ऋषि दयानन्द और सच्चे महादेव की खोज

dayanand saraswatiसंसार में दो ही प्रसिद्ध स्थान हें जहाँ योगीज़न निवास करते हैं। एक-नर्मदा का तट, और दूसरा-उत्तराखण्ड महाराज न इन दोनों स्थानों को खोज डाला। नर्मदा नदी के तट पर की कुटियों में रहने वालों को देखा उतराखणड की कौनसी गुफा हैं, जिसमे’ महाराज नहीं पहुँचे ? कौनसा मठ हे , जहाँ जाकर योगियों का अनुसंधान उन्होंने नहीं किया? और अन्त में जिस प्रियतम की खोज में वे घर से निकले थे, जिस महादेव को पाने के लिए उन्होंने माता-पिता के प्यार को छोडा था, उसे योग-विद्या दवारा पा ही लिया। अब क्या बाकी रह गया था, जिसके लिए वे जीवित रहते?
ऋषि (Rishi Dayanand) कहते हैं-” ‘एक बार मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि इसी हिंमराशि में पड़े पड़े ही अपने प्राणा का अन्त कर दू। किन्तु थोडी ही देर मैं ज्ञान-लालसा इतनी प्रबल हो उठी कि मैने वह विचार छोड़ दिया’
तब ऋषि दयानन्द विशेष ज्ञान-विर्धी के लिए मथुरा पहुँचे। और स्वामी बिरजानन्द जी के पास तीन बर्ष रहकर ज्ञान के कोष  में अधिक वृद्धि की।
जब विदा होने का समय आया. और गुरु दक्षिणा की बात चली  तो गुरु ने कहा…”सौम्य” मैं तुम से किसी प्रकार के धन की दक्षिणा नहीं चाहता। तुम प्रतिज्ञा करो कि जितने दिन रहोगे, उतने दिन आर्यावर्त में आर्ष-ग्रंथो की महिमा स्थापित करोगे, अनार्ष-ग्रन्धों का खंडन करोगे. और भारत में वैदिक धर्म की स्थापना के निमित्त अपने प्राण तक अर्पण कर दोगे
और फिर ऋषि दयानन्द ने कहा की श्री महाराज देखेंगे की उनका प्रिय शिष्य उनके आदेश का किस प्रकार पालन करता हे
ऋषि को इतनी छोटी आयु में वैराग्य उत्पन हुआ और सच्चे शिव की खोज में निकलना एक सच्चे योगी के जीवन का चमत्कार ही हे इसी लग्न में ऋषि दयानन्द ने घने जंगलों भीषण पर्वत शिखाओं में अनेक योगियों से योग्विधा सिख कर संसार को जीने का सच्चा मार्ग दिखाया

योगश्चितवृत्तिनिरोधः चित की वर्तियों को सब बुराइयों से हटा के, सुभ गुणों में स्थिर करके, परमेश्वर के समीप में मोक्ष को प्राप्त करने को योग कहते हें, और वियोग उसको कहते हें की परमेश्वर और उसकी आज्ञा से विरुद्ध बुराइयों में फँस के उससे दूर हो जाना