भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव को गोली मारी गई थी ?

क्या bhagat singh ,raaj guru, sukh dev को गोली मारी गई थी ?


bhagat singh ,raaj guru, sukh dev जी के द्वारा लिखी गई चिठ्ठी 

आदरणीय महोदय,
सेवा में सविनय निवेदन है कि भारत की ब्रिटिश-सरकार के सर्वोच अधिकारी वायसराए ने एक विशेष अध्यादेश जारी करके लाहोर षड्यंत्र के लिए एक विशेष न्यायाधिकर्ण (ट्रिब्यूनल) को स्थापित किया था, जिसने अक्तूबर सन 1930 में हमें फांसी का दंड सुनाया। हमारे विरुद्ध सबसे बड़ा दोष लगाया गया है कि हमने सम्राट जार्ज पंचम के विरुद्ध युद्ध किया है। न्यायालय के इस निर्णयं से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैँ- 
प्रथम यह कि अंग्रेज़ जाति और भारतीयों के मध्य एक युद्ध चल रहा है, दूसरे यह कि हमने निश्चित रूप से उस युद्धृ मैं हिस्सा लिया है। अंत: हम राजकीय युद्धबन्दी हैं। यद्यपि इसकी व्याख्या में बहुत ‘अतिशयोक्ति से काम लिया गया है, तथापि हम यह कहे बिना नहीं रह सकते की एसा करके हमें समानित किया गया है 

प्रथम व्याख्या पर हम ज़रा विस्तार के साथ प्रकाश डालना चाहते हैं। हमारे विचार से प्रथम रूप में ऐसी कोई लडाई छिडी हुई नहीँ है और हम नहीं जानते की युद्ध छिड़ने से न्यायालय का आशय क्या है, परन्तु हम इस व्याख्या को स्वीकार करते हैं हम इसको इसके ठीक अर्थों में समझना चाहते हैं। 

हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिकों की आए के साधनों पर अपना एकाधिकार जमाये रखेंगे। चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज़ पूंजीपति हों या सर्वथा भारतीय ही हों। उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है।

यदि शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों द्वारा भी निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी इस स्थिति में कोई अंतर नही पड़ता। यदि आपकी सरकार कुछ नेताओं या भारतीय समाज के मुखियाओं पर प्रभाव जमाने में सफल हो जाय, कुछ सुविधाएं मिल जाएं अथवा समझोते हो जाएं उससे भी स्थिति नही बदल सकती। जनता पर इन सब बातों का प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

इस बात की भी हमें चिन्ता नहीँ है कि एक बार फिर युवकों को धोखा दिया गया है। इस बात का भी भय नहीँ है कि हमारे राजनैतिक नेता पथभ्रष्ट हो गए हैं और वें समझोते की बातचीत में इन निरपराध. बेघर और निराश्रित बलिदानियों को भूल गए हैं। जिन्हें दुर्भाग्य से क्रांतिकारी पार्टी का सदस्य समझा जाता है। हमारे राजनेतिक नेता उन्हें अपना शत्रु समझते हैं, क्योंकि उनके विचार में वें हिंसा में विशवास रखते हैं। हमारी वीरांगनाओं ने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया है। उन्होंने बलिवेदी पर अपने पतियों को भेंट किया, उन्होंने अपने आपको भी न्योछावर कर दिया, परन्तु आपकी सरकार उन्हें विद्रोही समझती है। आपके एजेंट भले ही झूटी काहानियाँ बनाकर उन्हें बदनाम कर दें और पार्टी की ख्याति को हानि पोहचाने का प्रयास करें परन्तु यह युद्ध चलता रहेगा।

हो सकता है की यह युद्ध भिन-भिन दशाओं में भिन-भिन स्वरूप ग्रहण करे, कभी यह युद्ध प्रकट रूप ले ले, कभी गुप्त दशा में चलता रहे, कभी भयानक रूप धारण कर ले, कभी किसान के स्तर पर जारी रहे और कभी यह युद्ध इतना भयानक हो जाए की जीवन और मरण की बाजी लग जाये’ चाहे कोई भी परिस्थिति हो इसका प्रभाव आप पर पड़ेगा।

यह आपकी इच्छा है कि आप जिस परिस्थिति को चाहें चुन लें परन्तु यह युद्ध चलता रहेगा। इसमे छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा । बहुत सम्भव है की यह युद्ध भयंकर स्वरूप धारण कर ले। यह उस समय तक समाप्त नही होगा जब तक की समाज का वर्तमान ढांचा समाप्त नही हो जाता। प्रत्यक व्येवस्था में परिवर्तन या क्रान्ति नही हो जाती और श्रृष्टि में एक नए युग का सूत्र पात नही हो जाता।

निकट भविष्य में यह युद्ध अंतिम रूप में लड़ा जाएगा और तब यह निर्णायक युद्ध होगा। साम्राज्यवाद एंव पूंजीवादी कुछ समय के मेहमान हैं। यही वेह युद्ध है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप में भाग लिया है। हम इसके लिय अपने पर गर्व करते हैं की इस युद्ध को ना तो हमनें प्रारम्भ ही किया है और न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त ही होगा। हमारी सेवाएं इसतिहास के उस अध्याय के लिय मानी जाएंगी, जिसे यतीन्द्रनाथ दास और भगवतीचरण के बलिदानों ने विशेष रूप में प्रकाशमान कर दिया है। इनके बलिदान माहान हैं।

जंहा तक हमारे भाग्य का सम्बन्ध है, हम बलपूर्वक आपसे यह कहना चाहते हैं की आपने हमें फांसी पर लटकाने का निर्णय लिया है, आप एसा करेंगे ही। आपके हाथों में शक्ति है और आपको अधिकार भी प्राप्त है, परन्तु इस प्रकार आप जिसकी लाठी उसकी भेंस वाला सिध्दांत ही अपना रहे हैं। और उस पर कटिबद्ध हैं। हमारे अभियोग की सुनवाई इस वक्तव्य को सिद्ध करने के लिय पर्याप्त है की हमने कभी कोई प्रार्थना नही की, और अब भी हम आपसे किसी भी प्रकार की दया की प्रार्थना नही करते। हम केवल आपसे यह प्रार्थना करना चाहते हैं की आपकी सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार हमारे विरुद्ध युद्ध जारी रखने का अभियोग है।

इस स्थिति में हम युद्धबन्दी हैं और इसी आधार पर हम आपसे मांग करते हैं कि हमारे प्रति युद्ध बंदियों जैसा ही व्येवाहार किया जाए हमे फांसी देने के बदले गोली से उड़ा दिया जाए।

अब यह सिद्ध करना आपका काम है कि आपको उस निर्णय में विशवास है, जो आपकी सरकार के एक न्यायालय ने दिया है। आप अपने कार्य द्वारा इस बात का प्रमाण दिजिय। हम विनय पूर्वक आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप अपने सेना-विभाग को आदेश दें कि हमें गोली से उड़ाने के लिए एक सैनिक टोली भेज दी जाये।

भवदीय 
भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव 
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