आर्यों का ज्ञान एंव विज्ञान भाग 2


आर्य ही थे विश्व गुरु जानीय अपना गोर्वशाली इतिहाश 

मित्रों जैसा की भाग 1 में आर्यों के ज्ञान विज्ञानं vedic science के 11 प्रमाण दिए जा चुके हैं अब इस भाग 2 में 20 प्रमाण और दिए जा रहे हैं जो ये सिद्ध करेंगे की आर्य ही विश्व गुरु थे, यदि किसी को फिर भी शंका रहे तो मेरे पास हजारों साल पुराने महर्षि भारद्वाज का लिखा विमान शाष्त्र भी है जो मुझे मेरे मित्र राहुल आर्य से प्राप्त हुआ है में इस vedic science book ग्रन्थ से ये सिद्ध कर सकता हूँ की आर्य ऋषि कितने बड़े वैज्ञानिक थे जय आर्यवर्त 
12. वेद में लिखा है की पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और उसी (सूर्य) के आकर्षण के कारण अपने मार्ग से भटक नहीं सकती । सूर्यं की परिक्रमा पृथ्वी कितने दिनो में करती है? इसका उत्तर वेद इस प्रकार देता है:-

द्वादश प्रधयश्चक़मेकं त्रीणि नभ्यानी क उतच्चिकेत ।
तस्मिन् त्सांक त्रिशता न शंकवोsप्रिता: षप्टिर्न चलाचलाश: । ।
-ऋग्वेद १-१६४-४८

भावार्थ : (चक्रम्) यहां वर्ष ही चक्र है, क्योंकि यह रथ के पहिय के समान क्रमण: अर्थात् पुन: पुन: घूमता रहता है। उस चक्र में (द्वादश+प्रधय:) जैसे चक्र में 12 छोटी-छोटी अरे प्रधि = कीलें हैं। वैसे साल में बारह मास हैं।
(त्रीणि+नभ्यानी) इसके (पृथ्वी के) परिक्रमण के दौरान कोई भाग सूर्यं के नजदीक आने दूर जाने से तीन ऋतुएं होती हैं। (क:+उ+तत्+चिकेत) इस तत्व को कौन जानता है। (तस्मिन्+साकम्+शंकव:) उस वर्ष में कीलों सी
(त्रिशता+षष्ठी: ) 300 और 60 दिन (अर्पिता) स्थापित हैं! ( न + चलाचलाशा: ) वे 360 दिन रूप कीलें कभी विचलित होने वाली नहीं हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि एक वर्षमें 360 दिन हौते हैं।

एक प्रवचन में स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था कि प्राचीन काल में दरिद्रो के घर में भी विमान थे। उपरिचर नामक राजा सदा हवा में ही फिरा करता था, पहले के लोगों को विमान रचने की विद्या भली प्रकार विदित थी


13. सेनटरीफ्युग्ल पम्प का आविष्कार भी आर्यों ने किया था। कणाद मुनि कहते हैं। कि नली से वायु निकाल देने” पर जल ऊपर चढता है। पानी निकालते जाइये पानी ऊपर चढता जाएगा ।

14. आर्यो के पास कम्पास भी था । कम्पास का सिद्धांत चुम्बक की सुई पर अवलम्बित है। वैशेषिक में कणाद मुनि लिखते हैं कि मणिगमनं सुच्यभिसपर्णमद्रष्टकारणम् अर्थात् चुम्बक की सुई की ओरे लोहे के दौडने का कारण अदृष्ट है।  यह लोह चुम्बक सुई ‘के अस्तित्त्व का प्राचीनतमृ प्रमाण है।

इसी तरह अति प्राचीन हस्तलिखित शिल्पसंहिता जो गुजरात के अणहिलपुर के जैन पुस्तकालय में है। उसमें ध्रुव मत्स्य यंत्र बनाने की विधि स्पष्ट रूप से लिखी मिलती है, उसी शिल्पसंहिता में बैरोमीटर बनाने की विधि लिखी हुई है। वहां लिखा है कि पारा, सूत और जल के योग से यह यंत्र बनता है। शिल्पसंहिता कार कहते हैं कि इस यंत्र से ग्रीष्म आदि ऋतुओं का निर्णय होता है।

