Haridwar हरिद्वार के कुम्भ में धर्मप्रचार

27 फरवरी 1879 से 11 अप्रैल 1879 तक

kumbh melaऋषि दयानन्द रूडकी से ज्वालापुर आए जहॉ मुख्यत: हरिद्वार (Haridwar) के पण्डे रहते हैं। यहॉ सात दिन तक ठहरे और 27 फरवरी 1879 को हरिद्वार (Haridwar) आकर श्रवणनाथ के बाग तथा निर्मले साधुओं (Sadhus) की छावनी के निकट मूला मिस्त्री के खेत में डेरा डाला। जो आर्य लोग हरिद्वार आए थे, वे भी स्वामीजी के समीप आ गए। आते ही समस्त मार्गों, घाटों, पुलों तथा मन्दिरों पर एक विज्ञापन (advertisement) लगवा दिया जिसमें स्वामीजी ने अपने आने की सूचना तो दी ही, अपने मन्तव्य भी लिख दिए तथा लोगों को धर्मंचर्चा हेतु आमत्रित किया।
इस विज्ञापन का अंतिम भाग 
इसलिए आर्यों के इस महासमुदाय में वेद-मन्त्रों द्वारा सब सज्जन मनुष्यों के हित के लिए ईंश्वराज्ञा का प्रकाश संक्षेप से किया जाता हैं। फिर इसके नीचे ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 71 मन्त्र 5, 6 व ।0 को लिखकर उनकी व्याख्या की और ऐतरेय, तैत्तिरीय, आरण्यक (उपनिषद) का एक-एक वाक्य लिखकर उनके अर्थ भी लिख दिए और समाप्ति में यह प्रार्थना की -की                                                                                                                                                                  “यह बड़े आश्चर्य की बात है कि पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र, वर्षा और ऋतु मास, पक्ष, दिन, रात्रि, प्रहर, मुहूर्त, घडी, पल, क्षण, आँख, नाक आदि शरीर, औषध, वनस्पति, खाना-पीना आदि व्यवहार ज्यों के त्यों हैं (अर्थात् जैसै ब्रहा कै समय से लेकर जेमिनी मुनि के समय तक इस देश में थे ) फिर हम आर्यों की दशा क्यों पलट गई है आप अत्यन्त विचारपूवंक देखो कि जिसका फल दुःख वह धर्म और जिसका फल सुख वह अधर्म कभी हो सकता है? अपनी दशा अन्यथा होने का यही कारण है जो ऊपर लिख आए  हैं अर्थात वेद-विरुद्ध चलना या फिर उस प्राचीन अवस्था की प्राप्ति (रीति) वेदानुकूल आचार पर चलना है, और वह आचार यह (aryavart) आर्यावर्त-निवासी आर्य, आर्यसमाजों के सभासद करना और कराना चाहते हैं कि संस्कृत-विद्या के जाननेवाले स्वदेशीय मनुष्यों की वृद्धि के अभिलाषी परोपकारक निष्कपट होकर सब को सत्यविद्या देने की इच्छा-युवत धार्मिक विद्वानों की उपदेशक-मण्डली और वेदादि स्त्शाश्त्रों को पढने के लिए नियत किया चाहते हैं इसमें जिस किसी की योग्यता हो वो इस परोपकारी मोहतम कार्य में परवर्त हो “जिससे मनुष्य मात्र की शीघ्र उन्ती हो सकती हे ” आदि ।
इस अन्तिम अपील में स्वामीजी ने प्रकट किया कि वे दो विषयों को सुधार का मुख्य कारण समझते हैँ…प्रथम, उपदेशक-मण्डली ऐसै मनुष्यों की हो जो संस्कृतवेत्ता, स्वदेशीय मनुष्यउन्ती के अभिलाशी, परोपकारी, निष्कपट, सबको सत्य विद्या देने की इच्छावाले, धार्मिक विद्वान् हों और दूसरा, वेदादि  सत्यशाश्त्रों के पढने के लिए पाठशाला स्थापित होनी चाहिए ।
इस बार कुम्भ (Kumbh) में बडी भीड़ थी। स्वामीजी ने अपने 12 अप्रैल के पत्र में लिखा कि अब तक दो लाख आदमी मेले में आ चुके हैं। अभी पर्व समाप्त
होने में 15 दिन बाकी हैं। पर्व के मुख्य दिन तो बहुत बडी संख्या में लोग आए। 1924 वि० के कुंम्भ से दुगुनी भीड़ थी। गंगा के किनारे आठ-दस कोस तक यात्री ही यात्री नजर आते थे। स्वामीजी ने  इस पौराणिक दल में अपनी ध्वजा फहराकर वैदिक धर्मं का डंका बजाया’ मूर्तिपूजादि पौराणिक सिद्धान्तो का प्रत्यक्ष खण्डन किया। अनेक ब्राह्मण, संयासी, बैरागी और निर्मंले साधु विचार के लिए आते और स्वामीजी के स्पष्ट खण्डन से रुष्ट होकर चले जाते। कईं तो यहॉ तक कह जाते कि इच्छा तो होती है तुम्हें मार डालूँ क्योकि तुमने हमारी जीविका छीन ली है। परन्तु उनका बस नहीं चलता। काशी के स्वामी विशुद्धानन्द भी आए थे। एक अन्य सतुआ स्वामी भी आए थे जो अच्छे विद्वान् माने जाते थे और कनखल में ठहरे थे। सुखदेव गिरि और जीवन गिरि नामक दो साधु भी पपिडत गिने जाते थे । स्वामीजी ने विचार-विमर्श के लिए सबको पत्र भेजे, परन्तु कोई सामने नहीं आया।