save mother cows समस्त जीवों की हत्या बंद हो

ओउम नमो नम: सर्वशक्तिमते जगदीश्वराय:
gau mataवे धर्मात्मा विद्वान लोग धनी हें, जो ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव, अभिप्राय, सृष्टि-कर्म, प्रत्याक्षादि प्रमाण और आप्तों के आचार से अविरुद्ध चलके सब संसार को सुख पहुंचाते है और शोक है उन पर जो की इनसे विरुद्ध स्वार्थी दयाहीन होकर जगत में हानि करने के लिए वर्तमान है। पूजनीय जन वे है जो अपनी हानि होती हो तो भी सबका हित करने में अपना तन, मन, धन लगाते है, और तिरस्करणीय वे है जो अपने ही लाभ में संतुष्ट रहकर सबके सुखों का नाश करते है। save mother cows
सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर ने इस सृष्टि में जो-जो पदार्थ बनाये है, वे निष्प्रयोजन नहीं, किन्तु एक-एक वस्तु अनेक-अनेक प्रयोजन के लिए रची है I इसलिये उन से वे ही प्रयोजन लेना न्याय अन्यथा अन्याय है । देखिये जिस लिये यह नेत्र बनाया है, इससे वही काम लेना सब को उचित होता है, न कि उससे पूर्ण प्रयोजन न लेकर बीच ही में वह नष्ट कर दिया जावे I क्या जिन-जिन प्रयोजनों के लिए परमात्मा ने जो-जो पदार्थ बनाये है, उन-उन से वे-वे प्रयोजन न लेकर उनको प्रथम ही नष्ट कर देना सत्पुरुषों के विचार में बुरा कर्म नहीं है ? पक्षपात छोड़ कर देखिये, गाय आदि पशु और कृषि आदि कर्मों से सब संसार को असंख्य सुख होते हैं वा नहीं ?
इसीलिये यजुर्वेद के प्रथम ही मन्त्र में परामात्मा की आज्ञा है ” अघन्या: यजमानस्य पशून् पाहि’ हे पुरुष ! तू इन पशुओं को कभी मत मार, और यजमान अर्थात् सब के सुख देनेवाले जनों के सम्बन्धी पशुओं की रक्षा कर, जिनसे तेरी भी पूरी रक्षा होवे । और इसीलिये ब्रह्मा से लेके आज़ पर्यन्त आर्य लोग पशुओं की हिंसा मैं पाप ओर अधर्म समझते थे , ओर अब भी समझते हैं । और इन की रक्षा से अन्न भी महंगा नहीं होता, क्योंकि दुध आदि के अधिक होने से दरिद्रो को भी खान पान में मिलने पर बहुत ही कम अन्न खाया जाता है, ओर अन्न के कम खाने से मल भी कम होता है । मल के कम होने से दुर्गन्ध भी कम होता है, दुर्गन्ध के कम होने से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि भी विशेष होती है, उससे रोगों की न्यूनता होने से सबको सुख बढ़ता है।
इसलिए यह कहना भी उचित होगा कि गो (save mother cows) आदि पशुओं के नाश होने से राजा ओर प्रजा का भी नाश हो जाता है, क्योंकि जब पशु न्यून होते है, तब दूध आदि पदार्थ और खेती आदि कार्यों की भी घटती होती है । देखो, इसी से जितने मूल्य से जितना दूध और घी आदि पदार्थ तथा बैल आदि पशु 700 सातसौ वर्ष के पूर्व मिलते थे, उतना दूध (milk) घी और बैल आदि पशु इस समय दशगुणे मूल्य से भी नहीं मिल सकते। क्योंकि ७०० सातसौ वर्ष के पीछे इस देश में गवादि पशुओं को मारनेवाले मांसाहारी विदेशो मनुष्य बहुत आ बसे है l वे उन परोपकारी पशुओं के हाड़-मांस तक भी नहीं छोड़ते, तो ‘नष्टे मूले नैव फलं न पुष्पम्’ जब कारण का नाश कर दे तो कार्य नष्ट क्यों न हो जावे। अरे दुष्टों! क्या तुम लोग जब कुछ काल के पश्चात् पशु न मिलेंगे, तब मनुष्यों का मांस भी छोडोगें वा नहीं ? हे परमेश्वर ! तू क्यों न इन पशुओं पर, जो कि बिना अपराध मारे जाते हैं, दया नहीं करता ? क्या उन पर तेरी प्रीति नहीं है ? क्या इनके लिये तेरी न्याय-सभा बंद हो गईहै ? क्यों उनकी पीडा छुडाने पर ध्यान नहीं देता, और उनकी पुकार नही सुनता ? क्यों इन मांसाहारियों के आत्माओं में दया प्रकाश कर निष्ठुरता, कठोरता, स्वार्थपन ओर मूर्खता आदि दोषों को दूर नहीं करता जिससे ये इन बुरे कामों से बचें?