15. आर्यों ने समय जानने के लिए धुपघड़ी, जलघडी और बालूघड़ी का निर्माण भी कर लिया था ज्योतिष ग्रन्थों में लिखा है की

 ‘तोययंत्रकपाल थेमंयूर नर वानरे: । ससूत्ररे वुगभेश्च सम्यकालं प्रसाधयेत्

अर्थात् जलयंत्र से समय जाना जाता है अथवा मयूर नर और मानव आकृति के यंत्र बनाकर उनमें बालू भरने और एक और का रेणु सूत्र दूसरे में गिरने से भी समय जानने का यंत्र बन जाता है।

16. आर्यों ने स्वयंवह नामक वह यंत्र बना लिया था जो गर्मी या सर्दी पाकर अमुक वेग से अपने आप चलने लगता था जिसमें पारा भरा जाता था जो तूफान या मानसून जानने का सर्वोत्तम यंत्र था।

17. ज्वार भाटा कीं बात आर्यों को ज्ञात थी। विष्णु पुराण में लिखा है कि यथार्थ में ज्वार भाटे से समुद्र का जल कम और “अघिक नहीं हो जाता। प्रत्युत अग्नि में थाली पर जल रखने से जिस प्रकार वह उमड पडता है। उसी प्रकार चन्द्रमा के आकर्षण से ज्वार भाटा होता है। अत: विलियम वेवल ज्वार भाटा सिद्धांत के जनक नहीं हैं।

18. बीजापुर के संस्कृत पुस्तकालय में सुरक्षित संस्कृत की एक प्राचीन पुस्तक में वायरलैस बनाने का वर्णन है, तभी तो शुक्रनीति में लिखा है कि राजा एक दिन में दस कोस तक की बात जाने। उपरोक्त पुस्तक में ऐसे मसाले बनाने की विधि का वर्णन भी है, जिसके उपयोग से मृत शरीर हजारों वर्ष अविकृत अवस्था में रह सकता है।

19. पुराने जमाने में ऐसा यंत्र भी बनाया जाता था जो आदमी की भांति बोलता था। विक्रमादित्य के सिंहासन की पुतलिया बराबर बोलती’ थी। रावण ने एक कृत्रिम सीता बनाई थी जो राम का नाम लेकर रोती थी अत: रोबोट भी पुराने जमाने में बनाये जाते थे।

20. आधुनिक विज्ञान बताता है कि सूर्यं आकाश गंगा के अक्षीय परिक्रमा करता है। यह बात यजुर्वेद में इस प्रकार लिखी है-‘सृर्य वर्षा आदि का कर्ता (जल -भाप-बादल-वर्ष) प्रकाशमान तेजोमय सब प्राणियों में अमृत रूप वृष्टि (किरणे) द्वारा प्रवेश (विटामिन डी आदि) करा और मूर्तिमान सब द्रव्यों को दिखाता हुआ सब लोकों के साथ आकर्षण गुण से अपनी परिधि में घूमता है किन्तु किसी लोक (पृथ्वी आदि दस ग्रह) के चारों और नहीँ घूमता।

21. कहते हैं कि वेदों मे ’भुत-प्रेतों की कथाएं हैं .लेकिन यह झूठा आरोप है। क्योंकि एक स्थान पर लिखा है कि जब गुरू का प्राणान्त हो, तब मृतक शरीर जिसका नाम प्रेत है, उसका दाह करने वाला शिष्य प्रेतहार अर्थात् मृतक को उठाने वालो के साथ दसवें दिन शुद्ध होता है। दाह होने के बाद उसका नाम भूत है। अत: जो बीत गया उसी का नाम भूत है।

