Hindi Stories- वीर बालक छत्रपति शिवाजी

हजारों सालों की संस्कृति, हजारों सालों का इतिहास हे हमारा, अनेकों वीर प्रतापी राजा हुए हें इस धरती पर, नमन करता हु भारत माँ तुझे जंहा एक से एक वीरों को जन्म दिया आपने”

दोस्तों आज में आपको अपने भारत के वीर प्रतापी राजा शिवाजी के बचपन की कुछ वीरता की बातें बताऊंगा उमीद हे आपको ये लेख पसंद आएगा 

शिवाजी हिन्दू धर्म के रक्षक , गौ माता के रक्षक,  आगे चलकर जिन्हें हिन्दू धर्म का रक्षक छत्रपति होना था, उनके बचपन से ही उनकी सिक्षा प्रारम्भ हो गयी थी, शिवाजी का बचपन बहूत कठिनाइयों में बिता, शिवनेरके किले में सन 1630 में उनका जन्म हुआ था, 

जब शिवाजी बच्चे थे तब ‘मालदार खान’ ने दिल्ली के बादशाह को खुश करने के लिए बालक शिवाजी और उनकी माँ जिजाबाई को सिंहगढ़ के किले में बंदी करने का प्रयत्न किया, लेकिन उसका ये दुष्ट प्रयत्न सफल नही हो सका, शिवाजी के बचपन के तिन वर्ष अपने जन्म स्थान शिवनेरके किलेमें ही बीते, इसके बाद जिजाबाई को शत्रुओंके भयसे अपने बालक को लेकर एक किले से दुसरे किलेमें भागते रहना पड़ा,

इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी उस वीर माता ने अपने पुत्र की सेनिक शिक्षामें त्रुटी नही आने दी, माता जिजाबाई शिवाजी को रामायण, महाभारत तथा पुराणों की वीर गाथाएं सुनाया करती थी, नरो, त्रिमल, हनुमंत, तथा गोमाजी ये सभी शिवाजी के शिक्षक थे और शिवाजी के संरक्षक थे प्रचंड वीर दादाजी कोडदेव, शिक्षा का परिणाम यह हुआ की बालक शिवाजी छोटी अवस्था में ही निर्भीक और अदम्य हो गये, 

बालकों की टोली बनाकर वें उनका नेत्रव करते थे, और युद्ध के खेल खेला करते थे, उन्होंने बचपन में ही मुगलों से हिन्दू धर्म, देवमंदिर तथा गौ माता की रक्षा करने का संकल्प लेलिया था, 

शिवाजी के पिताजी चाहते थे की उनका पुत्र भी बीजापुर दरबार का किर्पापात्र बनें, शिवाजी जब 8 वर्ष के थे तभी उनके पिता उन्हें शाही दरबार में ले गये, पिता ने सोचा था की दरबार की साज सज्जा, रोब दाब , हठी घोड़े आदि देखकर बालक रोब में आ जायेगा, और दरबार की और आकर्शित होगा किन्तु शिवाजी तो बिना किसी की और देखे, बिना किसी और ध्यान दिए पिता के साथ एसे चलते गये, जेसे किसी साधारण मार्ग पर चले जारहे हों,

नवाब के सामने पहोंच कर पिता ने  शिवाजी की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा ‘बेटा’ बादशाह को सलाम करो’,’ शिवाजी ने मुडकर पिता की और देखा और कहा ‘ बादशाह मेरे राजा नही हें, में इनके आगे सिर नही झुका सकता,   

दरबार में सनसनी फेल गयी, नवाब बालक की और घुर कर देखने लगा, किन्तु शिवाजी ने नेत्र नही झुकाए,शाहजी (शिवाजी के पिता) ने प्राथना की ‘ बादशाह’ शमा करें, यह अभी बहूत नादान हें, पुत्र को उन्होंने घर जाने की आगया दी, शिवाजी ने पीठ फेरी और निर्भीक होकर दरबार से चले गये, 

इस घटना के 4 वर्ष बाद की एक घटना हे , उस समय शिवाजी की उम्र 12 वर्ष की थी, एक दिन शिवाजी बीजापुर के मुख्य मार्ग पर घूम रहे थे, उन्होंने देखा एक कसाई गाएं को रस्सी में बांधे लिए जारहा हे, गाये आगे नही जाना चाहती, कसाई बार बार डंडे से उसे पिट रहा हे, इधर उधर जो हिन्दू हें सिर झुकाए सारे तमाशे को देख रहे हें लेकिन किसी की हिम्मत नही की कुछ कहे गो माता को बचाए, 

लोगो की ऑंखें खुली की खुली रह गयी जब उन्होंने देखा की एक बालक तलवार निकालकर सीधा कसाई की तरफ कूदा और रस्सी काट दी , और गौ माता आजाद हो गयी कसाई इससे पहले की कुछ बोले शिवाजी ने उसका सिर धड से अलग कर दिया,

ये समाचार दरबार में पहुंचा, नवाब ने क्रोध से लाल होकर कहा ‘ तुम्हारा पुत्र बड़ा उपद्रवी जान पड़ता हे’ शाहजी , तुम उसे बीजापुर से बहार कंही भेजदो, 

शाहजी ने अपने पुत्र शिवाजी को उनकी माता के पास भेज दिया और एक दिन वो भी आया जब बीजापुर नवाब ने स्वतन्त्र हिन्दू सम्राट के नाते शिवाजी को अपने राज्ये में निमंत्रित किया और जब शिवाजी दरबार में पहोंचे तो नवाब ने आगे बढकर उनका स्वागत किया, और उनके सामने मस्तक झुकाया,


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