हिंसक-रक्षक संवाद :-
हिंसक- ईश्वर ने सब पशु आदि सृष्टि मनुष्य के लिये रची है, और मनुष्य अपनी भक्ति के लिये । इसलिये मांस खाने में दोष नहीं हो सकता I
रक्षक – भाई ! सुनो, तुम्हारे शरीर को जिस ईश्वर ने बनाया है, क्या उसी ने पशु आदि के शरीर नहीं बनाये है ? जो तुम कहो कि पशु आदि हमारे खाने को बनाये हैं, तो हम कह सकते है कि हिंसक पशुओं के लिये तुमको उसने रचा है, क्योंकि
जैसे तुम्हारा चित्त उनके मांस पर चलता है, वैसे ही सिंह, गृघ्र आदि का चित् भी तुम्हारे मांस, खाने पर चलता है, तो उन के लिये तुम क्यों नहीं ?
हिंसक – देखो, ईश्वर ने पुरुषों के दांत कैसे पैने मांसाहारी पशुओं के समान बनाये हैं । इससे हम जानते हैं कि मनुष्यों को माँस खाना उचित है।
रक्षक – जिन व्यघ्रादि पशुओं के दांत के दृष्टान्त से अपना पक्ष सिद्ध करना चाहते हो, क्या तुम भी उनके तुल्य ही हो ? देखो, तुम्हारी मनुष्य जाति उनकी पशु-जाति, तुम्हारे दौ पग और उनके चार,  तुम विद्या पढ़ कर सत्यासत्य का विवेक कर सकते हो वे नहीं । और यह तुम्हारा दृष्टान्त भी युक्त नहीं, क्योंकि जो दांत का दृष्टान्त
लेते हो तो बन्दर के दांतों का दृष्टान्त क्यों नहीं लेते ? देखों बंदरों के दांत सिंह, मौर व बिल्ली आदि के समान है ओर वे मांस नहीं खाते । मनुष्य और बंदर की आकृति के भी है । इसलिये परमेश्वर ने मनुष्यों को दृष्टान्त से उपदेश किया है कि जैसे बंदर मांस कभी नहीं खाते और फलादि खाकर निर्वाह करते है, वैसे तुम भी किया करो I जैसा बंदरों का दृष्टान्त सांगोपांग मनुष्यों के साथ घटता है, वैसा अन्य किसी का नहीं । इसलिये मनुष्यों को उचित है कि मांस सर्वथा छोड़ देवें।
हिंसक – तुम लोग शाकाहारी-शाकाहारी कहते हो क्या वृक्षादि में जीवन नहीं ?
रक्षक – बिलकुल जीवन है। परन्तु जैसा तुम मानते हो वैसा नहीं। वृक्षादि सुषुप्त अवस्था में रहते है अत: उनमें सुख-दुःख की अनुभूति नाम-मात्र ही है। वेदों में उनका भी आवश्यकता अनुसार उचित मात्रा में उपयोग करने की आज्ञा है। देखो ! जब हम पशु आदि को मरते है तो वे कितना रोदन आदि विलाप करते है जबकि वृक्षादि में वैसा नहीं।