Akbar जब अकबर को पटका था एक राजपूतानी नें

प्रत्येक नये वर्ष के आरम्भ के दिन ‘नोरोज‘ के नाम से एक ख़ास त्यौहार मुगलों के समय में मनाया जाता था, उस दिन मकान तथा दुकाने सजती थी, रोशनियाँ , नाच गाना, खाना पीना, सब होता था, Akbar (अकबर) ने उस दिन के लिए एक ख़ास प्रथा की नीव डाली थी, जिसने उसके नाम पर कलंक का टिका लगा दिया,

जनाने महल के निकट के बगीचे में स्त्रियों का निजी बाजार लगता था, जिसे मीना बाजार कहते थे, उस मेले में सिर्फ स्त्रिया ही जा सकती थी किसी भी पुरुष का जाना उसमें मना था, कड़े पहरे से इस का प्रबंध किया जाता था, इस मेले में हिन्दू मुसलमानों के बड़े बड़े सरदारों, और अमीरों की पर्देदार पत्नियाँ, बहन बेटियां, आती थी जिनके पैर का अंगूठा भी पराये पुरुष को देखना भी नशीब नही होता था,

काफी इतिहासकार इस मेले के बारे में कहते हें की ‘अकबर ” इस मेले के जरिये अपनी काम वासना की पूर्ति करता था, जो नारी उसे इस मेले में सबसे सुंदर नजर आती थी, लोभ से या फिर जबरदस्ती से उस नारी के साथ व्येभिचार करता था, 

ये उन्ही दिनों की बात हे प्रयेक कोम, राजघरानों की एक से एक सुंदर स्त्रियां उस मेले में उपस्थित थी, अकबर भी उस दिन रूप बदल कर एक स्त्रि के भेष में वंहा घूम रहा था, 

इसी वक्त एक सम्भ्रांत, सुन्दर और गम्भीर नारी ने उस मेले में प्रवेश किया, उसकी सुन्दरता के आगे मेले में उपस्थित सभी स्त्रियों की चमक फीकी पड़गयी, मुगल कन्याएँ और बेगमें, जो अपने ऐश्वर्ये और साधनों के घमंड में अंधी होकर किसी को कुछ समझती ही नही थी, वो सभी हेरान हो गयी, कई बड़े बड़े राजघरानो की स्त्रियों ने उस सुन्दरी से वार्तालाप किया, उसके स्वर की मधुरता, भावों की नम्रता ने सबको मोह लिया, 

इसी मेले में स्त्रि के भेष में अकबर वंहा घूम रहा था और उसकी नजर उस सुंदर नारी पर पड़ी, वो उसके रूप को देखकर देखता ही रह गया, अकबर ने दासी के दवारा उस सुन्दरी को धोके से अपने महल में बुल्वालिया और उसे भ्रष्ट करना चाहा, तब उस पतिव्रता ललना ने पहले तो उसे खूब समझाने का प्रयत्न किया लेकिन अकबर नही माना, और अपनी काम वासना की पूर्ति के लिए जबरदस्ती करने लगा तो उस वीर राजपूतानी ने उस कामांध को उठा कर पटक दिया,

और कटार निकाल कर उसकी छाती पर बेठ गयी और शेरनी की तरहां गरजते हुए बोली- बोल पापी, नीच, कामांध, बोल में तेरे प्राण एक शण में ही लेलूं, क्या तुम ये नही जानते राजपूत ललनाएं जीते जी अपनी इजज्त पर कोई आंच नही आने देती हें, उनके लिए जीवन मरण एक साधारण खेल का नाम हे, अनेको बार राजपूतानियों ने अत्याचारियों से अपनी इज्जत बचाने के लिए अग्नि की प्रचंड ज्वाला में प्रवेश किया हे, आज में तुझे मार कर दूसरी स्त्रियों की इजज्त बचाऊगी

अकबर को मिर्त्यु सामने नजर आई मिर्त्यु ही नही अपनी इजज्त पर कलंक लगते हुए भी नजर आया, जिसे वो काफी दिनों से छुपाये हुए था, अकबर ने गीड गीडा कर कहा- हे देवी मुझे माफ़ करदो मेने भूल से तुम जेसी पतिव्रता नारी पर हाथ डाल दिया हे, अब एसी भूल कभी नही होगी में भविष्य में कभी तुम्हारी तरफ आँख उठा कर भी नही देखूंगा,

सिर्फ मेरी और ना देखने की प्रतिज्ञा करने से काम नही चलेगा, नीच प्रतिज्ञा कर की भविष्य में किसी दूसरी आर्ये ललना को अपनी हवश का शिकार नही बनाएगा तभी में तेरी जान बक्शुंगी, 

अकबर ने प्रतिज्ञा की तब उस वीर राजपूतानी ने उसे छोड़ा,

और ये वीरांगना और कोई नही सिसोदिया कुल की राजपूतानी थी, Maharana Pratap (महाराणा प्रताप) के छोटे भाई शक्ति सिंह की बेटी थी और इस वीरांगना का नाम किरनमई था,

महाराणा प्रताप जिन्हें अकबर अपनी लाखों की फोज लगाकर भी कभी जित नही सका महाराणा प्रताप के बारे में फिर कभी लिखूंगा  

जरा इसे भी देखें- वीर बालक छत्रपति शिवाजी 

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