22. किसी भी वैदिक साहित्य में पशुबलि या नरबलि का विधान नहीं है वेदानुसार अश्वमेध यज्ञ उसे कहते हैं जो राजा घर्मं से पालन करे, न्याय के साथ राष्ट्र में स्थिरता कायम करे। विद्या आदि प्रदान करना और जनकल्याण के लिए होम करना ही अश्वमेघ है। कृषि कर्म करना, इन्द्रियों, पृथ्वी आदि को पवित्र रखना गोमेध यज्ञ कहलाता है । यज्ञ तो हिंसा रहित होता है।


23. एक्सबायोलोजी अभिधारणा के बारे में वेद कहता है कि जिस प्रकार सूर्य-चन्द्र आदि इस लोक में हैं, अन्य लोक में भी हैं।” यह आर्यों को भली- भांति विदित है कि अर्जुन महाभारत काल में मंगल ग्रह पर गया था। अन्य लोक जहां पर जीवन है, जलवायु व वातांवरणानुसार प्राणियों के रंग, रूप व भाषा में अन्तर हो सकता है।

24. वेद का प्रत्येक शब्द योगिक है । जैसे कुरान में अकबर का नाम होने से कुरान को मुगल बादशाह अकबर के बाद का नहीँ माना जा सकता। इसी प्रकार कृष्ण, अर्जुन, भारद्वाज आदि नाम वेदों में होने से उनकों वेद से पहले नहीं माना जा सकता। वेदों के शब्द पहले के और मनुष्यों के बाद के हैं। योगिक अर्थ की एक झलक इस प्रकार है:-
भारद्वाज=मन, अर्जुन=चन्द्रमा, कृष्ण=रात्रि

25. वेदिक साहित्य में श्रद्धा से किये गये’ काम, सेवा या श्रद्धापूर्वक दान का नाम श्राद्ध लिखा है, मुर्दों का नही। माता-पित्ता आदि देवगण” ही जीवित पितर हैं” उनकी सेवा ही श्राद्ध व तर्पण हैं।” मरे हुए का श्राद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि व्यक्ति मरकर नया जन्म ले लेता है।

26. आर्यो की अभिधारणा थी कि परमात्मा एक है जो इस जग के कण-कण में व्याप्त है। जिसे विद्वान लोग अनेकों गुणवाचक नामों से पुकरते हैं। इसलिए उसकी कोई मूर्ति नहीं।

27. भारतीय संस्कृति के विकास में वेदिक आर्यों की विशेष देने सहिष्णुता और सामंजस्य की भावना, ज्ञान-विज्ञान का विकास, तपोवन पद्धति, वर्णव्यवस्था और नारियों की प्रतिष्ठा थी। पुत्रियों का उपनयन संस्कार भी होता था, वे ब्रह्मचर्यंवर्ती भी होती थीं। उम्हें यज्ञ करने का अधिकार था।

28. हडप्पा आर्यों की विकृत संस्कृति थी। हडप्पा के नगरों का नियोजन और वास्तुशिल्प उच्चकोटि के ज्यामिति के शास्त्र का प्रतिफल है, जिस प्रमेय को पाइथागोरस का प्रमेय कहा जात्ता है, उसका उल्लेख पाइथागोरस से दो हजार वर्ष पूर्व बौधायन ने अपने सुलभ सूत्र में कर दिया था। पाइथागोरस ने वह प्रमेय भारत में पढी थी। गाल्टन साहब का कथन है कि आजकल के यूरापीय लोग ज्ञान के मामले में यूनानियों के सामने हबशियो के समान हैं, तो प्रश्न यह है कि ‘भारतीयो के सामने यूनानियों का दर्जा क्या था डाक्टर आँनफील्ड लिखले है कि ”भारत वर्ष” में शिक्षा प्राप्त करने के लिए पाइथागोरस, अनकसागोरस, पिरहो और -अन्य बहुत से महाश्य आए जो बाद में यूनान के प्रसिद्ध वैज्ञानिक बनें।

