ब्रहाचर्य रक्षा और इसके फल

१. जिस देश, जाति और वंशके लोग चाहते हों कि हमारी संतान-परम्परामें ब्रह्मचारी उत्पन्न हों, ब्रहाचार्ये (Brahmacharya ) तथा ब्रह्मचारी का विशेष आदर करना चाहिये और स्वयं शाश्त्रोक्त आश्रमोचित ब्रहाचर्यके (brahmacharya) नियमोंका यथा विधि पालन काना चाहिये । वंशपरम्परा और माता- पिताके भावका ब्रहाचर्यपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है अनैतिक रीतिसे उत्पन्न संतानसे ब्रह्मचर्यकी आशा रखना उपहासासप्द है । यदि माता-पिताका संयोग केवल भोगलालसाकी तृप्तिके लिये ही होता है तो भावी संतान वासना पूर्ति परायण हो जाय, इसमें क्या आश्चर्य है? भावी शिशुके शरीरगत सारे ही उपादान माता-पिताके मन और धातुओंसे ही संघटित होते हैं
यदि मूलमें ही दोष रहा तो कार्य निर्दोष केसे हो सकता है? इसलिये माता-पिता को धर्मब्रुद्धिसे ऋतुकाल में शाश्त्ररोक्त रीतिसे संयोग करके सन्तानोत्पादन करना चाहिये । माता-पिताके मनमें आदर्श ब्रह्मचारी संतान उत्पन करनेका संकल्प होना चाहिये । जबतक शिशु गर्भमें रहे, माता-पिता को वासनारहित जीवन व्यतीत करना चाहिये। माता-पिताके ‘भाव-बिज ही संतानमें अंकुरित, पुष्पित, एंव फलित होते हें,
२. जबतक शिशु माँ का दूध पीता है, तब तक माताके शरीर से और भावसे भी कामकी वृत्तिका स्पर्श नं होना ही श्रेयस्कर है; क्योंकि मनमें कामावेश होने पर शरीरके प्रत्येक अवयव एवं परमाणुमें उसकी व्याप्ति हो जाती है । इससे बच्चोंके मनमें भोगसम्बन्धी संस्कार तो पड़ते ही हैं, स्नायुओं मैं उत्तेजना भी होने लगती है छोटे-छोटे बच्चोंके मस्तिष्क और शरीरके अवयव बहुत ही कोमल एवं स्निगध होते हैं । शैशवमें ही उन पर जैसी छाप पड़ जाती है, वही जीवनभर प्रकाशित होती रहती है । जो लोग अपनी संतानको ब्रह्मचारी बनाना
चाहते हैं, उनके लिये यह आवश्यक है कि जब तक वह दूध पीता रहे, तब तक अपनी वासनाको शान्त रखें.
३. माता-पिताको शिशुके सम्मुख एसी कोई चेष्टा कभी नहीं करनी चाहिये, जिसको देखकर उसके जीवनमें भी बुरी आदतें (Bad Habits) उतर आयें । खट्टा, चाट, मिठाई न तो स्वयं खाना चाहिये और न बच्चोकों ही खिलाना चाहिये । शरीर की चरम धातु (वीर्यं) रगरगमें रहती हे । बचपनमें भी उत्तेजक पदार्थोंके सेवनसे उसका प्रथककर्ण होने लगता हे इसीसे छोटे छोटे बच्चोंको भी प्रमेह, धातुक्षय हो जाते हें, बचपन से ही आहार – शुद्धी ब्र्हचार्ये के लिए अत्यन्त आवश्यक हे, आहार शुद्धी के सम्बन्ध में यें बातें ध्यान में रखनी चाहिए
(1) आहार स्वभावसे ही उत्तेजक न हो । मांस, शराब, प्याज, लहसुन आदि जन्मसे ही उत्तेजक हैं
(2) भोज्य पदार्थमें कोई ऐसी वस्तु न मिली हो, जिससे यह विर्यंक्षरणका हेतु बन जाय-जैसे
अमचूर, राई, गरम मसाले, लाल मिर्च इत्यादि । धूम्रपान ब्रहाचर्य का महा शत्रु है