ब्रहाचारी मुलशंकर

dayanand saraswatiBrahmachari Mulshankar (ऋषि दयानन्द) घर से निकलकर आठ मील की दूरी के एक ग्राम में उन्होंने वह रात्री काटी और एक पहर रात रहने पर वहां से चलकर उसी दिन एक गॉव के हनुमान मंदिर (Hanuman Temple) में रात्रि व्यतीत की। यह मार्ग उन्होंने निश्चित राजमार्ग (Hi way) पर चलकर तय नहीं किया, अपितु पगडंडियों और टेढे- मेढ़े रास्तों से होकर चले ताकि रास्ते में आता-जाता कोई पहचान न ले । यह सावधानी आवश्यक थी, क्योंकि गृहत्याग के तीसरे दिन उन्होंने एक राजकर्मचारी (government employee) से सुना किं मूलशंकर (Mulshankar) नामक एक युवक को सिपाही तलाश कर रहे हैं। यहाँ से जब वे आगे चले तो उन्हें साधुओं के वेश में कुछ ठग मिले जिन्होने उनके शरीर पर धारण किये आभूषण (Jewelery), अँगूठी तथा कुछ अन्य द्रव्य यह कहकर ले लिए कि जब तक वे इनका त्याग नहीं करेंगे, उन्हें पूर्ण वैराग्य कैसे मिलेगा। इन ठगों के पास कोई देव मूर्ति थी जिसके आगे उन्होंने वें वस्तुएँ ‘भेट-रूप में रखवा लीं।
यहाँ से चलकर मूंलशंकर सायला नामक ग्राम में पहुचे जहाँ उन दिनों लाला भक्त नामक एक वैष्णव साधु रहते थे जो योगी लाला भक्त के नाम से विख्यात थे । यहाँ आने पर मूलशंकर ने एक अन्य ब्रह्मचारी से नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली । अब उनका नाम ब्रह्मचारी (Brahmachari) शुद्ध चेतन्य हो गया उन्हें पात्र रूप में एक कमंडल दिया गया और वें योग साधना में तत्पर हुए । एक रात्री जब वें एक वृक्ष के निचे योगाभ्याश पूर्वक ध्यान (meditation) में बेठे थे, उन्हें पेड़ पर बेठे पक्षियों का रव सुनाई पड़ा ।वे भयभीत हो गए। भूत-प्रेतादि संस्कारों से अभी उन्हें मुक्ति नहीं मिली थी , अत: एकान्त त्यागकर साधुओं की मण्डली में आगए।
यहाँ से चलकर ब्रह्मचारी शुद्ध चैतन्य कोट काँगड़ा नामक स्थान पर आए। यह स्थान अहमदाबाद के निकट हे। यहाँ पर उन्होंने बहुत से वेरागियों को देखा। किसी राज्य की एक रानी भी उनके फ़न्दे में फेंसी उनके समीप ही थी। उन वैरागिओं ने अकारण ही शुद्ध चैतन्य का उपहास किया और उन्हे’ अपनी मण्डली में प्रवेश करने के लिए कहा। इस पर शुद्ध चैतन्य ने घर से पहने रेशमी वस्त्रों को त्याग दिया और सादे वस्त्र पहन लिए। यहाँ पर वे तीन मास तक रहे। यहाँ पर रहते हुए ही उन्हें ज्ञात हुआ कि सरस्वती नदी के तट पर बसे सिद्धपुर में कार्तिक मास में प्रतिवर्ष मेला लगता है जहाँ हजारो’ साधु, महात्मा तथा योगी जन आते हैं। यह सोचकर कि वहाँ कोई उच्च कोटि का योगी अवश्य मिलेगा, शुद्ध चैत्तन्य सिद्धपुर की ओर चल पडे। रास्ते में उन्हे’ एक साधु मिला जो उनके परिवार का परिचित था। इनसे भेंट कर एक बार तो ब्रह्मचारी शुद्ध चैतन्य को रोना आ गया। अभी वैराग्य मैं द्रडता भी नहीं आई थी । उन्होंने इस ‘परिचित वैरागी से अपना हाल कहा। पहले तो उसने मूलशंकर को घर छोड़ने के लिए बुरा… भला कहा, किन्तु शुद्ध चैतन्य को अपने संकल्प से विचलित नहीं कर सका।
