्होंने तो अपना मूलं नाम आर्य रखा और शेष लोगो नें अपना नाम बदल दिया। इस विद्वत्मण्डली की यह राय भाषाओँ में पाई जाने वाली उस समानता के कारण बनी, जिसका उल्लेख हम कर चुके हैं। उनका कथन है कि विभक्त होने के पहले इन सब जातियों की भाषा एक ही थी। वह भाषा अधिकांश में संस्कृत से अधिक मिलती थी और उसी से लैटिन, ग्रीक, फारसी तथा जेंद आदि भाषाएँ निकली हैं।

स्वामी दयानन्द जी की इसमें निम्म सम्मति है, जिसे उन्होंनै ‘सत्यार्थप्रकाश’ में लिखा है-

1. प्रश्न : मनुष्यों की आदि-सृष्टि किस स्थल में हुई?
उत्तर : त्रिबिष्टप अर्थात् तिब्बत में।


2. प्रश्न : उत्पत्ति के आदि में एक जाति के मनुष्य थे या अनेक जातियों के?
उत्तर : एक के, पीछे विद्वान् और देवता पुरुषों का नाम आर्य तथा बुरे लोगों का नाम दस्यु अर्थात् डाकू मूर्ख पड़ गया। इस प्रकार आर्य और दस्यु दो नाम हुए। आर्यों में उक्त रीति से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नामक चार वर्ण हुए। द्विज, विद्वानों का नाम आर्य और अनपढ़ों का नाम अनार्य अर्थात् अनाडी-शूद्र हुआ।



3. प्रशन : फिर वे यहाँ कैसे आए?
उत्तर : जब आर्य विद्वानों, देवताओं का दस्यु, असुर व राक्षसों अर्थात् भूखों में सदैव लड़ाईं-झगड़ा होने लगा और विवाद बहुत बढ़ गया तो आर्यजन सारी धरती में से इस भूमि को सबसे श्रेष्ठ समझकर यहीं आ बसे। इसीलिए इस देश का नाम आर्यवर्त पड़ा।


4. प्रश्न : आर्यावर्त की सीमा कहॉ तक है?
उत्तर : उत्तर में हिमालय पर्वत, दक्षिण में विध्याचल, पूर्व और पषिचम में समुद्र, या यह कहें कि पश्चिम मेँ सरस्वती नदी या अटक नद (जो उत्तरीय पर्वतों से निकलकर दक्षिण में अरब सागर में जा गिरता है), पूर्व में दर्षदवती (जो नेपाल देश के पूर्वीय भाग के पहाडों से निकलकर बंगाल की और समुद्र में मिल गई है, जिसको ब्रह्मपुत्र भी कहते हैं), हिमालय की मध्य रेखा से दक्षिण और पर्वतों के बीच और रामेश्वर तक विन्ध्याचल के भीतर जितने देश हैं इन सबको आर्यावर्त इसलिए कहते हैं कि यह देश आर्यावर्त देवता अर्थात् विद्वानों ने बसाया है और आर्य पुरुषों की निवास-भूमि है।


5. प्रश्न : पहले इस देश का नाम क्या था और इसमें कौन रहते थे?
उत्तर : पहले इस देश का नाम कुछ भी नहीं था और न कोई यहॉ रहता था, क्योकि आर्य मनुष्य-उत्पत्ति के आरम्भ में कुछ समय व्यतीत हौ जाने के अनन्तर तिब्बत से सीधे इस देश में आकर बसे।


6. प्रश्न : बहुतों का कथन है कि आर्य लोग ईरान से आए, इसीलिए इन लोगों का नाम आर्य है। इनसे पहले यहाँ जंगली मनुष्य रहते थे, जिनको (आर्य जन) असुर और राक्षस कहते थे। आर्य लोग अपने को देवता बताते थे और इन दोनों में जो युद्ध हुआ, वह देवासुर-संग्राम के नाम से कथाओं में वर्णित है।

उत्तर : यह बात नितान्त मिथ्या है, वयोकि ऋग्वेद मेँ लिखा है, जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है, आर्य धार्मिक, विद्वान्, सत्य वक्ताओं का नाम है और उनसे विपरीत गुणों वाले जो मनुष्य हैं, उनका नाम दस्यु अर्थात् डाकू, कुकर्मी, अधार्मिक और मूर्ख है। इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य द्विजों का नाम आर्य तथा शूद्रों का नाम अनार्य अर्थात् अनाडी है। जब वेद में यह लिखा है तो दूसरी जातियों को कल्पित बातों को बुद्धिमान् लोग कभी नहीं मान सकते। हिमालय पर्वत पर आर्य और दस्यु, मलेछ अर्थात् राक्षसों का जो संग्राम हुआ था, उसमें आर्यावर्त के अर्जुन और महाराज दशरथ प्रभृति सम्राटू देवताओं अर्थात् आर्यों की विजय और असुरों की पराजय के लिए सहायक हुए।