29. चिकित्सा शास्त्र के जनक आर्य ही हैं। वर्तमान यूरोपीय चिकित्सा शास्त्र का आधार भी आयुर्वेद है। लार्ड एन्पिथल ने एक भाषण में कहा था कि मुझे यह निश्चय है कि आयुर्वेद भारत से अरब में और वहां से यूरोप में गया। भोज प्रबन्ध में बेहोश कर शल्यकर्म करने का उल्लेख है। ऋग्वेद में असली बाहु कट जाने पर कृत्रिम बाहु लगाते हुए देव का वर्णन आया है। ऋग्वेद में कटा हुआ सिर भी शल्य चिकित्सा से जोड़ने का विधान है। प्राचीन काल में मृत व्यक्ति की आँखें निकालं कर चक्षुहीन को लगाई जाती थी। शरीर की टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत करके युवा अवस्था को काफी समय तक बरकरार रखा जाता था । च्यवन ऋषि को तो विर्धावस्था से युवा अवस्था प्राप्त हो गयी थी। च्यवनप्राश आयुवर्धक (रीजनरेटिव) औषधि आज नहीं है ? ऋग्वेद में मानव शरीर का पंचभूतों से बनने का उल्लेख एवं एक हजार ओषधियों का वर्णन है। अथर्ववेद को वेद में भेषजा कहा गया है” इससे बडी साक्षी वेदों में औषधियों के वर्णन की और क्या होगी ? अथर्ववेद में रोगों के नाम एवं उनके लक्षणों तक का ही नहीं बल्कि मनुष्य की शरीर की 206 हडियों का वर्णन” तक है।

वेदों में Germ theory पाई जाती है! प्रो. मैकडानल ने लिखा है कि ऋगवेद तथा अथर्ववेद में अद्र्ष्ट शब्द एक प्रकार के कृमियों के लिए आया है । वेद मंत्रो में सूर्यं को ऐसे किर्मियों का नाशक कहा गया है, अथर्ववेद में तो द्रष्ट तथा अदर्ष्ट कृमियों का विस्तृत वर्णन है। वात्स्यान प्रणीत कामसूत्र में रज व वीर्यं का वैज्ञानिक विधि से विस्तृत वर्णन है। अथर्ववेद में 15 प्रकार की शल्य चिकित्सा का वर्णन है।

30. प्राचीन आर्य कृत्रिम दांतों का बनाना और लगाना तथा कृत्रिम नाक बनाकर सीना भी जानते थे! दांत उखाडने के लिए एनीपद शस्त्र का वर्णन मिलता है। मोतियाबिन्द (कैटेरेक्ट) के निकालने के लिए भी शस्त्र था। बागभट ने शल्यकर्मों के यंत्रों की संख्या 115 लिखी है। प्राचीन काल में आर्य सूक्ष्म आपरेशन करते थे। कटी हुई नाक को जोडने की विधि यूरोपियनो ने भारतीयों से सीखी।

31. वनस्पति शास्त्र के जनक भी आर्य ही हैं! हंसदेव का मृगपक्षी शास्त्र वनस्पति विज्ञान का प्रामाणिक ग्रंथ है। बागों में कृत्रिम झरने लगाये जाते थे। समरांगणसूत्रधार मॅ तो लिफ्ट का भी जिक्र है। वेद कहता है कि लता तथा पेडों के पत्ते दोनों वर्णो (सूर्यं का लाल व भूमि का रस कृष्ण वर्ण) के मेल से हरे बनते हैं।

32. 10 आषाढ शुदी 1932 वी, को अपने एक प्रवचन में स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था कि प्राचीन काल में दरिद्रो के घर में भी विमान थे। उपरिचर नामक राजा सदा हवा में ही फिरा करता था, पहले के लोगों को विमान रचने की विद्या भली प्रकार विदित थी ए.ओ हयूम जिन्होंने बाद में भारतीय कांग्रेस की स्थापना की, उन्होने स्वामी दयानन्द जी का उपहास करते हुए कहा, ’व्यक्ति का उडना गुब्बारों तक ही सीमित रह सकता है, यान बनाकर तो केवल सपनों में ही उडा जा सकता है ।’ लेकिन जब विमान का आविष्कार हुआ तो ह्यूम साहब ने बाद में उदयपुर में श्रद्धानंद जी से अपने उपहास के लिए क्षमा मांगी थी।
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