यहूदी धर्म में विद्रोही साधक

यहूदी धर्म में विद्रोही साधकों की एक रहस्य- धारा है हसीद । इसके स्थापक बाल शेम एक दुर्लभ व्यक्ति थे मध्य रात्रि को वे नदी से वापस लौटते । यह उनकी रोज की चर्या धी, क्योंकि रात में नदी पर परिपूर्ण निस्तब्धता और शांति रहती थी । वे बस बैठते थे कूछ न करते- बस ‘स्व’ को देखते हुए, द्रष्टा को देखते हुए ।
एक रात जब वे नदी से वापस आरहे थे, तब वे एक धनी व्यक्ति के बंगले से गुजरे और पहरेदार प्रवेशद्वार पर खडा था पहरेदार उलझन में पडा हुआ था कि हर रात, ठीक इसी समय यह व्यक्ति वापस आ जाता था । पहरेदार आगे आया और बोला, “मुझे क्षमा करें आपको रोकने के लिए, लेकिन मैं अपनी उत्सुकता को और ज्यादा रोक नहीं सकता। तुम मुझ पर दिन-रात छाये हुए हो -दिन-प्रतिदिन, तुम्हारा काम धंधा ,क्या है ? तुम नदी पर क्यों जाते हो  अनेक बार मैं तुम्हारे पीछे गया हूँ, लेकिन वहाँ कूछ भी नहीं होता…तुम बस बैठे रहते हो घंटों, फिर आधी रात को तुम वापस आते हो बाल शेम ने कहा है “मुझे पता है कि तुम कंई बार मेरे पीछे आये हो, क्योकि रात का स्रन्नाटा इतना है कि मैं तुम्हारे पदचाप की ध्वनि सुन सकता हूँ। और मैं जानता है कि हर रात तुम बंगले के द्वार के पीछे छिपे रहते हो । लेकिन केवल ऐसा ही नहीं है कि तुम मेरे वारे में उत्सुक हो, मैं भी तुम्हारे बारे में उत्सुक है । तुम्हारा काम क्या है पहरेदार बोला, “मेरा काम मैं एक साधारण पहरेदार हू। बाल शेम  बोला, “हे परमात्मा, तुमने तो मुझे कुंजी जैसा शब्द दे दिया ! मेरा धंधा भी तो यही है पहरेदार बोला, ” लेकिन मैं नहीं समझा ! यदि तुम पहरेदार हो तो तुम्हें किसी बंगले या महल की देख-रेख करनी चाहिए। तुम वहाँ क्या देखते हो नदी की रेत पर बैठे-बैठे
बाल शेम ने कहा, “हमारे बीच थोडा फर्क है । तुम देख रहे हो कि बाहर का कोई व्यक्ति महल के भीतर न घुस पाये । मैं बस इस देखनेवाले को देखता रहता हूँ । कौन है यह द्रष्टा हैं -यह मेरे पूरे जीवन की साधना है कि मैं स्वयं को देखता हू। पहरेदार बोला, “लेकिन यह अजीब काम है । कौन तुम्हें वेतन देगा ” बाल शेम बोला, “यह इतना आनंदपूर्ण, आनन्दकारी परम धन्यता है कि यह स्वयं अपना पुरस्कार है ।
इसका एक क्षण-. सारे खजाने इसके सामने फीके है पहरेदार तोला, “यह अजीब बात है । मैं अपने पुरे जीवन निरीक्षण करता रहा हूँ लेकिन मैं ऐसे किसी सुंदर अनुभव से परिचित नहीं हुआ हूँ। कल रात मैं आपके साथ आ रहा हूँ । मुझे इसमें दीक्षित करें मुझे पता है कि कैसे निरीक्षण करना है लेकिन शायद देखने के किसी दूसरे ही आयाम की जरूरत है । आप शायद किसी दूसरे ही आयाम के द्रष्टा है केवल एक ही चरण है और वह चरण है एक नया आयाम, एक नईं दिशा । या तो हम बाहर देखने में रत हो सकते है या हम बाहर के प्रति आंखे बंद कर सकते है और अपनी समग्र चेतना को भीतर केंद्रित कर सकते है । फिर तुम जान सकोगे, क्योंकि तुम ‘जानने वाले’ हो  तुम चैतन्य हो । तुमने इसे कभी किया नहीं है । तुमने अपनी चेतना को हजार बातों में उलझा भर रखा है । अपनी चेतना को सब तरफ से वापस लौटा लो और उसे स्वयं के भीतर विश्रामपुर्ण होने दो और तुम घर वापस आ गये हो ।