रोग और इलाज

भोजन से पूर्व तीनघूंट पानी पीने से भोजन नली तथा आमाशय कीं उष्णता शांत हो जाती है । ऐसा करने से भोजन की उष्णता व मसालों की उग्रता के दुष्प्रभाव खत्म हो जाते हैं । जैसे विचारों में भोजन किया जाएगा वैसा ही मन का निर्माण होगा । सात्विक विचारों के साथ भोजन करने वाले व्यक्ति के भाव सात्विक एवं पवित्र होंगे । मन का निर्माता अत्र है । हरेक व्यक्ति के शरीर में एक जैविक घडी होती है, जो शरीर की क्रियाओं को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं इसी कारण ठीकसमय पर नीद आती है, भूख लगती है और सुबह नींद खुल जाती है ।
ह्म प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं । शरीर में स्वयं को स्वस्थ रखने की क्षमता है पर प्रक्रति से बढ़ती कूने ने इसे घटाया है
रोग दवाइयों से नहीं जाते । भोजन पर नियन्त्रण करने वालों को रोग नहीं होते । यदि आपका
खान-पान गड़बड़ है तो कोई भी चिकित्सा आपको स्वस्थ नहीं कर सकती । स्वास्थ्य से भोजन का घनिष्ट सम्बन्ध है । जिस व्यक्ति को जितना अधिक भोजन का ज्ञान होगा, वह उतना ही अधिक रोगों से दूर रहेगा । आवश्यकता के अनुरूप किया गया भोजन शरीर को रोगों से बचाता है । अत: स्वास्थ्य और जीवन का माधुर्य आपके हाथों में है । जैसा आपका खान पान होगा, वेसी ही प्रकृति बनेगी । भोजन से ही रक्त बनता है । रक्त विकार की रोगोत्पति का कारण है । अत: भोजन में रक्तशोधक, रक्त को साफ़ करने वाली चीजे निरोग रहने के लिए नित्य खानी चाहिए
भोजन सोच-समझकर करने से स्वास्थ्य में विरधी होती है । रोगी होने पर भोजन सोचकर या
चिकत्सक के परामर्श से खाने से रोग शीघ्र दूर होता है । औषधि की अपेक्षा पथ्य अपना विशेष स्थान रखते हैं । जब तक कोई विकट विकार न हो, भोजन से ही रोगी ठीक हो जाता है
पूर्ण स्वास्थ्य…केसा भी नया-पुराना रोग हो, कच्चा भोजन को । नमक और नशीली वस्तुयें खाना बन्द करें । केवल सस्ते मौसमी फल एंव सब्जियों को ही भोजन के रूप में लें । धैर्य से इनका सेवन करते रहे । पूर्ण स्वास्थ्य मिल जायेगा
वात,पित,कफ – ( 1 ) यदि आँखे साफ है तो प्रकृति वात है । (2) आँखे ललाई लिए हुए हैं तो प्रकृति पित्त है । (3) आँखे मटियाले रंग की हैं तो प्रकृति कफ प्रधान हे
(1) वात प्रकृति वाले को मीठा, खट्टा और नमकीन भोजन, (2) पित्त प्रकृति वाले को मीठा, चरपरा, कसैला, और ( 3 ) कफ प्रकृति वाले को कड़वा, कसेला भोजन लाभदायक है