युरोप के कुछ शोधकर्ता कहते हैं कि भाषाओँ की समता इस बात की पूरी साक्षी नहीं हैं कि आर्य लोग असल में भारत के निवासी नहीं थे ओर कभी प्राचीन काल में मध्य एशिया से आकर यहॉ बस गए या किसी अन्य स्थान से आए। निसंदेह यहाँ तक तो सब एकमत हैं कि यूरोप की अनेक भाषाएँ और जैद तथा पहलबी (पुरानी फारसी) संस्कृत से इतनी मिलती हैं जिससे पूर्ण बिश्वास से कहा जा सकता है कि या तो अवशिष्ट समस्त भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं, या संस्कृत और ये समस्त भाषाएँ किसी अन्य प्राचीन भाषा से उत्पन्न हैं जो इन सारी भाषाओँ की माता थी।

भारतीय बिद्वान्, जिनके साथ अनेक यूरोपीय विद्वान् भी सहमत हैं, यह कहते हैं कि ये सब भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं, क्योकि यह बात मान ली गई किं संस्कृत इन सबसे प्राचीन तथा सर्वोपरि उत्तम है। अत: कोई कारण नहीं, जिससे यह न माना जाए कि अन्य सभी भाषाएँ जो एक दूसरे से पर्याप्त समान हैँ इसी संस्कृत की पुत्रियाँ हैं। यथा-नवीन संस्कृत्त, प्राकृत, आधुनिक बंगला, वर्तमान गुजराती, मराठी आदि प्राचीन संस्कृत से बहुत भेद रखती हैं। परन्तु इसमें किसी को संन्देह नहीं कि इन सबकी माता प्राचीन संस्कृत है। 

इसी प्रकार चाहे फारसी, जेंद, पहलवी, लातीनी और यूनानी आदि सब भाषाएँ प्राचीन संस्कृत से भिन्न हैं, परन्तु उनमें इतनी समानता है कि आधुनिक भारतीय भाषाओं की भाँती उनको भी संस्कृत सेनिकली माना जा सकता है। दूसरी ओर कई यूरोपीय विद्वान् यह कहते हैं कि भारत की आधुनिक भाषाओं’ की संस्कृत से जितनी समानता है उतनी ही समानता लातीनी, यूनानी आदि से नहीं, इसलिए यह माना जा सकता है कि इन भाषाओँ की माता एक अन्य भाषा हैजो भिन-भिन देशों में जाने से पहले आर्य वंश में बोली जाती थी। 

निसंदेह भाषाओं के बारे में यह परिणाम तो निकाला जा सकता है कि जिस दशा में यह भाषा अब प्रचलित है, उन वंशों में भी कुछ न कुछ पुराना सम्बन्ध अवश्य रहा होगा। क्या ये सब वंश किसी समय मध्य एशिया में बसते थे और वहाँ से इधर-उधर चले गए, या इन सब वंशों के पूर्व-पुरुष हिमालय के बर्फीले पहाडों के दक्षिण या उत्तर में निवास करते थे और उनकी सन्तान संसार के भिन्न-भिन्न भागों में फैल गई? ये एसे प्रश्न हैं जिनके विषय में अभी तक कोई निश्चयात्मक उत्तर नहीं मिला है। 

हमारी सम्मति में लॉर्ड एलफिस्टन और उनके साथी विद्वान् उचित रीति से विवाद करते हैं और कहते हैँ कि जो प्रमाण इस मत की’ पुष्टि में दिये जाते हैं कि आर्य जाति किसी समय मध्य एशिया में रहती थी और वहाँ से हिन्दू (आर्य) भारत में आए, वह इस परिणाम पर पहुँचने की पूर्ण सीडी नहीं है। यह केवल बिचार-मात्र हैं। जब ऐतिहासिक साक्षी मिलती हैं, उस समय से हिन्दू (आर्य) वंश का निवास भारत में ही सिद्ध होता हैं। इसलिए इस बात को सिद्ध करने का भार उन्हीं लोगों पर है जो कहते हैं कि आर्य कहीं बाहार से आए हैं। ऐसी अवस्था में हिन्दू छात्रों को यह शिक्षा देना कि उनके पूर्वज भारत के असली निवासी नहीं हैं, उनको कुमार्ग पर ले जाना हैं!
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