 अन्तत: ब्रह्मचारी शुद्ध चैतन्य सिद्धपुर आए और नीलकंठ महादेव के मंदिर में डेरा किया जहाँ पहले से ही अनेक साधुगण ठहरे थे। मेले मेँ जिस किसी विद्वान् योगी की चर्चा सुनते, वे, उसके निकट अवश्य जाते और सत्संग का लाभ उठाते। सिद्धपुर आते हुए मार्ग में जो वैरागी मिला था, उसने मूलशंकर का सारा हाल उनकै पिता को लिख भेजा और उनके वर्तमान में सिद्धपुर में होने की सूचना भी दे दी। यह समाचार पाते ही मूलशंकर के पिता चार सिपाहियों को साथ लेकर वहाँ आ गए और नीलकंठ के मंदिर में उन्हें जा पकड़ा। जब उन्होंने पुत्र को साधू वेश में ‘देखा तो क्रोध में आकर अनेक कठोर वाक्य कहकर उनकी भर्त्सना की। यहाँ तक कहा कि तुमने हमारे परिवार पर कलंक लगाया है। तेरी माता तेरे वियोग में मरणोन्मुख है। पिता के इस क्रोध ने उन्हें भयभीत कर दिया। डर के मारे वे पिता के चरणों में गिर पड़े और कह दिया कि लोगों के बहकाने में आकर वे घर से निकल पड़े हैं। आप क्रोध न करें। मुझे क्षमा कर दें। यह भी कह दिया कि मैं आप के साथ घर लौटने के लिए तैयार हूँ। इन बातों से भी पिता का क्रोध शान्त नहीं हुआ और उन्होंने आवेश में आकर पुत्र के साधुओं वाले वस्त्र फाड़ डाले। उनका तूम्बा भी तीड़ दिया और कहा कि तू मातृहन्ता है। उन्होंने पुत्र को नवीन वस्त्र दिए तथा अपने डेरे पर ले आए। मूलशंकर के घर लौट चलने के कथन का भी उन्हें विश्वास नहीं हुआ रात्रि को भी मूलशंकर पहरे में रहे। वे यद्यपि प्रकट रूप में तो पिता से कह चुके थे कि घर लौटने में उन्हे’ आपत्ति नहीं है, किंन्तु अपने मन में वे दृढ़ थे और अपने निर्धारित वैराग्य-पथ पर ही बढ़नै की प्रबल भावना लिए थे। दैववश रात के तीसरे पहर में प्रहरियों को भी नींद आ गईं और शुद्ध चैतन्य ने यह अवसर भाग निकलने के लिए उपयुक्त माना।
वै चटपट वहाँ से चल पड़े और एक वृक्ष के सहारे निकट के एक मंदिर की छत पर जा बैठे। उनके हाथ में एक जल-पात्र अवश्य था। यदि कोई पूछता तो यह कहने का बहाना था कि शौच के लिए निकले हैं। जब वे उस एकान्त में चुपचाप छिपे बैठे थे, उन्होंने देखा कि वही पहरे वाले  सिपाही उनकी तलाश में उधर आए और आसपास के लोगों से पता कर रहे हैं। इस प्रकार शुद्ध चैतन्य को वह सारा दिन मंदिर की छत पर बैठे ही व्यतीत करना पड़।। जब दिन छिप गया तो वे उतरे और मुख्य मार्ग को छोड़कर दो कोस दूर एक गॉव तक आ गए। सवेरा होने पर फिर वहाँ से चल पड़े। अपने पिता से उनकी यही अन्तिम भेंट थी। अब वे अहमदाबाद होते हुए वडोदरा पहुँचे। यहाँ उन्हें जिन संन्यासियों का सानिध्य मिला, वे शंकर मत को माननेवाले वेदान्ती थे। उनर्क सम्पर्क में आकर शुद्ध चैतन्य ने भी नवीन वेदान्त को स्वीकार किया। यहाँ पता चला कि नर्मदा के तटवर्ती क्षेत्र में साधुओं की एक बृहत् गोष्ठी होने बाली है। उसमें भाग लेने के लिए चले। यहाँ उन्हें नाना शास्वी के ज्ञाता स्वामी सच्चिदानंद नामक एक सन्यासी मिले जिनसे उनका विस्तृत वार्तालाप हुआ। अन्तत: वे अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचे और स्वामी परमानन्द परमहंस के निकट ‘वेदान्त-सार’ तथा ‘वेदान्त परिभाषा’ आदि शाङ्कर मत र्क ग्रन्धों का अध्ययन करने लगे।