स्वास्थ्य रक्षा में विभिन फलों एंव कंदमूल का उपयोग

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1. केला (कदलीफ़ल )- 
केला एक सुपरिचित उपयोगी फल है। अपक्व केला मधुर, शीतल, ग्राही, भारी, स्निग्ध, कफ-पित्त रक्तविकार, दाह, क्षत एवं वायुनाशक है । पका हुआ केला शीतल, मधुर, विपाक-मधुर, वीर्यवर्द्धक, पुष्टिकारक, रुचिकारक, मांसको बढाने वाला, क्षुधा पुर्तिकार्क, नेत्ररोग, तृषा, रक्तपित्त, उदररोग, ह्र्द्यशुल, प्रदर रोग एवं गर्मी के रोग का नाशक है।
भोजन के पहले केला नहीं खाना चाहिये। पका केला एक अच्छा भोजन है। केले की जड़, स्वंरस, बीज, पत्ते, फूल सभी भागों में विभिन्न कठिन रोगों- मूत्र विकार, प्रदर तथा अतिसार रोगो मैं आश्चर्य जनक लाभ होता है।


2. सेब-
सेबका फ़ल वात-पित्तनाशक, पौष्टिक, कफकारक, गुरु, पाक तथा रसमेँ मधुर, शीतल, रुचिकारक एवं वीर्यवर्धक होता है। यह मूत्राशय की शुद्धि करता है। सेबके सेवन से नाडियों एवं मस्तिष्क को शक्ति मिलने के कारण यह स्मरण शक्ति को बढाता है। दुर्बलता, उन्माद, बेहोशी तथा चिड़चिड़ापन में गुणकारी है । 
यकृत्-विकार में गुणकारी पाया गया है। सेब को कच्चा खानेसे जीर्ण तथा असाध्य रोगों मेँ विशेष लाभ होता है। सेबका छिलका रेचक होता है, अत: ग्रहणी, अतिसार, प्रवाहिका प्रभृति उदर-व्याधियों मेँ छिलके रहित फलके सेवन से लाभ होता है। दस्त आदि में सेब का मुरब्बा गुणकारी होता है। सेब में विटामिन “b” प्रचुर मात्रा में होता है।


3. आम –
आम प्रसिद्ध फल है। कच्चा आम कषाय , अम्ल , वात , एंव पितवर्धक और पका आम मधुर, स्निग्ध, बल तथा सुखदायक, गुरु, वातनाशक, शितकार्क, कषाय, कफ और वीर्यवर्धक होता है। आम की -मंजरी (बौर) शीतल, रुचिकारक, वातकारक, अतिसार, कफ, पित्त, प्रदर-दुष्टि और रुधिरनाशक है।
पालमें पकाकर भी आम खाया जाता है, परंतु इसमें जीवन शक्तिकी न्यूनता होती है। आमका रस दूधके साथ पिने से शक्तिजनक तथा वीर्यवर्धक होता है। चूसकर प्रयोग किये जाने वाले आमको रसाल्की संज्ञा दी जाती है। कलमी आम अत्यन्त पित्तकारक होता है।


4. जामुन – 
जामुन सामान्य फल है, किन्तु रोगों में अति लाभकारी है। जामुन कईं प्रकारका होता है। (बडी) जामुन स्वादिष्ट, विष्टम्भी, रुचिकारक, मुहँ और छोटी जामुन ग्राही, रूक्ष, पित्त एवं कफ-दोष तथा रक्तविकार एवं दाहनाशक है। जामुन की गुठली, छाल, मिंगी, पत्ते तथा सिरके का मधुमेह, दस्त, हिचकी, उदरशूल, फुंसियाँ, कृमि, श्वास, मुखकी जडता, योनिदोष, अरुचि-इन रोगों मेँ प्रयोग उत्तम तथा लाभकारी है। जामुन की मिंगी का चूर्ण मधुमेह के लिये वरदानस्वरूप है।


5. शहतूत-
कच्चा शहतूत गुरु, रेचक, अम्ल, उष्ण, रक्त, पित्तकारक होता है। परंतु पका हुआ स्वादिष्ट, गुरु, शीतल, रक्त-शोधक, मलरोधक, पित्त- वातनाशक कहा गया है। शहतूत वर्ण भेदमें कईं प्रकारके होते हैँ काले, लाल, सफेद तथा हरे। एंव शहतूतके पत्ते रेशमके कीड़े को खिलाये जाते हैँ। चारपाईं पर शहतूत के पत्ते बिछाये जायँ तो खटमल भाग जाते हैं। शहतूत का अम्लपित्त, रक्तपित्त, मलगन्थ में प्राय: प्रयोग किया जाता है।


6. पपीता-
पपीता मधुर, शीतल तथा पाचक होता है। यह सुपाच्य तथा मूत्र विकार मेँ लाभप्रद होता है। पपीते के दूधको रासायनिक विधि दवारा सुखाकर ‘पपेन’ प्राप्त किया जाता है।


7. नीबू-
नीबू की लगभग दस-ग्यारह प्रजातियाँ होती हैं। सामान्यतया नीबू अम्ल रस युक्त, वातनाशक, दीपक, पाचक और लघु होता है । मीठा नीबू भारी, तृषा एवं वमन, वात पितनाशक और बलदायक होता है।

बिजोरा नींबू कास, श्वास, अरुचि, रक्तपित्त तथा तृषानाशक है।

चकोतरा नीबू स्वादिष्ट, रुचिकारक, शीतल, भारी रक्तपित्त, क्षय, श्वास, कास, हिचकी एवं भ्रम नाशक है।

जम्बिरी नींबू उष्ण, गुरु, अम्ल तथा वात-कफ़- दोष, मत्नबन्थ, शूल, खाँसी, वमन, तृषा, आमसम्बन्धी दोय, मुखकी विरसता, ह्रदय को पीडा, अगनिको मन्दता और कृमिनाशक है। नींबू अनेक रोगों में सेवन कराया जाता है। निम्बुं के बीज, फूल, ज़ड़ आदि भी विभिन्न गुणोंसे युक्त होते हैं।


8. फालसा-
अपक्व फालसा कसैला, खट्टा, पित्तकारक एंव लघु होता है। पका हुआ फालसा मधुर, रुचिकारक, शीतल, तृप्तिकारक, पुष्टिजनक, ह्रदयके लिये हितकारक, किंचित विष्टम्भकारक, विपाक्री तथा तृष्णा, पित्त, दाह, रक्तविकार, क्षय, ज्वर, रक्तपित्त, उपदंश, शूल, श्वास, मूत्राशयव्याधि, प्रमेह, अरुचि, मूढगर्भ, ह्रदयरोग आदि मे लाभ करता है। 

मुँह, नाक, गलेसे खून आना, तथा मासिक धर्म मेँ अधिक खून निकलने की अवस्था मेँ फालसेका अर्ध चन्द्रायण कल्प करके अधिक मात्रासे कम मात्रामें दिया जाता है। क्षयमेँ एक मासमें दो कल्प करा देने चाहिये। इस विधिके समय दूध या जलके अतिरिक्त और कुछ नहीं देना चाहिये। इसके अतिरिक्त फालसेका रस, गुठली तथा छाल विभिन्न रोगों मेँ योग बनाकर उत्तम लाभार्थ प्रयोग किये जाते हैँ।



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